पांगणा में हुआ गुग्गा नवमी पर गुग्गा गाथा गायन का आयोजन
हिमाचल प्रदेश जिला मण्डी की ऐतिहासिक नगरी उप-तहसील पांगना के ऐतिहासिक छः मंजिले महामाया मंदिर के प्रांगण में गुग्गा नवमी के पावन अवसर पर ऐतिहासिक गुग्गा गाथा का आयोजन किया गया। भाषा कला संस्कृति विभाग मंडी के फेस बुक पेज पर इसका विश्व स्तर पर लाईव प्रसारण किया गया और इस कला को संरक्षण के लिये विडियो रिकार्डिंग भी की गयी। गुग्गा मंडली के प्रधान सोमकृष्ण,परसराम,चमनलाल,हरिसिंह,देवीसिंह,भोलाराम,किशोरीलाल ,धनीराम,गोपाल,संतराम,भूपेन्द्र कुमार,पंकज कुमार,उमेश कुमार,नरेश कुमार,भूपेन्द्र कुमार (विक्की) ने ढोल,थाली,झान्झ,जैसे पारंपरिक देव वाद्यों की धुनों के साथ डेढ़ घंटे तक मुक्त विचारों के बहाव में बहते हुए गोरख कुंडली,गुग्गा जी के जन्म,बहन बिछोड़ा जैसे मार्मिक सिद्ध गीतों के विविध गीत गाकर खूब समां बांधा।गुग्गा मंडली के सबसे बूढ़े गायक संतराम गौतम का कहना है कि उन्होंने ये रहस्यमय गाथाएँ 12 वर्ष की आयु मे अपने बुजुर्गों से सीख ली थी। उन्होंने बताया कि ये गाथाएँ गुग्गा जी के जीवन की घटनाओं,अनुभूतियों पर आधारित हैं तथा इतनी लंबी हैं कि कई घंटे तक इनका गायन किया जा सकता है।पांगणा में इन गाथाओं का उदय लगभग 800-900 वर्ष पूर्व हुआ।सुकेत शासकों के राजसी संरक्षण के कारण पांगणा के गुग्गा जी सिंहासनी गुग्गा के नाम से प्रसिद्ध हैं। सुकेत शासकों का गुग्गा गाथा गायन को भरपूर संरक्षण और बल मिला।सुबह सांय गुग्गा-गुग्गी की आरती और रात को बलिराज(अलाव)जलाने के साथ मंगलाचरण के बाद गुग्गा जी,गुरू गोरखनाथ जी,सिद्ध जी,हणु(हनुमान जी),नारसिह आदि के आवाहन के साथ “मसाणु का समाह” जैसे आवाहन और विदाई जैसी अनेक गाथाएँ दर्शकों को देर रात प्रदर्शन अवधि तक बांधे रखती हैं।
●शिवा युवक मंडल बाग द्वारा गाया गयी गाथा के माध्यम से धार्मिक एकता का दिया संदेश।
गगनदीप,सोनिया,मुनीश शर्मा,शिवा गौतम ने इस अवसर पर गुग्गा गाथा के संकलन, शिल्प में पौराणिक तत्वों को खोजने,तथा अलग-अलग कोण से सीधे प्रसारण में सहयोग दिया।सोनिया का कहना है कि स्थानीय भाषा मे गायी गयी गुग्गा गाथा के काव्यमय संवादों बहुत
प्रभावित करते हैं। शोद्धार्थी गगनदीप का कहना है कि राजस्थान के जिला चुरू के ददरेवा ठिकाने(बागड़ राज्य)मे चौहान वंश की चाहिल अथवा साम्भर शाखा में उमर सिंह का शासन था।जिनके दो पुत्र हुए।बड़े पुत्र का नाम जेवर सिंह व छोटे पुत्र का नाम घेवर सिंह था।इन दोनों का विवाह सरसा पट्टन की राजकुमारी बालक और काछल से हुआ।पर बहुत दिनों तक दोनों के कोई संतान न हुई।तब दोनों राजकुमारियो ने गोरखनाथ जी की पूजा करनी प्रारंभ की, जब आशीर्वाद प्राप्ति का समय आया तो काच्छल पहले ही गुरु गोरखनाथ के पास चली जाती है।जिनको गोरखनाथ जी आशीर्वाद देते हैं।जिनसे दो पुत्र अर्जुन और सुर्जन हुए। बाद में बाच्छल गुरू गोरखनाथ जी के पास आशीर्वाद लेने जाती है।फिर उसे पता चला कि आशीर्वाद तो काच्छल को प्राप्त हुआ।फिर वह काच्छल को क्षमा करके बाछल को भी एक दिव्य पुत्र का आशीर्वाद देते हैं जिससे उनको संवत 1003 मे भादों सुदी नवमी को गुग्गा जी के रूप में पुत्र प्राप्त हुआ।जिस समय गुग्गा जी का जन्म हुआ उसी समय एक ब्राह्मण के गर नरसिंह पांडे का जन्म हुआ।ठीक उसी समय एक अन्य परिवारों में भज्जू कोतवाल,रत्ना जी का जन्म हुआ।ये सभी गुरू गोरखनाथ जी के शिष्य हुए। उसी समय उनकी बंध्या घोड़ी ने एक नीले घोड़े को जन्म दिया।ये सब गुग्गा जी के आजीवन के साथी हुए। गुग्गा जी के साथ -साथ इनकी बहुत मान्यता है।
