विदेशी बहु को सात वर्ष बाद नागरिकता देने का नेकपा का निर्णय विभेदपूर्ण : चन्दन दुबे
चन्दन दुबे, जनकपुर ।विदेशी बहु को ७ वर्षों के बाद नागरिकता देने का नेकपा का निर्णय मधेश के प्रति पूर्वाग्रही और दुर्भाग्यपूर्ण है।यह निर्णय निःसंदेह मधेशीयों को लक्षित करके ही लिया गया है।इस निर्णय से भारत के साथ सदियों से चला आ रहा हमारा रोटी और बेटी का सम्बन्ध दुष्प्रभावित होगा।
चीन के हाथों की कठपुतली मात्र बन चुकी नेकपा पार्टी और नेपाल सरकार ने अपने आका जिनपिंग को खुश करने के लिए तत्काल कुछ विवादास्पद निर्णय लिए हैं ये भी उसी कड़ी में लिया गया निर्णय है।
देश की जनता की रोटी कपड़ा और मकान के साथ साथ कमाई,पढ़ाई और दवाई तक कि आवश्यक जरूरतें तक पूरी नहीं कर सकने वाली ये निकम्मी सरकार अपनी आयु लंबी करने हेतु सिर्फ मधेश और भारत विरोधी निर्णय करती जा रही है ताकि चीन का समर्थन प्राप्त होता रहे और ये असक्षम और निकम्मी सरकार टिकी रह सके।
इस सन्दर्भ में मधेशी आयोग का वक्तव्य तक नहीं आना भी आश्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है।ऐसे परिस्थितियों में मधेशी आयोग के औचित्य पर ही प्रश्न उठता भी दिखाई पड़ता है।
नेकपा के इस निर्णय के विरुद्ध सम्पूर्ण लोकतंत्रवादी शक्तियों और दक्षिणपंथियोंको तत्काल एकजुट होने की और इस निर्णय का विरोध करने की आवश्यकता है।
चिनियाँ कम्युनिस्ट पार्टी और चिनियाँ सरकार के निर्देशन में संचालित इस कठपुतली नेपाल सरकार के गतिविधियों को गौर करें तो नेपाल को तिब्बत बनने का खतरा मंडराता हुआ दिखाई पड़ने लगा है।
हमारे राष्ट्रीय गौरव सगरमाथा पर चीन सैटेलाइट लगाता है और उसकी ऊंचाई मनोमानी तरीके से नापता है किन्तु ये निकम्मी सरकार उसके विरुद्ध एक प्रतिक्रिया तक नहीं देती है,चीन भारत के साथ चल रहे उसके निजी विवाद में भी चालाकीपूर्वक हमारा नाम लेता है किन्तु ये सरकार उस विषय पर भी कोई आधिकारिक स्पष्टयोक्ति तक जारी नहीं करती।
क्या हम चीन के उपनिवेश हो गए हैं?, क्या हमारा अपना कोई वजूद नहीं बचा?,क्या नेपाल की सारभौमसत्ता और स्वाभिमान चीन के हाथों गिरवी रख दिया गया है? कुर्सी बचाए रखने के लिए भारत जैसे सहयोगी मित्र का विरोध करना और चीन जैसे चालाक पड़ोसी के प्रति समर्पित होना नेपाल के हित मे कितना फायदेमंद और कितना खतरनाक हो सकता है? ऐसे अनेकों प्रश्न नेपाली नागरिकों और बुद्धिजीवियों के मन मे कौंध रहीं हैं।
नेपाल एक संघीय लोकतांत्रिक गणतन्त्र है और इस देश मे लोकतन्त्र को मजबूत करने की आवश्यकता है किन्तु जिस प्रकार संविधान संशोधन के नाम पर नेपाल सरकार ने आदिवाशियों,दलितों जनजातियों,मुश्लिमों,महिलाओं,थारू और मधेशीयों के अधिकारों को कुंठित और वंचित करने का काम किया है उससे नेपाल सरकार के द्वारा लोकतन्त्र और संघीयता पर लगातार प्रहार होता प्रतीत होता है।
दुनियाँ वैश्विक महामारी कोरोना की चपेट में है और नेपाल भी गम्भीर रूप से इस प्रकोप को झेल रहा है।स्थिति यह है कि कोविड १९ नियंत्रण के लिए दस अरब रुपये खर्च करने का दावा करने वाली इस के पी ओली सरकार ने सभी संभावित लोगों का पीसीआर टेस्ट तक नहीं कराया है।मुसाफिर सैकड़ों किलोमीटर पैदल सफर करने को बाध्य हैं और इस सरकार ने लोगों की भूख और रहन सहन तक का न्यूनतम व्यवस्थापन तक नहीं किया है
अदरक,लहसुन,हल्दी और दालचीनी से कोरोना का उपचार करने की सल्लाह देनेवाले प्रधानमंत्री के पी ओली कभी भी समग्र राष्ट्र के हित मे गम्भीर दिखाई नहीं देते हैं और चीन का महिमामण्डन करके कुर्सी की आयु बढ़ाना उनके इस कार्यकाल का एकमात्र लक्ष्य है जिसकी वजह से नेकपा और नेपाल सरकार मधेस और भारत के हितों के विपरीत लगातार विवादास्पद निर्णय लेती जा रही है।
हालांकि अभी नेकपा ने विदेशी बहुओं के हक़ में नागरिकता सम्बन्धी जो विवादास्पद, पूर्वाग्रही और अनर्गल निर्णय लिया है इसका सम्बन्ध सीधे सीधे मधेस से भारत के वैवाहिक रिश्तों को कमजोर करने से है और मधेस किसी भी सूरत में भारत के साथ सदियों से कायम बेटी रोटी के सम्बन्ध को खोना नहीं चाहेगा।
अपितु नेकपा ने आका चीन को खुश करने के लिए नागरिकता सम्बन्धी उक्त विवादित निर्णय किया हो किन्तु अगर नेपाल सरकार ने इस निर्णय को संवैधानिक शक्ल देने की कोशिश की तो मधेस एक बार फिर माक़ूल जवाब देने की तैयारी कर सकता है।
चन्दन दुबे

