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भटकता नेपाल कराहते नेपाली

ajay-kumar-jha
 
अजय झा
लोकतन्त्र खतरा में है। हम नेपालियों के बिरुद्ध षडयंत्र रचा जा रहा है। विस्तारवादी और सामंतवादी फिर से सक्रिय हो रहे हैं।
मित्रों! ये दिशाहीन मानसिकता के धनी नेपाली सत्ताधारियों की महावाणी है, जो बार बार मुहाबरों और लोकोक्तियों के रूप में हारे हुए योद्धा के आक्रोश भरे अल्पायु और त्वरित परिवर्तनशील ध्वनियों के साथ नेपाली मिडिया में सुनाई देता रहता है। यही इस देश के पथ प्रदर्शक के रुप मेै सत्तासीन भी हैं। आज नेपाल की दुर्गति और ऐतिहासिक अवनति का द्योतक भी यही सोच है। जब मार्कस के संतान  गरीब और बीमार नागरिक के रक्त को बेचकर व्यक्तिगत सुख सयल और समृद्धि के लिए सामंतियों को मात करते हुए करोंडों की गाड़ी और कार्पेट पे चलतें हों, उनके दैनिक जीबन के अनावश्यक सुविधाओं के परिपूर्ति हेतु जो नागरिको के हृदय और अस्थिपंजर तक को निचोड़कर ऐशोआराम की जिंदगी जीने के लिए लालायित हो; वहाँ के गरोबों का क्या हाल होगा? कितना दोहन किया जा रहा होगा? क्या पीढियों तक गुलामी के जिंदगी जीने को बाध्य करने का योजना नहीं बनाते होंगे? क्या यह हमारे यहाँ सामाजिक जीबन में नहीं देखा जा सकता है? जो लुटेरा था, नालायक था, गुणहीन था आज वह ताज पहनकर राज कर रहा है। बाँकी के सभी ताली बजाने में गौरव अनुभव करते हैं। क्या कभी आपने इस विषय पर गौर से ध्यान दिया? गरीबो के मसीहा कम्युनिष्ट के शासन में योजना बद्ध रुप मे भ्रष्टाचार कर गरीबी के संख्या को क्यों बढ़ाया जाता है? किसी ख़ास जाति-समुदाय और वर्ग के प्रति उत्तेजित और घटिया शब्दों का प्रयोग कर जनता में उत्तेजना तथा आक्रोश क्यों भरा जाता है? मिडिया कर्मियों के द्वारा सारे लोकतांत्रिक सिद्धांत तथा मूल्य मान्यताओं को नष्टकर राज्य शक्ति के बलपर किसी निर्दोष व्यक्ति तथा वर्ग विशेष के ऊपर भौतिक आक्रमण और चरित्र हत्या को बल पहुँचाने बाली आवाज को क्यों बुलंद किया जाता है? वास्तविक दोषी तथा भ्रष्ट देशद्रोहियों को क्यों समरक्षण दिया जाता है? इन सारे सवालों का एक ही जबाब है। हम नेपाली नागरिक लोकतंत्र में नहीं नाजितंत्र में जी रहे  हैं। संवैधानिक राजतन्त्र के संस्कारित सभ्यताको हमने लात मारकर हिटलर और इदिअमिन के हाथों में अपनी जीबन के बागडोर को सौप दिया है। उसीका परिणाम  आज हमारे सामने है। यह तो झलक मात्र है। इसका भीषण नरसंहारक रूपका योजना तो अभी हमारे मूढ़ शासक को भी पता नहीं है। वैसे कठपुतलियों का काम अपने मालिक के इशारे पर नाचना भर होता है। इसको हमारे आधिकारिक लोग पूर्ण इमानदारी के साथ निर्वाह कर रहे हैं। वैसे देश के आवरू को बेचने में आधिकारिक व्यक्ति ही अग्रभूमिका का निर्वहन करते आए हैं। सुगौली सन्धि में नेपाल के पक्ष से हस्ताक्षर करनेवाले माहन आत्माओं में राजगुरु गजराज मिश्र और चंद्रशेखर उपाध्याय थें, जो सन्धि के बाद नेपाल देश को छोड़कर भारत में ही बस गए। ज्ञातव्य हो! इसके लिए उन्हें इतनी रकम दी गई कि आज भी गजराज मिश्र के वंशज बनारस में और चंद्रशेखर उपाध्याय के वंशज विहार के मुजफरपुर में राज कर रहे हैं। इसी प्रकार आजतक जितने सन्धि और समझौता नेपाल का किसी अन्य देश के साथ हुआ है, सबके पीछे भीषण षडयंत्र की ध्वनि बारम्बार सुनाई देती है।
आज संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र के स्वरूप में दिखाई पर रहा प्रजातन्त्र