हिमाचल प्रदेश के भाषा कला संस्कृति विभाग जिला भाषा अधिकारी मंडी द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का संयोजन संस्कृति मर्मज्ञ डॉक्टर जगदीश शर्मा ने व्यापार मंडल पांगणा के अध्यक्ष सुमित गुप्ता,युवा प्रेरक पुनीत गुप्ता के सहयोग से किया।इस अवसर हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग पांगणा के सहायक अभियंता श्री संजय शर्मा,कनिष्ठ अभियंता भारत भूषण सोनी और कनिष्ठ अभियंता बंशीलाल तथा स्थानीय नागरिक विशेष रुप से उपस्थित रहे।संजय शर्मा जी का कहना है कि हिमाचल वासियों का जीवन बहुत ही संगीतमय है।गुग्गा जी की जीवन लीला के गीत,स्थानीय देवी देवताओं के स्तुति गीत माधुर्य से भरपूर हैं। इस अवसर पर डॉक्टर जगदीश शर्मा ने गुग्गा गाथा मंडली के सभी साथियों के साथ गाथा के सीधे प्रचारित करने वाले दल का धन्यवाद करते हुए भाषा कला संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश,सचिव,निदेशक,अकादमी सचिव का धन्यवाद करते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर जी के लोक संस्कृति के संरक्षण में अतुल्य योगदान से यह कार्य सम्पन्न हुआ।डॉक्टर जगदीश शर्मा ने कहा कि प्रदेश सरकार के सहयोग से सम्पन्न यह कार्यक्रम बहुत उत्साह वर्धक और प्रेरणादायक तो रहा ही कार्यक्रम के सीधे प्रसारण से लोक संस्कृति के नये जागरण का प्रतिकात्मक भी बना।जिससे संस्कृति संरक्षण को बल मिला है।सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डाक्टर हिमेन्द्र बाली का कहना है कि चिताकर्षक गुग्गा गाथा मे बहुत ही महत्वपूर्ण ज्ञानवर्धक विवरण है जिसे लिपिबद्ध करना आवश्यक है।गुग्गा गाथा दल के सदस्य किशोरीलाल शास्त्री का कहना है कि गुग्गा गाथा का स्वरूप विश्वव्यापी है।ऐसे समय में जब पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा हो,हिमाचल प्रदेश के भाषा,कला संस्कृति विभाग द्वारा कोरोना काल में भी आँचलिक स्तर पर पहुंच कर गुग्गा गाथा का राष्ट्रीय व विश्व स्तर पर सीधा प्रसारण करना संस्कृति के संरक्षण का एक सुखद संकेत तो है ही,गुग्गा गाथा रूपी धरोहर के गायकों के लिए भी प्रेरणादायक सिद्ध हुआ है।स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान कार्यक्रम संयोजक डॉक्टर जगदीश शर्मा ने ऐतिहासिक नगरी पांगणा के समस्त वासियों के आजादी के आन्दोलन और रियासतों के भारत संघ में विलय की जानकारी देते हुए हिमाचल के गठन में पांगणा के स्तुत्य योगदान को समक्ष रखते हुए कहा कि पांगणा हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार जी की कर्मस्थली रही है।यहाँ के “भाऊ लीडर” नरसिंह दत्त शर्मा के घर परमार जी अक्सर आते रहते थे।पांगणा वासी सुकेत शासक के घोर विरोधी थे। 12 फरवरी 1948 को सुकेत रियासत को प्रजामंडल के सत्याग्रह का पहला निशाना बनाने के अंतर्गत शिमला के सुन्नी में बैठक हुई।
– 18 फरवरी 1948 को सुकेत के तत्तापानी और और फिरनु से( च्वासी के गुज्हू सहित)सतलुज पार कर सत्याग्रहियों ने सुकेत रियासत में प्रवेश कर करसोग के तहसीलदार और पुलिस थाने को कब्जे में लेकर 19 फरवरी को सभी सत्याग्रही पांगणा पहुंचे और पांगणा पुलिस चौकी को कब्जे मे ले लिया।पांगणा में दिल्ली से संदेश आया कि अगली कार्यवाही तक पांगणा ही रुके रहो।पांगणा में लगभग 4000 सत्याग्रही इकट्ठे हो गये थे।जिनके रोटी- पानी सोने का प्रबंध भी पांगणा वासियों ने ही किया।

-तीन दिन तक पांगणा में रुके रहने के बाद 22 फरवरी 1948 को निहरी पुलिस चौकी पर कब्जा कर लिया।
-23 फरवरी 1948 को सत्याग्रही जयदेवी पहुंचे।यहाँ मंडी रियासत के सत्याग्रही भी सुकेत सत्याग्रहियों के साथ मिल गये।
-25 फरवरी 1948 को आन्दोलन कारियों ने सुकेत रियासत पर पूर्ण अधिकार कर लिया।
-26 फरवरी 1948 को सुकेत राजशाही से पूर्ण मुक्त हो गया।
-14 मार्च 1948 को सुकेत के राजा लक्ष्मण सेन द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद विधिवत रूप से सुकेत रियासत का भारत संघ में विलय होगया।हिमाचल की 30 छोटी-बड़ी रियासतों में सुकेत पहली रियासत थी जिसका भारत संघ में सबसे पहले विलय हुआ ।
– सुकेत की कार्यवाही का असर दूसरी रियासतों पर भी पड़ा।एक के बाद एक रियासतों के भारत संघ में विलय के बाद15 अप्रैल 1948 को हिमाचल प्रदेश बन गया।
-12 अक्तूबर 1948 को अंतिम रियासत बिलासपुर का भी भारत संघ में तब विलय हुआ जब हिमाचल प्रदेश बन गया था।
राज शर्मा (संस्कृति संरक्षक)
आनी कुल्लू हिमाचल प्रदेश
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