Wed. Jan 29th, 2020

अनिश्चित चुनाव और असंभव चुनावी सरकार

पंकज दास:हमारे देश के नेताओं को और किसी भी चीज में महारथ हासिल हो या ना हो लेकिन उन्हें आन्तरिक बात छुपाने और सहमति का रट लगाने में तो महारथ हासिल हो ही गया है । इन दिनों देश में चुनावी सरकार गठन और जेठ या मंसिर में चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज दिखती है । बाहर से देखने में लगता है कि प्रमुख दल के शर्ीष्ा नेता चुनावी सरकार गठन और चुनाव को लेकर काफी गम्भीर है । और उसी गम्भीरता से वो चुनावी सरकार गठन करने और चुनाव कराने को लेकर्रर् इमानदारी से लगे हुए हैं । लेकिन क्या वाकई में ऐसा ही है – यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि इसी बीच में कई ऐसे परिदृश्य देखने को मिले जिससे यह लग रहा है कि ना तो चुनावी सरकार-गठन और ना ही चुनाव को लेकर हमारे नेता गम्भीर दिखाई दे रहे हैं ।

khilraj egmi
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माओवादी के महाधिवेशन के दौरान प्रधान न्यायाधीश को चुनावी सत्ता का नेतृत्व दिए जाने को लेकर प्रस्ताव किया । पहले तो अन्य दलों ने इस का विरोध किया लेकिन अचानक वो बदल गए और तमाम विरोध के बावजूद कांग्रेस एमाले ने प्रधान न्यायाधीश को सत्ता का नेतृत्व देने के लिए अपनी हामी भर दी । उसके बाद ऐसा लग रहा था जैसे अब प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व में चुनावी-सरकार गठन हो ही जाएगी । प्रधानमंत्री दफ्तर से एक खबर को बिलकुल प्रायोजित तरीके से बाहर लाया गया जिसमें यह कहा गया कि प्रधानमंत्री अपना सरकारी आवास छोडÞकर सानेपा स्थित अपने पुराने मकान में रहने की तैयारी कर चुके हैं । माहौल बिलकुल ऐसा बनाया गया जिससे देश की जनता को यह भ्रम रहे अब भट्टर्राई के नेतृत्व वाली सरकार के बदले नई सरकार गठन हो जाएगी और जेठ में चुनाव हो ही जाएगा । लेकिन बीच-बीच में इसके विरोध में भी इतने स्वर उठने लगे कि प्रधान न्यायाधीश के द्वारा इस पर अपनी स्वीकृति दिए जाने को लेकर भी गम्भीर आशंका उठने लगी । दलों के बीच प्रधान न्यायाधीश को लेकर बात बहुत आगे तक बढÞती दिखाई दी लेकिन इसी बीच किसी ने भी प्रधान न्यायाधीश से यह पूछने की जहमत नहीं उर्ठाई कि आखिर वो इसके लिए तैयार हैं भी या नहीं । जब यह सवाल उठा तो प्रधानमंत्री ने अपनी तरफ से बयान दिया कि प्रधान न्यायाधीश से उनकी बातचीत हो रही है और इसके लिए वो तैयार भी हैं । लेकिन प्रधानमंत्री के इस बयान के २४ घण्टे भी नहीं बीते थे कि प्रधान न्यायाधीश की तरफ से यह सुनने में आया कि उन्होंने प्रमुख दल के शर्ीष्ा नेताओं से मिलने से ही इंकार कर दिया ।
इस खबर के बाद ही दलों के द्वारा सहमति के दावों की कलई खुल गई और शर्ीष्ा नेताओं की साख ही दांव पर लग गई । तब एक बार फिर से प्रधानमंत्री को उन्हें मनाने की जिम्मेवारी दी गई । प्रधानमंत्री के आग्रह के बाद प्रधान न्यायाधीश रेग्मी ने प्रमुख दल के शर्ीष्ा नेताओं को सामूहिक रूप से मिलने के लिए हामी भर दी । वैसे दलों के नेता चाहते थे कि उन्हें ही कहीं बुलाकर उनसे बातचीत किया जाए लेकिन रेग्मी ने इसके लिए मना कर दिया । प्रधानमंत्री के सरकारी आवास पर प्रधान न्यायाधीश का इंतजार कर रहे नेताओं को एक और झटका मिला जब रेग्मी ने वहां आने से ही मना कर दिया । आखिरकार नेताओं को ही रेग्मी के सरकारी आवास में जाना पडÞा । वहां भीतर क्या बात हर्ुइ, वह तो औपचारिक तौर पर बाहर नहीं आई लेकिन नेताओं ने सहमति होने और प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व में सरकार