क्या इतिहास बन रही है मिशनरी पत्रकारिता !
30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर

डा श्रीगोपालनारसन एडवोकेट
पहले से संकट के दौर से गुजर रही हिंदी पत्रकारिता को कोरोना महामारी ने तो जैसे निगल ही लिया हो।छोटे, मझोले अखबार तो कोरोना के कारण हुए लॉक डाउन के दो सप्ताह भी नही झेल पाए और धराशाही हो गए।क्षेत्रीय ,प्रादेशिक व राष्ट्रीय अखबार भी लॉक डाउन की बढ़ती अवधि के साथ सिमट कर रह गए है।अधिकांश पत्र पत्रिकाओं को पाठको तक पहुंचाया ही नही जा सका।जिस कारण पाठक मात्र डिजिटल अंक के सहारे लॉक डाउन का समय व्यतीत करते रहे।इस बदले हालात में और इतिहास बनती हिंदी पत्रकारिता को बचाने के लिए विचार करना होगा कि
सुबह का अखबार कैसा हो? समाचार चैनलों पर क्या परोसा जाए? क्या नकारात्मक समाचारों से परहेज कर सकारात्मक समाचारों की पत्रकारिता संभव है ?क्या धार्मिक समाचारों को समाचार पत्रों में स्थान देकर पाठको को धर्मावलम्बी बनाया जा सकता है ? पिछले वर्ष देश के 15सौ पत्रकारों ने ब्रहमाकुमारीज के माउण्ट आबू में हुए एक मीडिया सम्मेलन में एक स्वर में निर्णय लिया गया था कि व्यक्तिगत एवं राष्टृीय उन्नति के लिए उज्जवल चरित्र व सांस्कृतिक निर्माण के सहारे सकारात्मक समाचारों को प्राथमिकता देकर मीडिया सामग्री में व्यापक बदलाव किया जाए। सम्मेलन में विकास से सम्बन्धित समाचारों,साक्षता,संस्कृति,नैति कता और आध्यात्मिक मूल्य जैसे मुददों का समावेश कर स्वस्थ पत्रकारिता का लक्ष्य निर्धारित करने की मंाग की गई थी। आज देशभर में 700 से अधिक चैनल चल रहे है। जिनमें से कई चैनल ऐसे है जो समाज के सुदृडीकरण के लिए खतरनाक है। इन चैनलों पर इतनी अश्लीलता दिखाई जाती है कि उसे पूरा परिवार एक साथ बैठकर नही देख सकता। ऐसे चैनलों पर कोई रोक भी नही है। इसलिए ऐसे चैनलों को ऐसी आपत्तिजनक सामग्री
परोसने के बजाए समग्र परिवार हित की सामग्री परोसने पर इन चैनलों को विचार करना चाहिए।सम्मेलन में ऐसे समाचारों को परोसने से परहेज करने की सलाह दी गई थी जिसको चैनल पर देखकर या फिर अखबार में पढकर मन खराब होता हो या फिर दिमाग में तनाव
उत्पन्न होता हो।दरअसल बदलते दौर में हिन्दी पत्रकारिता के भी मायने बदल गए है। दुनिया को मुठठी में करने के बजाए पत्रकारिता
गली मोहल्लो तक सिकुडती जा रही है। अपने आप को राष्टृीय स्तर का बताने वाले समाचार पत्र क्षेत्रीयता के दायरे में और क्षेत्रीय स्तर का बताने वाले समाचार पत्र स्थानीयता के दायरे में सिमटते जा रहे है। जो पत्रकारिता के लिए शुभ संकेत नही है। सही मायने में पत्रकारिता का अर्थ अपनी और दुसरों की बात को दूर तक पंहुचाना है।