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बालेन से मधेश की उम्मीदें : कंचना झा

 
  • चुनावी क्रांति और दिग्गजों का पतन: फागुन २१ (२०८२) के चुनाव में बालेन लहर ने केपी ओली जैसे स्थापित नेताओं को उनके ही गढ़ में हराकर पुराने ‘दल-तंत्र’ को ध्वस्त कर दिया।

  • परिवर्तन के प्रतीक: जनता ने बालेन को केवल एक नेता नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री के चेहरे और व्यवस्था परिवर्तन की एक बड़ी ‘संभावना’ के रूप में स्वीकार किया है।

  • मधेश की बुनियादी जरूरतें: मधेश को बालेन से सड़क, सिंचाई, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर ठोस काम की उम्मीद है, जहाँ पारंपरिक दल विफल रहे।

  • युवा पलायन पर रोक: मधेशी युवाओं के बीच बालेन की गहरी पैठ है; उन्हें उम्मीद है कि बालेन देश के भीतर ही रोजगार के अवसर पैदा करेंगे ताकि उन्हें विदेश न जाना पड़े।

  • स्वतंत्र कार्यशैली की चुनौती: लोकप्रियता के बावजूद बालेन के सामने बड़ी चुनौती पार्टी (रास्वपा) के भीतर स्वतंत्र रूप से काम करने और अपनी छवि को प्रभावी शासन में बदलने की होगी।

कंचना झा, हिमालिनी अंक अप्रैल । ‘अबकी बार बालेन सरकार’–यह नारा केवल एक चुनावी नारा नहीं रहा, बल्कि उसने पूरे देश में एक नई राजनीतिक लहर पैदा कर दी । जनता ने जिस उत्साह और विश्वास के साथ बालेन्द्र साह को समर्थन दिया, उसने नेपाल की राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया ।

फागुन २१ गते २०८२ को हुए चुनाव में सचमुच परिवर्तन की एक लहर देखने को मिली । इससे पहले के चुनावों में प्रायः वही पुराने चेहरे बार–बार संसद में पहुँचते रहे थे । लेकिन इस बार तस्वीर अलग थी । इस बार सच में नए चेहरे चुनावी मैदान में दिखाई दिए और कई पुराने दिग्गज नेताओं को करारी हार का सामना करना पड़ा ।
शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली अपने ही निर्वाचन क्षेत्र झापा से चुनाव हार जाएंगे । स्वयं ओली को भी शायद इसका आभास नहीं था कि उनके राजनीतिक गढ़ में ही उन्हें पराजय का सामना करना पड़ेगा ।

राजनीति का एक मूल सत्य यही है कि यदि नेता अपनी जनता की अपेक्षाओं और समस्याओं से दूर हो जाए, तो वही जनता किसी भी समय उसे सत्ता से बाहर कर सकती है । जब उसके सब्र की बांध टूटती है तो वो कुछ नहीं सोचती । जनता ये होती है ।

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इसबार का चुनाव केवल इसलिए याद नहीं रखा जाएगा कि पुराने चेहरों को हटाया गया, बल्कि इसलिए भी कि नए चेहरों ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई । युवाओं ने इस चुनाव में यह साबित कर दिया कि अब वे केवल दर्शक नहीं, बल्कि राजनीति के सक्रिय और निर्णायक भागीदार बनना चाहते हैं ।

इस पूरे चुनाव में जनता की सबसे बड़ी पसंद बनकर उभरे बालेन्द्र साह ‘बालेन’ जिस प्रकार जनता ने उन पर विश्वास और स्नेह दिखाया है, वह निश्चित रूप से उनके लिए एक बड़ी जिम्मेदारी भी है । उन्हें प्रधानमंत्री के संभावित चेहरे के रूप में देखा जाने लगा और इसी संभावना ने नेपाली राजनीति में व्यापक हलचल पैदा कर दी ।

हालाँकि यह भी सच है कि जनता ने बहुत तेजी से बालेन पर भरोसा किया है । बहुत कम समय में उन्हें एक राजनीतिक नायक के रूप में स्थापित कर दिया गया है । यही कारण है कि उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की आलोचना को कई समर्थक सहजता से स्वीकार नहीं करते । लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है–जहाँ हर नागरिक को अपने विचार रखने का अधिकार होता है । लेकिन वर्तमान माहौल में बालेन के बारे में आलोचनात्मक टिप्पणी करना कई बार कठिन प्रतीत होता है, जबकि वे अभी औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री बने भी नहीं हैं;उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की तैयारी चल रही है ।
इसके लिए उनकी पार्टी रास्वपा की अपनी कुछ तैयारियां है जो शुरु हो चुकी है । चर्चा चल रही है ।