गठन के लिए अपनी स्वीकृति देने का दावा किया । वैसे इस बारे में रेग्मी के काफी करीबी लोगों से पता लगा कि रेग्मी को भी नेताओं की नीयत पर शक हो गया था और उन्होंने अपनी कुछ शर्तें रख दी थी । मसलन रेग्मी ने दलों के नियंत्रण में सरकार चलाने की बात सिरे से ठुकरा दिया । रेग्मी का कहना है कि यदि उन्हें सरकार चलाने दिया जाता है तो उनपर किसी भी तरह का राजनीतिक दबाब नहीं होना चाहिए । इसके अलावा मंत्रिपरिषद में किन लोगों को रखना है इसका फैसला भी उन्हें ही करने दिया जाए । साथ ही चुनाव की तारीख का ऐलान भी नई सरकार के द्वारा ही करने की मांग रेग्मी ने रखी थी । इन सबसे अधिक रेग्मी को जिस बात से सबसे बडी आपत्ति थी, वह यह कि जेठ में यदि चुनाव नहीं हो पाया तो प्रधान न्यायाधीश को सरकार से वापस बुला लिया जाएगा । मगर रेग्मी को यह अच्छी तरह से मालूम था कि इन हालातों में जेठ में चुनाव संभव ही नहीं है और यदि चुनाव नहीं हुए तो इसकी असफलता का दोष उनके माथे पर मढÞ दिया जाएगा ।
प्रधान न्यायाधीश की इन्हीं आपत्तियों की वजह से दलों को एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया कि उन्हें सत्ता सौंपा जाए या नहीं – कुछ नेताओं को यह भी आभास हुआ कि कहीं सत्ता मिलने के बाद देश में निरंकुशता तो हावी नहीं हो जाएगी – क्योंकि जिस तरह की शर्तें प्रधान न्यायाधीश की तरफ से आ रही थीं, जिसने उनकी नीयत पर सोचने को मजबूर कर दिया था । लेकिन उनकी शर्ताें को मानने के अलावा दलों के पास और कोई विकल्प नहीं बचा था । कांग्रेस-एमाले किसी भी हालत में भट्टर्राई सरकार को हटाना चाहती है और माओवादी तथा मधेशी मोर्चा कांग्रेस-एमाले को चुनाव में मिलने वाले परिणामों के लिए जल्द ही चुनाव में जाना चाहते हैं । वैसे जेठ में ही चुनाव कराने को लेकर सभी दल तैयार नहीं हैं । एक बात तो तय है कि माओवादी की जिस तरह की रणनीति है, उसके मुताबिक चुनाव जेठ में हो या मंसिर में माओवादी एक बार फिर सबसे बडी पार्टर्ीीे रूप में उभर कर सामने आने वाली है । बांकी दलों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है । हां आदिवासी जनजाति और मधेशी के नाम पर राजनीति करने वालों को कुछ फायदा अवश्य मिलने की संभावना दिख रही है । इसलिए कांग्रेस-एमाले चुनाव का नारा बाहर से तो लगा रही है लेकिन आन्तरिक रुप में वो इतनी जल्दी चुनाव में जाने के पक्ष में नहीं हैं । इसलिए प्रमुख दलों के शर्ीष्ा नेता चाहे जितना भी बयानबाजी करें चुनाव उनकी प्राथमिकता है ही नहीं । तो सवाल यह उठता है कि फिर चुनाव के लिए इतनी कसरत क्यों की जा रही है । नेपाल में अन्य देशों का राजनीतिक रूप से दबाब कितना असर करता है यह किसी से छिपा नहीं है । और ऐसा बहुत ही कम होता है जब किसी एक मुद्दे पर भारत, चीन, अमेरिका और यूरोपीय यूनियन तक आम राय रखते हों । इस समय ऐसा ही कुछ असर नेपाल की राजनीतिक में देखने को मिल रहा है । नेपाल में राजनीतिक स्थिरता आए और उसके लिए जल्द ही चुनाव हो यह सभी देशों का खुला एजेण्डा है । ये बात अलग है कि इसके पीछे सभी देशों का अपना-अपना कुछ हिडेन एजेण्डा भी होगा और है भी लेकिन सभी दलों पर दबाब देकर चुनाव में जाने के लिए राजी कराने में विदेशी राजदूतों की भूमिका भी काफी अहम दिख रही है । इसका एक ताजा उदाहरण है- मोहन वैद्य के नेतृत्व में रही नेकपा माओवादी के मिजाज में बदलाव । प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व में चुनावी सरकार गठन का विरोध करने और चुनाव का बहिष्कार करने की धमकी के बाद यूरोपीय यूनियन के आधे दर्जन देशों के राजदूत उनके दफ्तर में ही पहुंचकर चुनाव का बहिष्कार नहीं करने के लिए दबाब दिया था । और इसी के बाद नेकपा-माओवादी को बकायदा विज्ञप्ति निकाल कर यह बात स्पष्ट करनी पडÞी थी कि वो चुनाव का विरोध नहीं कर रहे हैं और ना ही वो चुनाव का बहिष्कार करने वाले हैं । यह हाल उस पार्टर्ीीा था, जो विदेशी हस्तक्षेप का जोरशोर से विरोध करती है और उसी के नाम पर राजनीति भी करती है ।
