Fri. May 29th, 2020

मधेश के पर्दा पर बेतहास राजनीतिक स्टण्ट : कैलाश महतो

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कैलाश महतो, नवलपरासी | A stunt is an unusual and difficult physical feat or an act requiring a special skill, performed for artistic purposes usually on television, theaters, or cinema. Stunts are  features of many action films.
“Stunt” का शाब्दिक अर्थ शारीरिक कला का कमाल व खतरनाक कृयाकलाप होता है । मगर अब इसका अर्थ शायद बदल रहा है । यह “तमाशा” के अर्थ में प्रयोग होने के करीब है । “शारीरिक कमाल” से अब यह “राजनीतिक कमाल” के रुप में आने के तरखर में है । राजनीतिक बाजार में जब इसका प्रवेश होगा तो वाकई यह एक स्टण्ट ही कहलायेगा जिसे राजनीतिक शब्दकोश में “राजनीतिक स्टण्ट” कहा जायेगा ।
कुछ दिनों से “मोहन वैद्य, सिके राउत, गोपाल किराती र थारु मोर्चा सहितको गठबन्धन बनाउँदै जसपा, यस्तो छ तैयारी” शीर्षक तले डा. बाबुराम भट्टराई, मोहन वैद्य, गोपाल किराँती और डा. सीके राउत सहित का तस्वीर बडी मात्रा में फेसबुक पर भायरल हो रहा है । वह सिर्फ फोटो सहित का विज्ञापन समाचार है जो मेरे कई बार के प्रयास के बावजूद भी इसका विश्लेषणीय समाचार खूला नहीं । शायद बडी सोंच समझ के साथ इसे केबल तस्वीर समाचार बनाने की रणनीति अपनायी गयी है । जो भी हो, इसे “मधेश के पर्दा पर बेतहास राजनीतिक स्टण्ट” कहना कुछ भी अनर्थ न होगा ।
उस तस्वीरीय राजनीतिक विज्ञानपनयुक्त समाचार से किसी की गहराई और मनसाय नापने का प्रपञ्च हो सकता है । साथ ही इससे एक और छुपा हुआ मनोविज्ञान जाहेर हो रहा है कि एक दूसरे का नामतक पचा नहीं सकने बाली सौतन नियतफेक श्रीमान को एेंठने के लिए क्षणिक ही क्यों न हों, आपस में  गठजोड करने की दाँव लगा रही हैं । मगर कुछ राजनीतिक गलियारे के अनुभवी महारथियों को माने तो मामला कुछ और भी हो सकने की संकेत है । वह यह कि सपा और राजपा के मिलन को डा. सीके राउत जैसे वैज्ञानिक, टेक्नोक्र्याट व राजनतीतिज्ञ दो गन्दे नलों के पानियों का मिलन कहते हैं, वहीं पार्टी एकीकरण के राह में रहे प्रस्तावित जसपा और मोहन वैद्य किरण, गोपाल किराँती तथा विप्लव के तीन माओवादी पार्टी, थारु मोर्चा तथा डा सीके राउत के नेतृत्व में रहे जनमत पार्टी समेत नव गठित जसपा का एकीकरण का विज्ञापन केवल फेसबुक पर डाला गया अतिरन्जित फेक न्यूज नहीं, अपितु यह किसी से किसी को मिलने के लिए कोई द्वार तलाश की रणनीति हो सकने की पहलकदमी है । वह चाहे किसी के द्वारा निर्मित पहल क्यों न हो, मगर यह एक घुमावदार प्रस्ताव ही है जो कलात्मक, छद्मभेषी और अप्रत्यक्ष है ।
इस प्रस्तावित समाचारीय विज्ञापन पर जनमत पार्टी बननेतक साथ में रहे जासर यादव ने कडी टिप्पणी की थी । वहीं जनमत पार्टी के केन्द्रीय सदस्य ई. बसन्त कुमार कुशवाहा लगायत के कुछ जनमत नेताओं ने जसपा को म्याद गुजरे (डेट एक्सपायर्ड) पार्टी का संज्ञा देते हुए जनमत पार्टी का मिलन वैसे डेट एक्सपायर्ड भ्रष्ट नेताओं से लवालव पार्टी से होना असंभव बताया है । उसके तुरुन्त बाद जनमत पार्टी के ही केन्द्रीय सदस्य रहे अब्दुल खान ने बडी सतर्कता के साथ उस समाचारीय पोष्ट पर यह लिखते हैं कि विचार समान हो तो पार्टी मिलन न होने की बात नहीं हो सकती । वहीं अधिकांश जनमत और जसपा नेताओं की मौनता बिखरा पडा है । जो भी हो, बडा सोंच समझकर अभिलाषीय चाहत का यह गेम प्लान रचा गया है । खैर राजनीति वह धर्म व संस्कार है जहाँ वह सब संभव है जो किसी भी मानव धर्म और संस्कार में संभव नहीं होता है ।
