इस कोरोना काल से , अब तो मुक्ति दिलाओ : मंजू उपाध्याय
अब तो मुक्ति दिलाओ
कोरोना के बीच झूलती जिंदगी
हे ईश्वर, ये कैसा खेल रचाया ,
सभी गुणीजनों को घर बैठाया।
पशु पक्षी विचरण करते,
सड़कों और गलियारों में ।
आम आदमी रह गया सिमट कर,
अपने ही घर द्वारों में।
रिश्ते नाते दूर हो गए,
आस-पड़ोस भी बंद हो गए,
अपने-अपने दरवाजों में ।
शंका , शक की बुनियाद पड़ गई,
सभी के मन में डर,घर कर गई।
न जाने कब कौन लेकर आ जाये बीमारी,
इसी डर से हम नही निभाते ,अड़ोस- पड़ोस और रिश्तेदारी ।
मंदिर-मस्जिद में पड़ गया ताला ,
हाय ये कैसा खेल निराला।
ये कैसा, सोशल डिस्टेंसिग का खेल है,
रिश्तों नातों से नहीं हो रहा मेल है।
बेटा मां से मिल ना पाये,
मां, बेटे को ,बुलाने से कतराये ।
कब होगा ये खेल खतम,
जिसके चलते, हम रखतें है,
फूंक-फूंक कर एक कदम।
हे ईश्वर , अब ऐसा कुछ कर जाओ,
इस कोरोना काल से , अब तो मुक्ति दिलाओ ।
अब तो मुक्ति दिलाओ।

शोधार्थी , हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबई 400098
9869524938
manjuupadhyay022@gmail.com


