नागरिकता विधेयक – रिश्तों पर प्रहार : डा श्वेता दीप्ति
डा श्वेता दीप्ति, काठमांडू | कम्यूनिस्ट सरकार ने पहले की ही तरह बहुमत का प्रयोग करते हुए नागरिकता विधेयक संसदीय समिति से पास कर दिया है । वर्षों से उलझा हुआ विषय सुलझ चुका है । सरकार जानती है कि यह माहोल उनके निर्णय को पारित करने के लिहाज से बिल्कुल सही है । एक नए नेपाल का निर्माण हो रहा है । परिभाषाएँ बदल रही हैं । आर्थिक तौर पर भले ही देश रसातल की ओर जा रहा हो पर सामाजिक और साँस्कृतिक परिभाषाओं को तोड़कर एक नई परिभाषा राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि में गढी जा रही है । नेपाल की नींव में भारत के साथ के जो साँस्कृतिक और धार्मिक आधार थे उसे दीमक लग चुका है जो वक्त के साथ सरकार की नीति के तहत खोखला होता चला जाएगा । और यही यहाँ का समुदाय चाहता रहा है । विवाह पश्चात् सात वर्ष का इंतजार और उसके बाद नागरिकता वह भी अंगीकृत । गौर करने वाली बात यह है कि विदेशियों को पहले ही संवैधानिक तौर पर हर महत्वपूर्ण पद से वंचित किया जा चुका है । यानि राष्ट्र को उनसे कोई तथाकथित खतरा नहीं है वैसे भी आजतक कोइृ ऐसा रिकार्ड नहीं है कि कोई अंगीकृत बहु ने इस देश को किसी भी स्तर पर हानि पहुँचाई हो । फिर यह सात वर्षों के बाद की नागरिकता का क्या औचित्य है यह तो सत्ता पक्ष या यहाँ के राष्ट्रवादी ही जानें ।
पर इस विधेयक से उपजे कुछ सवाल का जवाब तो अवश्य चाहिए । हम सभी जानते हैं कि हिन्दू विवाह एक सामाजिक परम्परा ही नहीं एक धार्मिक अनुष्ठान है । जहाँ विवाह पश्चात सामाजिक तौर पर बेटी का रिश्ता मायके से खत्म हो जाता है । वह अपने पति के साथ ही पति को प्राप्त अधिकारों को साझा करती है । यानि उसे स्वतः पहचान मिल जाती है । पर जो कानून यहाँ बन रहा है क्या वह यह बताएगा कि सात साल तक नागरिकता विहीन पत्नी क्या अपनी अधूरी शिक्षा प्राप्त कर पाएगी, क्या उसे अपने नाम से संपत्ति खरीदने का अधिकार होगा, क्या वह किसी सरकारी या गैर सरकारी नौकरी के लिए योग्य होगी, क्या उसे विदेश भ्रमण के लिए पासपोर्ट बनाने की अनुमति होगी, क्या वह अपने नाम से किसी व्यापार को शुरु कर सकती है ? जिन्दगी और मौत का भरोसा नही है ऐसे में अगर वह विधवा होती है तो उसे क्या अधिकार मिलेगा ? अगर तलाकशुदा होती है तब उसे क्या अधिकार मिलेगा ? शादी की उमर आजकल पचीस छब्बीस हो गई है ऐसे में सात सालों के बाद क्या वह किसी भी नौकरी के लिए लम्बे समय तक प्रतिभागी हो पाएगी ? और अगर सरकार ये सभी सुविधा नागरिकता पत्र जारी किए बगैर देती है तो नागरिकता की आवश्यकता ही नहीं है फिर तो वह महज औपचारिकता है । अनुमति पत्र या आवासीय पत्र का प्रावधान सीधी तौर पर महिला अस्मिता के साथ खिलवाड है । आत्मसम्मान पर चोट है । ब्याह व्यवसाय नही है जिसके लिए अनुमति पत्र की आवश्यकता होती है या व्यवसाय हेतु विदेश में रहने के लिए पहचानपत्र या आवासीय पत्र जारी किया जाय । नीति नियम इतनी जल्दी और आसानी से नहीं बनते हैं । यह सच सभी जानते हैं । और अगर इन सभी बातों पर विचार किए बगैर यह नागरिकता नियम बन गया है तो इस बीच या इससे पहले अगर कोई विदेशी बहु आ चुकी है तो उसका क्या होगा ?