ताज्जुब की होशियारी तो यह दिख रही है जिनसे मधेश आधारित पार्टियों के मिलन में/से कोई आधारभूत सम्बन्ध की बात ही नहीं है, उन गोपाल किराँती और मोहन वैद्य किरण, जो और जिनके माओवादी पार्टियों का मधेश से उनके संगठन को समर्थन, मरने के लिए लडाकू, पैसे, दानापानी और भोट लेना ही अन्तिम लक्ष्य है, से समेत गठजोड करने की बात तो केवल मधेशियों के आँखों में धूल झोंकने के समान है । सही में कहा जाय तो गोपाल किराँती और मोहन वैद्य किरण के नामों को जोडना महज एक धूर्तीय चालाकी हो सकता है जिनके नामों का पूल बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना है । मानव के दैनिक जीवन में किसी को पाने के लिए हैरान प्रेमी/प्रेमिका जब खुलकर अपने चाहत से प्रत्यक्ष बात न कर पाये तो उसको दिखा/सुनाकर दूसरे तीसरे लोगों की चर्चा करने लगते हैं । अनेक हावभाव प्रदर्शित करते हैं ता कि उसका/उसकी प्रेमी/प्रेमिका डर से, जलन से, खुशी से या हडबडी में उससे प्रेम प्रस्ताव कर दें ।
मामला जो और जैसा भी हो, मधेश यह जरूर चाहता है कि मुद्दा मिलने बाले मधेश आधारित सारे राजनीतिक पार्टियों की एकीकरण हो । मगर सवाल यह है कि मुद्दा किसका किससे मिलेगा । अलग अलग लक्ष्य और उद्देश्यों के प्रणेतायें अगर एकता कायम करता है तो यह मधेश के लिए एक थप अकल्पनीय धोखा के आलावा और कुछ नहीं हो सकता । वैसे पार्टी भविष्य में फिरसे कई टुकडों में विभाजित होने का मजबूत अवस्था मौजूद ही रहता है जो कोई भी जनता नहीं चाहेगी ।
नेपाल के किसी भी राजनीतिक दलों में कोई लोकतान्त्रिक चरित्र नहीं है । किसी भी पार्टी में कोई भी नेता या नेतृत्व पार्टीमुखी, सिद्धान्तमुखी या जनतामुखी नहीं है । सारा पार्टी नेतामुखी है । व्यक्तिमुखी है । नेतामुखी पार्टी से जनता कोई उम्मीद लगाये तो राजनीतिक विद्वानों का यह विश्लेषण सर्वथा सत्य सावित हो जायेगा कि जनता का सही मतलब जानवर ही है । क्योंकि नेपाल के राजनीतिक मैदान में यह बखुबी देखा जा रहा है कि पार्टियों में उन नेता और कार्यकर्ताओं का कोई अहमियत, इज्जत या सम्मान नहीं है जिनके वजह से नेतृत्व का जीवन बना, संगठन निर्माण हुआ । संगठन के निर्माण काल के संकट काल में जनता के ही रुप, रंग और चरित्र के लोग संकट को झेलता है । मगर बाद में उन्हें निकम्मा नासमझ प्राणी बना दिया जाता है । बोलने की , खोजने की और सही बात सुनाने की छुट नहीं दी जाती । उनसे नीचे की आम जनता की दुर्दशा क्या होगी, यह कहने की बात नहीं है ।
जनता राज तो वह प्रणाली है जिसमें चुनावी टिकटतक का वितरण का निर्णय जनता करती है । संगठन जनता चलाती है और नेता केवल प्रशासनिक कार्य करता है, निर्णय नहीं । नेपाल में एक भी कोई पार्टी है जो जनता के मत पर टिका हो ? जनता से पूँछकर कोई निर्णय लेता हो ? अगर होता तो क्या वैश्विक महामारीके काल में सरकार जनता से दूर होती ? सांसद अपहरण होता ? मौत के कफन और दया के पात्रा में भी भ्रष्टाचार होता ?
समझने की समान्य सी बात है कि देश, और खास करके मधेश के लगभग हर पार्टी में जो समान्य और गरीब लोग समाज के नये परिवर्तन के लिए नि: स्वार्थ भाव से अपनी लगानी देते हैं, उन्हें बाद में संगठन के उचाइ पर संगठन से बाइपास कर उन लोगों को वो स्थान दिये जाते हैं जिनकी संकट के समय में कहीं कोई योगदान या नामोनिशान नहीं होता । योगदान करने बालों का वहाँ कोई औकात नहीं रह जाता । वे कुछ कहें तो नेतृत्व उसे अनुशासनहीन का दर्जा देकर कार्रवाई का शिकार बनाता है । एेसे घटना मधेश बेस्ड लगभग सारे पार्टियों में देखा जा रहा है । कमसे कम एेसे गैर-प्रजातान्त्रिक कार्यों पर गंभीरता से रोक लगें ता कि मधेस को सही नेता और नेतृत्व मिल सके । मधेश को न्यायिक स्वाधीनता और अधिकार मिल जाये ।

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