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डॉ श्वेता दिप्ति की “नीर भरी तप्त नदी” कृति का भव्य लोकार्पण

 

काठमांडू, सावन ११ –

‘हिमालिनी हिन्दी संवर्धन सम्मान’ तथा “नीर भरी तप्त नदी” पुस्तक का विमोचन डी.एवी सुशील केडिया विश्व भारती स्कूल काठमांडू के प्रतीक सभागार में भव्य रुप से संपन्न हुआ ।
कार्यक्रम की शुरुआत त्रिभुवन विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय में कार्यरत अंशु झा द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुई ।
उनकी सरस्वती वंदना के बाद त्रिभुवन विश्वविद्यालय हिन्दी केन्द्रीय विभाग की विभागाध्यक्ष तथा हिमालिनी हिन्दी मासिक पत्रिका की संपादक डॉ श्वेता दीप्ति की पुस्तक ‘नीर भरी तप्त नदी’ का लोकार्पण मंचासीन विद्वत वर्ग द्वारा संपन्न किया गया ।

पुस्तक की समीक्षा करते हुए केन्द्रीय विद्यालय के शिक्षक श्री अनुप चौधरी ने कहा कि – “कृति का शीर्षक ही अपने आप में गहरा विरोधाभास है । जहाँ ‘नीर’ शीतलता, जीवन और संवेदनाओं का प्रतीक है, वहीं तप्त शब्द जीवन के संधर्ष , वेदना और चेतना की तापों को दर्शाता है । लेखिका ने नीर को केवल उसकी शीतलता के प्रतीक के रुप में प्रयोग नहीं किया है । इस कृति में दर्द, पीड़ा, व्याकुलता या आंतरिक तपन को दर्शाया गया है ।”

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अनुप जी की समीक्षा के बाद कृति की लेखिका डॉ. श्वेता दीप्ति ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि – “इस कृति के शीर्षक को लेकर बहुत चर्चा है । लोग प्रश्न भी पूछ रहे हैं कि जब नदी में नीर है तो वह तप्त क्यों है ? ” उन्होंने कहा कि –“मैं कहूँ तो यह हर एक नारी के मन की अभिव्यक्ति है । एक नारी के अंदर में बहुत से भाव समाए रहते हैं । कभी वो शांत होती है, कभी शीतल होती है और कभी तप्त ।” उन्होंने कहा कि – “मैंने कई बार चाहा कि इस कृति के शीर्षक में बदलाव करुँ लेकिन फिर मन नहीं माना और शीर्षक यही रह गया ।”

कार्यक्रम के विशेष अतिथि साहित्यकार तथा साझा प्रकाशन के अध्यक्ष शेखर गिरी ने कहा कि –यह कृति “नीर भरी तप्त नदी” भावों और संवेदनाओं से भरी हुई है । नीर जो शीतलता का प्रतीक है लेकिन वह केवल शीतलता नहीं दे रही है, बल्कि दर्द, पीड़ा,व्याकुलता या आंतरिक तपन को दर्शा रही है ।

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कार्यक्रम के विशेष अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम दयाल राकेश ने कहा कि – लेखिका यानी डॉ. श्वेता दीप्ति को मैं एक अरसे से जानता हूँ । उनकी विद्वनता को भी सराहता हूँ । उनकी यह कृति बहुत ही संवेदनशील कृति है जिसमें नदी में नीर तो है लेकिन वो तप्त है । कृति का शीर्षक विरोधाभास का सुंदर उदाहरण है ।

कार्यक्रम के विशेष अतिथि – डीएवी, सुशिल केडिया विश्व भारती स्कूल के चैयरमैन अनिल केडिया ने कहा कि – मैं बहुत बधाई देता हूँ कृति की लेखिका को । उन्होंने कहा कि – “नीर भरी तप्त नदी” संवेदनाओं से भरा, पर कष्ट से तपता ह्दय है, जो बाहर से भरा हुआ है लेकिन भीतर से जल रहा है ।

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि भारतीय दूतावास की काउंसलर पोलिटिकल गीतांजली ब्रैंडन ने कहा कि – यह कृति “नीर भरी तप्त नदी” बहुत ही संवेदनशील है । उन्होंने लेखिका को बधाई देते हुए कहा कि –आप निरंतर ऐसे ही लिखती रहे और हिन्दी के संवर्धन में अपनी भूमिका निभाती रहें ।

कार्यक्रम के अध्यक्ष हिमालिनी के निदेशक ई. श्री सच्चिदानंद मिश्र ने अपने संबोधन में कहा कि –आज वे अत्यंत प्रसन्न हैं कि उनके प्रकाशन से इस महत्वपूर्ण कृति का प्रकाशन हुआ है । उन्होंने कृति की लेखिका को हार्दिक बधाई देते हुए कहा कि आपकी लेखनी यूँहीं निरंतर सृजनशील बनी रहे और साहित्य जगत को समृद्ध करती रहे ।

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कार्यक्रम में संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति प्रो. डॉ श्री कुल प्रसाद कोइराला, पोखरा विश्वविद्यालय के पूर्व उप कुलपति प्रो डॉ श्री प्रेम अर्याल, सत्य सनातन मैत्री संघ के अध्यक्ष श्री अनिल कुमार कर्ण, नेपाल भारत मैत्री समाज के अध्यक्ष श्री प्रेम लश्करी, मधेशी आयोग के पूर्व अध्यक्ष श्री विजय दत्त, मदन मोहन मालवीय मिशन के अध्यक्ष श्री गोरखनाथ, अंतर राष्ट्रीय हिन्दी परिषद नेपाल के अध्यक्ष तथा पूर्व सचिव नागेन्द्र झा, प्रो. आभारानी मिश्र, साहित्यकार तथा पत्रकार विजेता चौधरी, साहित्यकार तथा पत्रकार प्रतिमा चौधरी, गायिका तथा पत्रकार स्मति मिश्र, पत्रकार मोहन सिंह, पत्रकार विजय यादव आदि की गरिमामय उपस्थिति थी ।

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