प्रचण्ड का मधेश मोह
पंकज दास:एकीकृत माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड ने जनकपुर मंे एक सभा को संबोधित करते हुए खुद को मधेश का पुत्र बताते हुए आगामी संविधान सभा चुनाव में मधेश से ही चुनाव लडने की घोषणा कर सबको चौंका दिया। अपने को चितवन का निवासी बताते हुए मधेश से ही नाता रहने और मधेश की भूमि का होने के कारण यहीं के किसी क्षेत्र से चुनाव लडने की बात स्पष्ट की है। प्रचण्ड के इस घोषणा से बांकी राजनीतिक दल या उनकी ही पार्टर्ीीे लोग अभी तक इस रणनीति को समझने में जुटे हुए हैं। अभी तक किसी को भी यह समझ में नहीं आ रहा है कि पिछली बार रोल्पा और काठमाण्डू से चुनाव लडने और भारी अन्तर से चुनाव जीतने के बावजूद इस बार अचानक से प्रचण्ड का मधेश मोह क्यों जागा है – क्या ये प्रचण्ड की महज घोषणा ही है या फिर उनकी कोई नई रणनीति -!

प्रचण्ड को यह अच्छी तरह से पता है कि सबसे अधिक मतदाता मधेश के जिलों में ही हैं। पिछली बार भी मधेश के २२ जिलों में से सबसे अधिक सीट माओवादी को ही मिली थी। मधेश आन्दोलन में माओवादी के विरूद्ध माहौल होने के बावजूद उनकी पार्टर्ीीो र्सवाधिक सीटें मिलना इस बात का परिचायक है कि मधेश में भी माओवादी की पकडÞ है। लेकिन बांकी बचे सीटों पर भी माओवादी अपना कब्जा चाहती है। पिछले संविधान सभा चुनाव में कांग्रेस और एमाले को भी मधेश के जिलों से सीटों का फायदा मिला था जिस कारण वो संविधान में दूसरी और तीसरी पार्टर्ीीनने में कामयाब हो गए थे। लेकिन अभी स्थिति उतनी सहज नहीं है। कांग्रेस-एमाले के लिए मधेश से पिछली बार की तुलना में अधिक सीटें जीतना मुश्किल लग रहा है। क्योंकि इस समय मधेश में कांग्रेस-एमाले के लिए समय अनुकूल नहीं है। कांग्रेस की संघीयता और मधेश को लेकर स्थिति अभी भी स्पष्ट नहीं है और एमाले के बारे में आम मधेशी जनता के मन में यह धारणा बैठ गई है कि वह मधेश विरोधी है। इस जनभावना को प्रचण्ड अच्छी तरह से समझते हैं। अपनी पार्टर्ीीो पर्ूण्ा बहुमत दिलाने के लिए या दो तिहाई बहुमत दिलाने के लिए प्रचण्ड के लिए सबसे बडÞी चुनौती यह है कि उन्हें मधेश के २२ जिलों में अधिक से अधिक सीट जीतना होगा। अगली बार राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखने वाले प्रचण्ड के लिए मधेश पर अधिक से अधिक ध्यान देना होगा और वहां से कांग्रेस-एमाले की सीट छीननी होगी।
माओवादी के लिए दूसरी अच्छी परिस्थिति यह है कि मधेशी दलों के बारे में भी आम धारणा यह बन गई है कि मधेशी नेता सत्ता में रहने के बावजूद भी कोई भी उपलब्धि हासिल नहीं कर पाए। इतने अधिक संख्या में सरकार में मंत्री रहने और हर सरकार में किसी ना किसी तरह से मंत्री पद पाने के बाद भी मधेश के मुद्दों का ठीक से संबोधन नहीं हो पाया है। इतना ही नहीं मंत्री पद के लिए मधेशी दलों के बीच इतना अधिक बंटवारा हो गया है कि मधेशी जनता में मधेशी नेताओं और दलों के लिए खिन्नता बढÞ गई है। पिछली चुनाव से ही मधेशी जनता यह चाहती थी कि सभी मधेशवादी दल एक होकर चुनाव लडÞंे, लेकिन कुछ नेताओं के अहम और कुछ नेताओं के व्यक्तिगत स्वार्थ को लेकर चुनाव से पहले मोर्चाबन्दी नहीं हो पाई थी। इस बार भी चुनावी सरकार बनने के बाद भी जो भी पांच दलों की मधेशी मोर्चा है वो भी एक सुर में नहीं है। चुनावी गठबन्धन तो दूर की बात है।
