“बहुत गहरी अनुभूति और यथार्थ का चित्रण – साहित्य, साहित्यकार और वैश्विक धरोहर “

सुपरिचित कवि, विजय तिवारी जी से प्रथम मुलाकात श्रीनाथद्वारा में साहित्य मंडल द्वारा आयोजित समारोह में हुई। ग़ज़ल कहने का उनका अंदाज ही नहीं, उनका सौम्य व्यक्तित्व भी प्रथमदृष्टया प्रभावित करता है। श्रीनाथद्वारा के बाद भी अनेक बार मिले। विद्वान शिक्षक होते हुए भी उनके स्वभाव में साख्य भाव है जो उनकी स्वीकार्यता बढ़ाता है। मैं उनकी काव्यात्मक प्रतिभा का प्रशंसक था लेकिन जब गुजरात हिंदी साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘साहित्य, साहित्यकार और वैश्विक धरोहर’ पढ़ी तो मुझे किंचित आश्चर्य हुआ क्योंकि आमतौर पर अच्छे कवि अच्छे लेखक नहीं हो पाते। जहां तक मैं समझ पाया हूं -कवि अति संक्षेप में गहरी और विस्तृत अर्थ वाली बात को कलात्मक ढ़ंग से कहने के अभ्यस्त होते हैं जबकि शोध लेख, समीक्षा आदि विभिन्न संदर्भों सहित विस्तार की मांग करते हैं। लेकिन इस क्षेत्र में भी विजय जी का विजयी अभियान देखकर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई।
निश्चित रूप से विजय जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। इस पुस्तक में संकलित उनके 14 लेख विभिन्न विषयो ंपर उनकी गहरी समझ की कहानी स्वयं कहते हैं। सूरदास जी से आरंभ हुई यह शब्द यात्रा लेखक के अपने शहर अहमदाबाद पहुंच कर संपन्न होती है। लेकिन लेखक ने अपनी कवि बिरादरी को विशेष उपकृत किया है। यथा गुजरात के समकालीन हिंदी गीतकार, विराट व्यक्तित्व के ग़ज़ल गो: फिराक गोरखपुरी, कबीर: बहुआयामी के धनी, पदमावत में पौराणिक पात्र-कथा निरुपण, पं. ब्रजनारायण चकबसत के कलामी खाके और वली गुजरातीः फ़न और शख़्सियत। ‘साहित्य में निरुपित प्रकृति चित्रण’ और ‘उर्दू साहित्य में कौमी एकता’ भी काव्य ही है। कुल 14 में से 9 लेख अर्थात् उनका प्रथम प्रेम काव्य ही है।
‘सूरदास और उनका काव्यात्मक आभामण्डल’ सर्वाधिक विस्तृत, व्यवस्थित और विशिष्ट अंदाज से प्रस्तुत आलेख है। कुल 15 पृष्ठों में सूरदास जी के जीवन से उनके द्वारा रचित साहित्य का विद्वतापूर्वक प्रस्तुतीकरण है। तो ‘गुजरात के समकालीन हिंदी गीतकार’ में उन्होंने गुजराती-हिंदी अंतर्संबंधों को सुंदर ढ़ंग पारिभाषित किया है। इसे संयोग ही कहा जायेगा कि आलेख में वर्णित डॉ. रामदरश मिश्र जी से डॉ. किशोर काबरा तक अधिकांश गीतकार मूलतः हिंदी भाषी प्रदेशों से हैं। लेकिन जिन नूतन रंगों और विभिन्न आयामों वाले गीतों की चर्चा है वे जरूर गुजरात की धरा पर ही रचे गये।
‘विराट व्यक्तित्व के ग़ज़ल गो: फिराक गोरखपुरी’ के विलक्षण व्यक्तित्व के विभिन्न रूपों से परिचित कराते इस आलेख में उनकी रूबाईयों से नज्मों और ग़ज़लों की विशिष्टताओं की जानकारी तो हैं लेकिन न जाने क्यों फिराक साहब का असली नाम (श्री रघुपति सहाय) और नाम बदलने की कहानी चर्चा नहीं हैं। इसे फिराक साहब के ही शब्दों में कहूं तो –
कोई समझे तो एक बात कहूँ /इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं
‘कबीर: बहुआयामी के धनी’ लेखक की अध्ययनशीलता का प्रमाण है। तो ‘पदमावत में पौराणिक पात्र-कथा निरुपण’ पर और भी बहुत कुछ कहा जा सकता था। ‘पं. ब्रजनारायण चकबसत के कलामी खाके’ और ‘वली गुजरातीः फ़न और शख़्सियत’ निश्चित रूप से पाठकों का ज्ञानवर्धन करेंगे। ‘साहित्य में निरुपित प्रकृति चित्रण’ और ‘उर्दू साहित्य में कौमी एकता’ संक्षेप में कहे गये विस्तृत वक्तव्य हैं।
‘हमारी राष्ट्रभाषा और हमारी राष्ट्रीय अस्मिता’ इस संग्रह का सर्वाधिक महत्वपूर्ण आलेख कहा जा सकता है। इस आलेख में विभिन्न विदेशी विद्वानों के हिंदी के पक्ष में दिये गये कथनों को प्रस्तुत कर लेखक ने विदेशी भाषा की गुलामी करने वाले ‘काले अंग्रेजों’ को आंखे खोलने के लिए बाध्य किया है। तो ‘वैश्विक धर्म: अपने कर्तव्य का पालन’ में श्री भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ का सार प्रस्तुत कर गंभीर बात को सरल बना दिया है। वास्तव में ‘परिस्थितियों द्वारा सौंपे गये कर्तव्य का शुद्ध अंतर्करण से निष्ठापूर्वक निर्वहन’ ही धर्म है। ‘चलो भगवान बनें’ आधुनिक दृष्टि से सर्वशक्तिमान को समझाने और ढ़ोंग की पोल खोलने का प्रयास है।
‘जिंदगी में शॉटकट कितने जरूरी’ जैसे महत्वपूर्ण विषय को अति संक्षिप्त कर प्रस्तुत करना लेखकीय कला है। तो ‘वैश्विक अस्मिता: अहमदाबाद’ अपने शहर से न्याय करने के समान है। बचपन से अब तक सैंकड़ों बार अहमदाबाद प्रवास के दौरान बहुत कुछ जानने- देखने के बाद भी इस लेख ने बताया कि मेरा अहमदाबाद से परिचय आधा- अधूरा है। इसलिए लेखक को साधुवाद। लेकिन अहमदाबाद के विभिन्न स्थलों की जानकारी संग यदि ‘कर्णावती’ की चर्चा भी की जाती तो लेखक स्वयं को साम्यवादी ठप्पे से बचा सकते थे। खैर कुल मिलाकर यह लेख पाठक मन में गुजरात के प्रति आकर्षण बढ़ायेगा।
‘साहित्य, साहित्यकार और वैश्विक धरोहर’ पुस्तक के लिए प्रिय विजय तिवारी जी और प्रकाशन सहयोग के लिए गुजरात हिंदी साहित्य अकादमी को बहुत-बहुत बधाई। आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि यह पुस्तक बहुचर्चित होकर लोकप्रियता प्राप्त करेगी।
(डॉ. विनोद बब्बर)
संपादक, राष्ट्र-किंकर
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