हर बार नागरिकता के विषय पर भारत की चर्चा की जाती है । किन्तु समझ में नहीं आता कि जिस भारत की ये चर्चा करते हैं उसके बारे में इनकी जानकारी इतनी अधूरी क्यों है ? वहाँ शादी के बाद राशन कार्ड और वोटर कार्ड सहजता से मिल जाता है । जिसके आधार पर सारे काम चाहे वो आर्थिक हो या शैक्षिक पूरे हो जाते हैं । अब तो वहाँ हर काम को विभिन्न कार्ड जारी कर सम्पन्न कराए जाते हैं । नागरिकता जैसी कोई पहचानपत्र की आवश्यकता नही होती है । सारे काम पंचायत स्तर पर होते हैं और बहु की पहचान उसके पति और परिवार से होती है और उसके आधार पर ही उसे सामान्य नागरिक का अधिकार मिल जाता है ।
आज सरकार ने जो कदम परिचालित किया है वह सीधी तौर पर मधेश की संस्कृति पर प्रहार नजर आ रहा है । पर सरकार शायद उन पहाड़ी नागरिकों को भूल रही है जिनके वैवाहिक सम्बन्ध दार्जिलिंग, सिक्किम, गंगटोक, सिलीगुड़ी जैसे जगहों पर होते हैं । क्या उनके लिए यह प्रावधान दिक्कत खड़ी नहीं करेगा क्योंकि वो तो आपके अपने हैं उनके लिए सोचिए सरकार । आपके यह कह देने से कि विदेशी से शादी ही क्यों करनी पड़ी किसी की व्यक्तिगत पसंद को नहीं बदल सकती । मधेश से अधिक पहाड़ के बच्चे भारत या अन्य देशों में जाते हैं क्या आप उनकी पसंद बदल सकते हैं ? या उनसे यह उम्मीद की जाए कि रिश्तों के नाम पर व्यभिचार को बढ़ावा दें ? हम आज तक हिन्दू परम्परा के पोषक रहे हैं । अन्य किसी धर्मों की तरह न तो हमारे यहाँ शादियाँ आसानी से होती है न ही आसानी से शादियाँ टूटती हैं । नियम और कानून की धरातल भी हमारे धर्मग्रंथ ही होते हैं । वह कहीं आसमान से टपक कर नहीं बनाए जाते उनका आधार भी समाज और सामाजिक व्यवस्था होती है । जिसे अगर नजर अंदाज किया जाए तो सीधी तौर पर हम अपनी संस्कृति, परम्परा और सामाजिक व्यवस्था पर प्रहार करते हैं । नेपाल से आज हिन्दू राष्ट्र का पद छीना गया है, पर आम जनता की मानसिकता नहीं बदली है । ठीक है कि राष्ट्रवाद के नाम पर आज एक वर्ग विशेष आपके साथ अंधभक्ति के साथ खड़ी हो । लेकिन इसका खामियाजा उन्हें भी भुगतना ही होगा क्योंकि उनके बच्चे कल को या तो विदेश जाने के बाद वहीं रह जाएँगे या व्यभिचार को अपनाएँगे । भले ही इस पक्ष को नजरअंदाज करें पर यह एक अनदेखा सच है । विदेश जाकर बसने की इच्छा यहाँ के तथाकथित राष्ट्रवादियों में ही पाई जाती है, जिन्हें पता है कि अपने देश से अधिक शानो शौकत और पैसा वहाँ है तो फिर मुश्किल क्या है हमारे बच्चे वहीं रह जाएँगे तो । परन्तु इस तरह हम ही अपनी युवा क्षमता से वंचित हो रहे हैं । क्या है हमारे देश का भविष्य ? आज जिस मोहान्धता से यह कदम उठाया जा रहा है वह एक भूखण्ड को हर बार की तरह और भी शिद्दत से वैचारिक तौर पर अलग कर रहा है । असंतोष की चिंगारी ही भविष्य में आग का रूप लेती है यह भी कटु सत्य है । मधेश को हर स्तर पर जिस तरह दबाया जा रहा है वह किसी अच्छे परिणाम को नहीं जन्म देने वाला । इस विषय को गम्भीरता से सोचिए सरकार । मधेश की भूमि नहीं मधेश के लोगों और उनकी भावनाओं को भी अपनाइए । किसी भी नीति निर्माण से पहले उसके परिणाम की परवाह कीजिए या फिर पहले उन समस्याओं को दूर करने की व्यवस्था कीजिए जो भविष्य में उत्पन्न होने वाले हैं और फिर नियम लाइए । सभी सहर्षता से स्वीकार करेंगे । बहुमत का मद भी जनता ही देती है और तोड़ने का काम भी जनता ही करती है ।