इन सब परिस्थितियों का आकलन माओवादी पार्टर्ीीो भी है। और माओवादी यह चाहती है कि किसी भी तरह से मधेशी दलों के बीच एकता नहीं हो। मधेशी दलों के बीच कोई भी गठबन्धन बनने से कांग्रेस-एमाले को तो नुकसान होगा ही, माओवादी को भी इसका नुकसान उठाना पडÞ सकता है। इसलिए माओवादी की यही रणनीति रहेगी कि कभी भी मधेशी दलों के बीच कोई गठबन्धन नहीं हो। प्रचण्ड मधेशी दलों पर हमेशा से ही यह दबाब डÞाल रहे हैं कि मधेशी दल उनके साथ मिलकर चुनाव लडÞे।
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हालांकि इसके लिए अभी तक किसी भी दल ने संकेत नहीं दिया है और ना ही इस प्रकार के कोई लक्षण दिख रहे हैं फिर भी जिन मधेशी दलों को मोर्चा में स्थान नहीं मिल पाएगा उनके लिए दूसरा विकल्प भी नहीं होगा।
माओवादी सूत्रों के हवाले से जो खबर मिल रही है उसके मुताबिक इस बार के चुनाव में प्रचण्ड सिरहा के क्षेत्र के नम्बर ६ या धनुषा के किसी क्षेत्र से अपनी उम्मीदवारी देने की तैयारी कर रहे हैं। पिछली बार जहां रोल्पा से उन्होंने उम्मीदवारी दी थी और भारी जीत हासिल की थी वहां अब मोहन वैद्य की पकडÞ अच्छी है। माओवादी में विभाजन आने के बाद से ही प्रचण्ड के लिए यह चिन्ता का विषय था। क्योंकि रोल्पा में वैद्य के कार्यकर्ताओं का गढÞ है और वहां से इस बार चुनाव जीतना काफी मुश्किल हो सकता है। उधर काठमाण्डू के क्षेत्र नम्बर १० का भी भी कुछ ऐसा ही हाल है। माधव नेपाल सरकार के विरूद्ध माओवादी आन्दोलन के दौरान जिस तरीके से माओवादी का विरोध हुआ था और उन्हें आन्दोलन वापस लेना पडÞा था, उसको देखते हुए यह क्षेत्र भी प्रचण्ड के लिए उतना सुरक्षित नहीं रह गया है। पिछली बार चुनाव में माओवादी के प्रति आकर्षा और डÞर भी था, जिसके कारण माओवादी को जीत हासिल हर्ुइ थी। उस समय प्रचण्ड एक बडÞे नेता और करिश्माई नेता के तौर पर जाने जाते थे इसलिए भी उनके लिए यहां से जीत सुनिश्चित थी लेकिन अब परिस्थिति बदल चुकी है। लोगों में माओवादी का डर तो हट ही गया है साथ ही प्रचण्ड के व्यक्तित्व में वह आकर्षा भी नहीं रहा। माओवादी का लक्ष्य आगामी चुनाव में ना सिर्फबहुमत हासिल करना होगा बल्कि वो किसी भी तरह से दो तिहाई लाना चाह रहे हैं ताकि अपने मन मुताबिक संविधान बनाया जा सके और कम से कम एक दशक तक सत्ता पर राज किया जा सके। इसके लिए माओवादी और प्रचण्ड का सारा ध्यान मधेश पर ही होगा क्योंकि मधेश को अपना बनाए बिना और मधेश की बात किए बिना यह संभव नहीं है।


