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किसीको गिराकर नहीं साथ लेकर चलने से ही कारवां बनता है : लक्ष्मण नेवटिया

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जीवन बिन्दु : लक्ष्मण नेवटिया,

१) जब कोई नकारात्मक घटना घट रही होती है अगर हम सावधान न रह उसमें फंस गये तो वह हमें कहाँ बहा ले जायेगी कोई नहीं जानता। आवश्यकता है कि हम समझदार बन साक्षी भाव से किनारे खडे हो दृष्टा भावसे उसको देखें और उसका सही विश्लेषण करें। जो अच्छा लगे अंगिकार करें जो गलत लगे बह जाने दें। ऐसा यदि कर पाए तो हम एक बडी दुर्घटना से स्वयं को बचा पाएंगे।
अन्यथा हमारी सारी उर्जा नकारात्मकता में ही ध्वस्त हो जायेगी। पर जब निर्णय हमें ही करना है तो देरी क्यों?

२) शिकायतें शत्रुता पैदा करती है। मित्र कमाने हैं तो शिकायत नहीं अपनत्व भाव से निर्लिप्त
होकर सही सुझाव दीजिये। एक नया शत्रु बनाने के बनिस्पत एक नया सहयोगी भी लेंगे।

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३) सामाजिक कार्य में आगे बढना है तो- आवेशयुक्त प्रतिक्रिया से बचना होगा।
गरम तवे पर शीतल बुँद भी चडड चडड कर विरोध करती है। दुसरे को दोष देने कि अपेक्षा अपने कृत्य की जड में जाईये। सम्भवत: त्रुटी वहीं मिलेगी ।

४) ऐसा क्यों नहीं हुआ ? वैसा क्यों नहीं हुआ? अपने को ही हर हाल में सही समझने से अपने अहंकार की पूर्ति करने के एवेज में हम बहुत कुछ गवां चुके होते हैं। हाँ सम्भलने पर डोर तो जुड भी जाए , पर वहाँ गाँठ तो पड़ चुकी होगी।

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५) उद्देश्य शिखर चढना है और उलझ रखे हैं घरकी गलियों में। सुरसाएँ रास्ते कि बाधा बनने आयेगी ।बस हमें समझदारी से उनसे उलझने से बचना है।

६) अपना दृष्टिकोण सबके प्रति सम्यक भावमय होना चाहिये। किसीको गिराकर नहीं साथ लेकर चलने से ही कारवां बनता है।

७) आज समाज में अशान्ति का मूख्य कारण है दुसरों के हित के लिये लगा व्यक्ति अपने हित की ज्यादा सोच रहा है। पूरा जीवन खपाकर बनाये हुए अपने सुकृत्यों के हलुवे में एक मुठ्ठी बालुकी अपने अहंकार की डालकर।

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८.समाधान कहीं और नहीं अपने अन्दर ही है।
क्योंकि जैसी दृष्टि होगी वैसी ही तो सृष्टि होगी ना।

९. और अन्तिम बात–अवसर की प्रतीक्षा क्यों ?
अवसर तो हर समय गर्दन झुकाए हमारे सामने खडा है।
जयमाल तो हमें ही डालनी होगी !! क्यों मित्र?

लक्ष्मण नेवटिया,
विराटनगर -९

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