दलों के बीच प्रधान न्यायाधीश को लेकर सहमति बनी तब अन्य मुद्दे पर नेता उलझ गए । इसी बीच प्रधान न्यायाधीश को चुनावी सत्ता का नेतृत्व सौंपे जाने को लेकर र्सवाेच्च अदालत में याचिका दायर हो गई और अदालत ने इस पर राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और दलों के शर्ीष्ा नेताओं से लिखित जबाब सौंपने को कहा । रेग्मी को सत्ता की कमान नहीं सौंपने की मांग करते हुए नागरिक समाज की तरफ से अभियान ही चलाया गया । नेपाल बार एसोशियसन ने तो बाकायदा अदालती कार्रवाही का ही बहिष्कार करने की चेतावनी दे रखी है । यानी कुल मिलाकर स्थिति यह है कि प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व में चुनावी सरकार गठन को लेकर जितने र्समर्थन में लोग या संघ संस्थाएं नहीं आ रहीं उससे कहीं अधिक इस बात का विरोध ही हो रहा है । इन विरोधों के बावजूद द्लों की सहमति और आग्रह पर प्रधान न्यायाधीश के निर्देशन पर र्सवाेच्च अदालत ने वक्तव्य जारी करते हुए प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व में चुनावी सरकार गठन के लिए सकारात्मक संकेत दिया था । उसी शाम को रेग्मी ने बीबीसी को अन्तर्वार्ता देते हुए सरकार का नेतृत्व लेने के लिए खुद के तैयार होने और अपनी भावी रणनीति पर खुल कर बात की । शायद वो भूल गए कि यह मामला अभी र्सवाेच्च अदालत में विचाराधीन है और अदालत में विचाराधीन मामलों पर र्सार्वजनिक रूप से बयानबाजी अदालत की अवमानना के दायरे में आती है । हुआ भी यही, कुछ अधिवक्ताओं ने रेग्मी के खिलाफ ही अदालत की अवमानना करने के आरोप में रिट दायर कर दिया । एक रिट पर अभी फैसला भी नहीं हो पाया था कि दूसरी रिट ने उनकी संभावना को और क्षीण कर दिया । दलों के शर्ीष्ा नेताओं का दावा है कि फागुन २४ गते को अदालत के रूख के बाद रेग्मी को कमान सौंप दी जाएगी । लेकिन जिस तरह से विरोध का सिलसिला चल पडÞा है, उससे रेग्मी भी अपने कदम पीछे हटाने को मजबूर हैं । विश्वस्त सूत्रों की मानें तो रेग्मी ने शर्ीष्ा नेताओं को यह साफ बता दिया है कि वह चुनावी सरकार का नेतृत्व नहीं ले सकते हैं और अन्य किसी विकल्प पर विचार किया जाए । और नेताओं ने भी दूसरे विकल्प के बारे में सोचना शुरू कर दिया है । क्योंकि जेठ में चुनाव तो अब असंभव है । यह बात बाहर कोई नहीं बल्कि सरकार के ही मंत्री कहने लगे हैं । दूसरी तरफ नागरिकता मतदाता सूची और लडाकू दर्जा निर्धारण के मुद्दे पर भी दलों के बीच तीव्र मतभेद है । कल जो नेता रेग्मी के नेतृत्व में चुनावी सरकार गठन की ताल ठोक रहे थे और जेठ में ही चुनाव का दम्भ भर रहे थे वो अब इस का जबाब देने के लिए शब्दों और बहाना को ढूंढने में लगे हैं । वैसे नेपाल के नेताओं के लिए यह कोई पहली घटना नहीं है । यह पहली बार नहीं है कि उनके दावे की पोल खुल गई है । और ऐसा पहली बार भी नहीं है कि अपनी ही बात से उन्हें पलटना पडÞेगा । उन्हें इस बात का अच्छा खासा तजर्ूबा है कि अन्त में जनता को कैसे मर्ूख बनाया जाता है और कैसे अपनी ही बातों को दूसरे के सिर पर ठीकरा फोडÞकर खुद को पाक साफ बताया जाता है ।

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