विस्तारवाद का जमाना लद गया है- मोदी : ललित झा
ललित झा , मधुवनी । भारतीय स्वतंत्रता के शानदार प्रतिक लाल किले की प्राचीर से भारत ने विस्तारवाद कि तीखी आलोचना किया है। अपने 74 वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, दुनियाँ को संदेश देते हुए, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा कि विस्तारवाद विश्व शांति और समृद्धि के लिए खतरा है। इसने विश्व को दो दो विश्व युद्ध दिया है। चीन का नाम लिये बिना मोदी ने कहा कि अब विस्तारवाद का दिन लद गया है। भारत गलवान घाटी की तरह चीनी विस्तारवाद का भी वही हश्र करेगा। चीन के विस्तारवाद को लेकर भारत का आक्रामक रुख चीन समेत पूरे दुनियाँ के देशों के लिए यह साफ संदेश है कि 2020 का नया भारत अपने रणनीतिक एबम सामरिक हितों की रक्षा करना जनता है और यदि जरूरत हुई तो भारत युद्ध भी लड़ने को तैयार है। विस्तारवाद के खिलाफ भारत के इस रुख का एशिया प्रशांत छेत्र में जोरदार समर्थन भी मिल रहा है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि भारत अब चीन के सामरिक कूटनीतिक ऐबम आर्थिक विस्तारवाद के खिलाफ खुलकर मैदान में उतर चुका है। भारत के आज का राजनीतिक नेतृत्व् राजनीतिक रूप से काफी मजबूत है और कोई भी साहासिक फैसले लेने मे नहीं हिचकता। दरअसल यह भारतीय राजनीति का मोदी युग है। इसमे भारत राजनीतिक आर्थिक सांस्कृतिक और सामरिक दृष्टि से काफी बदल रहा है। एक नई सोच, नया सपना, और नई आकांक्षाएँ आकार ग्रहण कर रहा है। राजनीतिक रूप से बदले हुये इस भारत का विदेश नीति भी समयानुकूल बदल रहा है, विदेश नीति की प्राथमिकताएँ भी बदल रही है। आज भारत असंलग्नता की अपनी पुरानी नीति को अप्रासंगिक समझकर इसे छोर दिया है। हाल ही में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक कार्यक्रम में विश्व की बदली हुई परिस्थितियों में असंलग्नता की विदेश नीति को अप्रासंगिक बताया था। इसके गहरे निहितार्थ हैं। इसका मतलब ये हुआ कि भारत अपने हितों की रक्षा हेतु सांदर्भिक् गुट बना भी सकता हैं या फिर किसी गुट में शामिल भी हो सकता हैं जैसे क्वाड (quad)।
आज भारत चीन के राजनीतिक आर्थिक विस्तारवाद के खिलाफ खुल कर मैदान में उतर चुका है। लदाख के गलवान घाटी से लेकर इंडो पैसिफिक समुद्र तक भारत की सैन्य मोर्चाबंदी चीन को जवाब है। चीन के खिलाफ भारत की आक्रामकता देखकर चीनी विस्तारवाद से पीड़ित चीन के पड़ोसी देशों में भी आत्म विश्वास जगा है और वियतनाम ,ताईवान, जापान ऑस्ट्रेलिया तथा आसियान के कई देश चीन के विरोध में खड़े हो रहे हैं। भारत ने चीन के 100 से अधिक डिजिटल एप तथा हुवाइ समेत दर्जनों कंपनियों पर प्रतिबंध लगाकर चीन के आर्थिक विस्तारवाद के खिलाफ युद्ध का आगाज कर दिया है।
पड़ोसी देशों के लिये संदेश– लाल किले की प्राचीर से भारत के प्रधान मंत्री ने पड़ोसी देशों के लिए साकारात्मक कूटनीतिक संदेश दिया है। उन्होंने पड़ोसी देशों के साथ “विकास और विश्वास” की साझेदारी विकसित कर आगे बढ़ने की बात कहा है।
पड़ोसी देश को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि पड़ोसी सिर्फ वही देश नही होता जिससे हमारी भौगौलिक और सामुद्रिक सीमा मिलती हैं बल्कि पड़ोसी वह देश भी है जिससे हमारा “मन” मिलता है। निःसंदेह भारत के इस नये पड़ोस नीति से, न सिर्फ भारत के पड़ोसी देशों के फलक का विस्तार होगा बल्कि पड़ोसियों की संख्या में भी वृद्धि होगी। संभवतः इसी सोच का परिणाम है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के लिए हुये चुनाव में, दुनियाँ के 192 देशों में से 184 देशों ने भारत को अपना समर्थन दिया है। विश्व पटल पर भारत को मिले जोरदार कूटनीतिक समर्थन से यह स्पष्ट हो गया है कि वैश्विक स्तर पर भारत महाशक्ति के रूप में तेजी से स्थापित हो रहा है। मोदी जी के पड़ोसी नीति मे, विकास और विश्वास की साझेदारी बढ़ाकर, मैत्री संबंधों को मजबूत बनाने की बात कही गयी है। इसमे नेपाल श्रीलंका बांग्लादेश, और मालदीव जैसे देशों के लिए गहरे निहितार्थ छिपे हुए हैं, खासकर भारत नेपाल संबंध के संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सीमा विवाद के मुद्दे को लेकर दोनों देशों के संबंधों में अविश्वास की खाई दिन ब दिन गहरी होती जा रही है। हाल के दिनों में नेपाल के कुछ कतिपय कम्युनिस्ट नेता, नेपाल को भारत से दूर ले जाने के प्रयास में दिन रात लगे हुए हैं। चीन से दोस्ती के नाम पर, भारत विरोध की राजनीति को , चीन पोषित NGO- INGO के माध्यम से, काठमांडू की घाटियों मे फैलाया जा रहा है। चिनियाँ कम्युनिस्ट पार्टी के साथ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक साझेदारी के फलस्वरूप, चीन की कोशिश है कि नेपाल में भी चीन के मॉडल वाला एक निरंकुश लोकतंत्र का विकास हो, क्योंकि नेपाल चीन की अति महत्वकांक्षी B. R. I. परियोजना का एक साझेदार देश है, जहाँ वह अपना राजनीतिक प्रभाव मजबूत बनाना चाहता है। आर्थिक विकास के नाम पर चीन नेपाल में भी वही सब कुछ करना चाहता है जो वह दशकों से पाकिस्तान में कर रहा है। भारत – B.R.I. परियोजना का विरोधी है क्योंकि भारत को यह लगता है कि चीन का यह परियोजना दरअसल आर्थिक विस्तारवाद फैलाने का एक माध्यम है। अब नेपाल के समक्ष बड़ी दुबिधा वाली स्थिति उत्पन्न हो गयी है कि वह क्या करे? किस तरफ जाय? एक साथ दो बड़े महाशक्तियों के साथ कैसे संतुलन बैठाये, वह भी तब जब दोनों एक दूसरे के खिलाफ, जंग के मैदान में आमने सामने खड़े हो। नेपाल की वर्तमान बामपंथी राजनीतिक नेतृत्व् वाली सरकार, चीन मुखी होकर फैसले ले रही है लेकिन इसके साथ ही यह देखा जाना चाहिए कि क्या नेपाल के सभी राजनीतिक दलों का इस पर सर्वानुमती है? चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक प्रभाव में आकर नेकपा, नेपाल को भारत विरोध की आत्महंता और विनाशकारी राहों पर क्यों ले जाना चाहता है?
भारत के साथ नेपाल का विकास साझेदारी तभी परवान चढ़ सकती हैं जब आपसी विश्वास पुनः स्थापित हो। आपसी विश्वास बहाली से ही, विकास की साझेदारी का मार्ग प्रशस्त होगा। इसके लिए नेपाल को पहल करनी चाहिए। भारत के विदेश मंत्रालय का प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने विश्वास बहाली के लिए बाताबरण निर्माण की जिम्मेदारी नेपाल पर डालते हुए कहा था कि नेपाल को पहल करना चाहिए। नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व् को यह संदेश देना चाहिए कि नेपाल भारत विरोधी कैम्प में नही जा रहा । नेपाल भारत का विरोधी नही बल्कि मित्र देश है , भारत को चीढाकर नेपाल अपने आर्थिक, सामाजिक विकास का सपना कभी साकार नही कर सकता। इसके लिए नेपाल को भारत के सहयोग की दरकार होगी। विकास की साझेदारी के लिए विश्वास की बहाली आवश्यक है। यह भारत और नेपाल दोनों को समझना होगा। भारत के राजनीतिक नेतृत्व् को भी नेपाल के जायज राजनीतिक कूटनीतिक हितों को समझना चाहिए और नेपाल को यथासंभव मदद देना चाहिए। दोनों देशों के राजनीतिक कूटनीतिक टकराव से नुकसान दोनों देश का हो रहा है और फायदा सिर्फ चीन का। एक विकसित और समृद्ध नेपाल का सपना, भारत के सहयोग के बिना असंभव है। चीन द्वारा प्रदत्त ऋण के भरोसे नेपाल विकास नहीं कर सकता, समृद्ध और खुशहाल नहीं हो सकता। अफ्रिका एशिया और असियान के गरीब देश इस बात के जीवंत उदाहरण है कि चीन के आर्थिक निवेश से, दुनियाँ में कहीं समृद्धि नहीं आई है सिवाय चीन के, ऐसे में नेपाल सिर्फ चीन के भरोसे कैसे समृद्ध और खुशहाल हो सकेगा,? यह विचारणीय प्रश्न है। हालांकि भारत के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ओली ने भारतीय प्रधानमंत्री को फोन कर बधाई और शुभकामनाएँ दिया है जो एक अच्छा एबम साकारामक कदम है। दोनों प्रधानमंत्री के बीच साकारात्मक बातचित हुई है जिससे दोनों देशों के बीच कायम संवादहीनता की स्थिति टूटी है और आगे की बातचीत का मार्ग प्रशस्त हुआ है। भारत नेपाल संबंध के जानकारों का मानना है कि दोनों देशों के बीच, विश्वास बहाली के लिए, भारत नेपाल आर्थिक सहयोग से निर्मित जयनगर- जनकपुर- बर्दीवास रेल परियोजना का उदघाटन , जयनगर- जनकपुर के बीच ट्रेन का परिचालन शुरू किया जाना चाहिए ताकि सीमा के आरपार सकारात्मक वाताबरण का निर्माण हो सके,, परस्पर अविश्वास का धुंध छटे,। विश्वास के माहौल में ही सीमा संबंधी वार्ता भी सफल हो सकती हैं पर इसके लिए जरूरी यह है कि नेपाल को किसी भी तरह से खुद को चीनी विस्तारवाद का संवाहक या ध्वजवाहक बनने से परहेज रखना होगा अन्यथा विकास और विश्वास की साझेदारी तथा समृद्ध और खुशहाल नेपाल का सपना की बात निरर्थक सावित हो सकता हैं।