का लाभ आम नेपाली नागरिक को न मिलकर मुट्ठी भर कार्यकर्ता और ख़ास वर्ग में सिमित है। जनता में अकुलाहट होना स्वाभाविक है। जनता पर हो रहे भीषण अत्याचार और षडयंत्र को नजरअंदाज करने के लिए पडोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण पौराणिक सम्बन्ध को उग्र राष्ट्रवाद के नामपर आतंकित वातावरण का सृजना कर वैमनस्य में बदल सामूहिक ध्यान को भटकाया जा रहा है। मधेसी, जनजाति, थारु, दलित और पिछड़े वर्ग जो कुल आवादी के 88% है, पर देशद्रोही के विल्ला लगाने का मनोवैज्ञानिक दवाव बनाया जा रहा है। जबकि राष्ट्रघाती सभी सन्धियों में  नेपाल के ओर से हस्ताक्षर करने वाले सत्ताधारी वर्ग का ही रहा है।
सन् १९५० के नेपाल भारत सन्धि में नेपाल के तर्फ से तत्कालीन प्रधानमन्त्री मोहन शम्शेर और भारत के तर्फ से तत्कालीन भारतीय राजदूत चन्द्रेश्वरप्रसाद नारायण सिंह ने हस्ताक्षर किया था।
इसी सन्धि में नेपाल के प्राकृतिक श्रोत पर अन्य देशों की तुलना में भारत का पहला अधिकार होने का उल्लेख है। दोनों देशों के नागरिक को दोनों देशों में बसोवास, सम्पत्ति खरिद, व्यापार और वाणिज्य में सहभागिता या आवातजावत के एक दुसरे के नागरिक के साथ सामान राष्ट्रिय व्यवहार करने की सन्धि धारा ७ में उल्लेख मिलता है। अब सोचनेबाली बात ये  है कि क्या भारत ने कभी भी नेपालियों को केंद्र में रखकर ऋतिक रोशन काण्ड किया? माधुरी दीक्षित काण्ड किया? नेपाल बिरोधी कार्य किया ?  हा, देश में प्रजातंत्र बहाली के लिए आम नेपाली नागरिको के अनुरोध पर क्रूर शासक को तह लगाने में नेपाली नागरिक को सहयोग अवश्य किया है। नेपाली उस सहयोग को आज नाकाबंदी का नाम देकर भारत के उपकार को लात मारकर विश्व मानवता के शत्रु को पूजा करने लगा है। यह एक मानवीय दोष है कि हम उसे कभी भी माफ़ नहीं करते जो हमें विपत की घडी में सहयोग किया हो। जो हमपर दया दिखाता है, उसे हम हर हाल में कमजोर बनाकर उसपर दया दिखाना चाहते हैं। आज नेपाल वही करने जा रहा है। इसको इतना भी होश नहीं कि, ये किस किस पर दया दिखा पाएगा! इनको इतना भी होश नहीं है कि यदि भारत ने इन्हें पढ़ना नहीं सिखाया होता तो ये आज सामूहिक लेबर होते। जिस समय राजा के शिक्षा की व्यवस्था की गई थी उस समय मधेश के आम लोग एम ए की डिग्री लेकर मौज में जी रहे थें। लेकिन आज हमें अशिक्षित कहा जाता है। मधेसी अशिक्षित रहे इसके लिए योजना बनाकार काम किया जाता है। वैसे वे लोग इसमे सफल होते आए हैं, परन्तु प्रकृति ख़ास समय पर सबका हिसाब किताब बराबर कर देती है। आज यूरोप और अमेरिका के सभ्य, सुशिक्षित और सुन्दर लोगों का कोरोना के कारण हर बदहाली प्रकृति के कहर का ही प्रमाण है। जो कौम षडयंत्र को अपना मौलिक अंग बनालेता है वो
धीरे धीरे हम अपनी जड़ से कटकर खाई की ओर लुढ़कने लगता हैं। आज हम नेपाली बुद्धिजिबियों को इसीमे भविष्य दिखाई दे रहा है परन्तु जिस प्रकार सांस्कृतिक रूप से विनास होने पर धरती के इतिहास से नामोनिसान मिट जाता है, उसी प्रकार अपनी पौराणिक संस्कार और आधार से कट जाने पर फिर से खड़े होने के लिए भविष्य मौका नहीं देता। सावधानी यही पर बरतने की आवश्यकता है। मेरे भाव का अर्थ भारत को सर्वश्व मानने का नहीं है। हम स्वयं मानव जाति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कालखण्ड को संवोधित करने का गौरव रखतें हैं। आज वह गौरव अपने ही मूढ़ विद्वान् और भटके हुए राजनीति कर्मियों के अदूरदर्शिता तथा क्षणिक भौतिक-पदीय लाभ के कारण नष्ट कर रहे हैं।