साथ ही यह भी जरूरी है कि किस धटना को खबर बनाया जाए और किसे नही? आज की पत्रकारिता बाजारवाद से ग्रसित होने के साथ साथ मल्यों की दृष्टि से रसातल की तरफ जा रही है। बगैर कार्यक्रम हुए ही कपोल कल्पित कार्यक्रम की खबरे आज अखबारो की सुर्खिया बनने लगी है,सिर्फ नाम छपवाने के लिए जारी झूठी सच्ची विज्ञप्तियों के आधार पर एक एक खबर के साथ बीस बीस नाम प्रकाशित किये जाने लगे है जो पत्रकारिता की विश्वसनीयता को न सिर्फ प्रभावित कर रहे है बल्कि ऐसी पत्रकारिता पर सवाल उठने भी स्वाभाविक है। इसके पीछे अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि जितने ज्यादा नाम प्रकाशित होगे, उतना ही ज्यादा अखबार बिकेगा, लेकिन यह पत्रकारिता के स्वास्थ्य के लिए ठीक नही है । ठीक यह भी नही है कि प्रसार संख्या बढाने की गरज से समाचार पत्र को इतना अधिक स्थानीय कर दिया जाए कि वह गली मोहल्ले का अखबार बन कर रह जाए। आज हालत यह है कि ज्यादातर अखबार जिले और तहसील तक सिमट कर रह गए है। यानि एक शहर की खबरे दूसरे शहर तक नही पंहुच पाती।उत्तराखण्ड के सीमावर्ती कस्बे गुरूकुल नारसन और मुजफफरनगर जिले के पुरकाजी कस्बे में मात्र 4 किमी का अन्तर है लेकिन जिला और प्रदेश बदल जाने के कारण एक कस्बे की खबरे दूसरे तक नही पंहुच पाती है।इससे पाठक स्वयं को ठगा सा महसूस करता है। ऐसा नही है कि स्थानीय खबरो की जरूरत न हो, लेकिन यदि एक अखबार में लॉक डाउन से पहले 4से 6 पेज स्थानीय खबरो के होते थे जो अब दो पृष्ठों में सिमट कर रह गए है।इससे पाठक को क्षेत्रीय,राष्टृीय और अर्न्तराष्टृीय खबरे कम पढने को मिल रही है, जो उनके साथ अन्याय है। वैसे भी खबर वही है, जो दूर तक जाए यानि दूरदराज के क्षेत्रो तक पढी जाए। दो दशक पहले तक स्थानीय खबरो पर आधारित अखबार बहुत कम थे। पाठक राष्टृीय स्तर के अखबारो पर निर्भर रहता था। वही लोगो की अखबार पढने में रूची भी कम थी। स्थानीय अखबारो ने पाठक संख्या तो बढाई है लेकिन पत्रकारिता के स्तर को कम भी किया है। आज पीत पत्रकारिता और खरीदी गई खबरो से मिशनरी पत्रकारिता को भारी क्षति हुई है। जिसे देखकर लगता है जैसे पत्रकारिता एक मिशन न होकर बाजार का हिस्सा बनकर गई हो। पत्रकारिता में परिपक्व लोगो की कमी,पत्रकारिता पर हावी होते विज्ञापन,पत्रकारो के बजाए मैनेजरो के हाथ में खेलती पत्रकारिता ने स्वयं को बहुत नुकसान पहुँचाया है।जरूरी है पत्रकारिता निष्पक्ष हो लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है ऐसी खबर जो सच होते हुए भी राष्टृ और समाज के लिए हानिकारक हो, तो ऐसी खबरो से परहेज करना बेहतर होता है। पिछले दिनों देश में गोला बारूद की कमी को लेकर जो खबरे आई थी वह राष्टृ हित में नही थी इसलिए ऐसी खबरो से बचा जाना चाहिए था। जस्टिस मार्कण्डेय काटजू का यह ब्यान कि पत्रकारिता को एक आचार संहिता की आवश्यता
है,अपने आप में सही है बस जरूरत इस बात कि है कि यह आचार संहिता स्वयं पत्रकार तय करे कि उसे मिशनरी पत्रकारिता को बचाने के लिए क्या रास्ता अपनाना चाहिए जिससे स्वायतता और पत्रकारिता दोनो बची रह सके। इसके लिए जरूरी है कि पत्रकार प्रशिक्षित हो
और उसे पत्रकारिता की अच्छी समझ हो,साथ ही उसे प्रयाप्त वेतन भी मिले।ताकि वह शान के साथ पत्रकारिता कर सके और उसका भरण पोषण भी ठीक ढंग से हो।तभी पत्रकारिता अपने मानदण्डो पर खरी उतर सकती है और अपने मिशनरी स्वरूप को इतिहास बनने से बचा सकती है।
डाश्रीगोपालनारसन एडवोकेट
पोस्ट बॉक्स 81,रुड़की, उत्तराखंड