रास्वपा और उसके नेतृत्व ने परिवर्तन, सुशासन और समृद्धि की बात करते हुए जनता के सामने एक नई उम्मीद पेश की है । फागुन २१ को जब मतदान हुआ, तब अधिकांश लोगों का अनुमान था कि परिणाम बहुत करीबी होंगे–शायद दस–बीस सीटों का ही अंतर होगा । लेकिन जैसे–जैसे परिणाम सामने आते गए, लोगों का आश्चर्य बढ़ता गया ।
कई ऐसे क्षेत्र जहाँ कभी नेपाली कांग्रेस या एमाले का मजबूत गढ़ माना जाता था, वहाँ भी परिणाम अप्रत्याशित रहे । ऐसा प्रतीत हुआ मानो पारंपरिक दलों के कई समर्थकों ने भी इस बार परिवर्तन के पक्ष में मतदान किया हो । युवाओं ने अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रभावी प्रदर्शन किया ।
अब जनता कुछ अलग सोच रही है । उसने बहुमत के साथ परिवर्तन के पक्ष में मतदान किया है । यह भी कहा जा रहा है कि जनता का भरोसा केवल किसी दल या नेता पर नहीं, बल्कि परिवर्तन की उस संभावना पर है जिसका प्रतीक बालेन बन गए हैं ।
भाद्र २३ और २४ के आंदोलन के दौरान भी कई स्थानों पर एक स्वर में बालेन को प्रधानमंत्री बनाने की मांग उठी थी । उस समय बालेन ने स्वयं चुनाव लड़कर जनता के जनादेश से सत्ता में आने की इच्छा व्यक्त की और अंतरिम नेतृत्व के लिए सुशिला कार्की का नाम प्रस्तावित किया । सहमति बनने के बाद वे अंतरिम सरकार की प्रधानमंत्री बनीं और फागुन २१ को चुनाव की तिथि तय की गई ।
अब संभावना है कि पूर्ण बहुमत की सरकार बनेगी । लेकिन इसके साथ ही चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं । देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर करना, रोजगार के अवसर बढ़ाना, स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि जैसे क्षेत्रों में सुधार करना–ये सभी मुद्दे नई सरकार के सामने प्रमुख रूप से खड़े होंगे ।

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सबसे बड़ी चुनौती स्वयं बालेन के सामने राजनीतिक संतुलन की होगी । विशेष रूप से यह प्रश्न उठ रहा है कि पार्टी संरचना के भीतर उनकी भूमिका कितनी स्वतंत्र होगी ? कई लोगों के मन में यह संदेह है कि क्या पार्टी सभापति रवि लामिछाने उन्हें पूरी तरह स्वतंत्र रूप से काम करने देंगे या नहीं ।
सच तो यह है कि बालेन एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिन्होंने पारंपरिक राजनीतिक दलों को चुनौती दी और जनसमर्थन के आधार पर अपनी अलग पहचान बनाई । किंतु लोकप्रियता के साथ–साथ उनके सामने कई गंभीर राजनीतिक, प्रशासनिक और संरचनात्मक चुनौतियाँ भी मौजूद हैं ।
मधेश की उनसे अलग ही उम्मीदें हैं । क्योंकि अभी भी मधेश के लोगों को, मधेश को वह स्थान नहीं मिला है जिसकी उसे चाहत है । मधेश अभी भी अपने पहचान की लड़ाई रह रहा है । मधेश को एक ऐसे नेता की जरुरत है जो उसे सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों का हल दे सकें ।
तराई–मधेश क्षेत्र देश की कृषि अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन यहाँ की आधारभूत संरचना अभी भी अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाती है । इसलिए बालेन से उन्हें यह उम्मीद है कि नई राजनीतिक सोच के साथ वो विकास की राह पर आगे बढ़ाएंगे ।

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मधेश के युवाओं को भी उनसे बहुत उम्मीदें हैं । मधेश से बड़ी संख्या में युवा रोजÞगार के लिए विदेश जाते हैं । शिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी यहाँ की एक बड़ी समस्या रही है । बालेन की लोकप्रियता विशेष रूप से युवाओं के बीच अधिक है, इसलिए यह अपेक्षा भी है कि उनकी नीतियाँ युवाओं को देश के भीतर अवसर प्रदान करने की दिशा में होंगी ।
मधेश लंबे समय से यह महसूस करता रहा है कि राष्ट्रीय राजनीति में उसकी आवाजÞ को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया । मधेश आंदोलन के बाद कुछ संवैधानिक और राजनीतिक परिवर्तन हुए, लेकिन अब भी कई लोग स्वयं को सत्ता के केंद्र से दूर महसूस करते हैं । ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि बालेन एक ऐसी राजनीति को आगे बढ़ाएँगे जहाँ क्षेत्रीय और सामाजिक विविधता को अधिक सम्मान मिले ।
बालेन की लोकप्रियता मुख्यतः व्यक्तिगत छवि और सोशल मीडिया प्रभाव पर आधारित रही है । इस समर्थन को स्थायी राजनीतिक शक्ति में बदलना–जैसे संगठन बनाना, नीति–आधारित राजनीति करना–उनके लिए एक महत्वपूर्ण दीर्घकालिक चुनौती है ।
बालेन साह की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अपनी लोकप्रियता को प्रभावी प्रशासन और संस्थागत सुधार में कैसे बदलते हैं । यदि वे इन चुनौतियों को संतुलित ढंग से संभाल पाते हैं, तो नेपाल की राजनीति में उनका प्रभाव केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति तक भी फैल सकता है ।

कंचना झा
कार्यकारी संपादक,
हिमालिनी ऑनलाइन, www.himalini.com

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