एक तरफ लोग महामारी से मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं। लोगों में भयानक संताप और जीबन के प्रति अनिश्चितता भरा हुआ है। नागरिक त्राहिमाम कर रहे हैं, वही षडयंत्रकारी लोग भाषा के नामपर देशको दिग्भ्रमित करने पर तुले हैं। एक दुसरे के प्रति अपशब्द और गालियों का बौछार कर अपनी मानसिक दरिद्री को प्रकट कर रहे हैं। जनता संक्रमित होकर क्वारणटीन में दम तोड़ रहे हैं। आत्म हत्या कर रहे हैं। यहाँ सरकार को भ्रष्टाचार से ही फुर्सत नहीं है। भ्रष्ट मंत्रियों को खुलेआम बचाने में सरकार व्यस्त है। इसी प्रकार महामारी के कारण जनता मृत्यु के मुख में और सरकार ब्रह्मलुट में है। सरकारी रवैये से हतोत्साहित नागरिक किसी तारणहार की ओर नजरे लगाए बैठी है। वैकल्पिक शक्ति की खोज आम नागरिक के लिए बाध्यता हो गया है।
सरकार अपनी कमजोरी को छुपाने के तथा आम नागरिक के ध्यान को तथ्य से भटकाने के लिए कार्यकर्ताओं को उग्र राष्टवाद को हवा देकर जनता में आतंक और हिंसात्मक वीरत्व का बीजारोपण कर रही है। आम गरीब तथा दलित नागरिक अपनी भविष्य को राजा में सुरक्षित देखने लगी है। उधर हिन्दू राष्ट्र का डंका पीटने वालों की संख्या दिनप्रतिदिन बढती दिखाई दे रहा है। कृषि प्रधान देश में कृषक भूखे मर रहे हैं। पर्यटकीय देश बनाने का सपना भी कोरोना के कारण मटियामेट होने लगा है। व्यापारी और उद्योपतियों के प्रति नेपाली युवाओं में भारत विरोधी मानसिकता का सृजनाकर पलायन होने पर मजबूर किया जा रहा है। योग्य तथा संस्कारित देशभक्त नागरिक उत्पादन का केंद्र विद्यालय तथा विश्वविद्यालय नेपाल विरोधी तत्वों के हाथों में सौप दिया गया है, जहाँ वे पिशाचनीति और भ्रष्टाचार का पाठ सिखाते हैं। सभी पार्टी और सारे नेताओं बीच देश को लूटने और आपस में बाँटते समय अदभुत समझदारी कायम हो जाता है। उपर्युक्त सभी क्रियाकलाप धीरे धीरे जनता को चीनी नागरिक की तरह निरीह और दया का पात्र बनाने का षडयंत्र सफल होते दिख रहा है।
नोट:- गरीबों के मसीहा के लिए गरीब नागरिक होना अनिवार्य है। अतः कम्युनिष्ट कभी भी गरीबी को नहीं मिटने देगा। वो तो संपन्न को भी गरीब बनाकर अपना प्रतिद्वंद्वी कम करने में लगा है। दुर्भाग्य तो तब अनुभव में आता है, जब कांग्रेस के नेता भी ऐसा ही मूधातापूर्ण व्यवहार जनता के साथ करने लगते हैं। उनको लगता है कि गरीब को बिकसित करने पर उनकी बाबूसाहबी चला जाएगा। अरे मूढ़!अब तो तुम भी लेबर क्लास में आने ही लगे हो जिसका तुम्हें भान ही नहीं हो रहा है।
इस प्रकार गंभीरता पूर्वक देखने पर यह ज्ञात होता है कि नेपाल में प्रजातांत्रिक बिचारधरा के लोग ही नहीं है। सब के सब सामंती सोच से ग्रसित है। जहाँ आर्थिक लोभ चरम पर हो, इज्जत और प्रतिष्ठा से उपर धन हो जाय, तो समझ लेना नेता राजा बनना चाहता है। अब वह जनता के अस्थिपंजर को भी बेचकर सम्पतिशाली बनेगा। इसका रूप अनेकों हो सकता है। कोई किडनी चोर के रुपमे दिखाई देगा, कोई कफ़नचोर के रुपमे। जिसके लिए शक्ति सर्वोपरि है, वह उसे पाने के लिए देश को भी दाव पर लगा देगा। भारत के नेता लोग पाकिस्तान से सहायता मांगने पहुँच जाते है। हमारे यहाँ दिल्ली दरबार, लैनचौर, युरोपियन संघ के दरबार, चाइना गेट तथा अमेरिका द्वार पर नतमस्तक होने वालों की कमी नहीं है। अतः ऐसे चरित्र से देश और नागरिक अपने को सुरक्षित और सम्मानित कैसे महसुस करेगा?
ध्यान देनेबाली बात यह है कि माओवादी युद्ध में बीस हजार नेपाली युवा किसलिए मौत के घाट उतार दी गए? कोई एक दूरगामी सर्वजन हिताय योजना तो अवश्य रहा होगा! लेकिन आज सत्ता में आने के वाद क्या परिवर्तन हो पाया है? बस 97% जनता के विरोध में बिना मांग के ही धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया गया। और सैकड़ो मधेशी के बलिदान के वाद बाध्य होकर संघीय प्रणाली लाया गया जो मौलिक रूपसे माओवादियों का एजेंडा था, लेकिन उसमे उसके भाई बंधुओं के पाँव उखड़ते नजर आ रहा था। चाहे वो राजतन्त्र हो या खसतंत्र। आज भी संघ का विरोधी कोई मधेसी, दलित, जनजाति या आदिवासी थारु नहीं है।
अब और क्या प्रमाण चाहिए कि वास्तव में चित्रबहादुर केसी द्वारा इसका बारम्बार विरोध क्यों? संघको हटाने की मांग क्यों? गणतंत्र के विरोध में बोलने बालों पर कार्यवाही के बदले मौन समर्थन का मतलब क्या है? एसे में उन युवाओं का देशभक्ति कहाँ छुप जाता है? क्या उनका देशभक्ति भी व्यक्ति विशेष को देखकर ही उमड़ता है? ऐसे हजारों सवाल है जिसका विश्लेषण नेपाली विद्वानों को करना चाहिए।
आम नेपाली नागरिक से लोकतंत्र का महत्व या लाभ अथवा आवश्यकता पूछने पर अधिकाँश लोग निराशाजनक प्रतिक्रिया ही देते हैं। गाँव के सीधे साधे नागरिक भी इनसे क्षुब्ध नजर आते हैं। लोकतंत्र पर खतरा है? के जबाब में वो प्रश्न करते हैं; किससे खतरा है? आम नागरिक से या लुटेरे नेताओं से? इस प्रकार उनका जबाब हृदय को बिध जाता है। मायूसी भरे सब्दों में ‘राजा ही हमलोग के ठीक था’ बोल जाते हैं।
यह एक भावनात्मक प्रतिक्रिया जरुर है, लेकिन शुभ संकेत नहीं है। हो सकता है इसके प्रतिक्रिया में बुद्धिमान नेता ही कुछ उल्टा कर बैठे! जिसका संकेत तो बारबार सुनाई पड़ता रहता है। हाल में ही पार्टी फोरुआ विधेयक को लेकर एसे ही वक्तव्य आने लगे थे। एम् सी सी को लेकर भी यह सुनाई पड़ रहा है।
लेकिन कालापानी सन्धि को किसने देश के विरुद्ध में आत्मा को बेचकर हस्ताक्षर किया? इसपर आन्दोलन क्यों नहीं हो रहा है? क्या इसमे सरिता गिरी फ़सने बाली है? क्या कोई मधेशी जनजाति इसमे सक्रीय था? यदि नहीं! तो इतना पक्का है कि सरिता गिरी जैसे दूर दूर तक इस मुद्दा से सम्बन्ध न रखनेबाले  सामान्य व्यक्तिओं को योजनाबद्ध रुप में आपसी समझदारी के तहत केंद्र बनाकर दिखाबे की राष्ट्रीयता का प्रदर्शन होगा और मिलजुलकर समस्या का समाधान भी निकाल लिया जाएगा। बेचारे बेहोश देशभक्त युवाको तथाकथित आन्दोलन में झोककर ऊर्जाहीन बनाकर झूठ के बिजय का माला लगा दिया जाएगा।
नेपाली राष्ट्रीयता न झुका है न झुकेगा

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