कल हम हो ना हो जान किसने पाया है : डा.करुणा वन्त
स्नेह
बन्द खिड्कीके दरारोँ से आती रोशनी
आस कुछ जगाती है
सब ठीक हो जाएगा कह
कोरोना के त्रास से बचाती है
घर के अन्दर भी अब
ज्वान बूढोँ से डरता है
दया स्नेह का स्थान अब
भय और चिन्ता ले लेता है
भय एैसा क्योँ है भरा पड़ा
आगे या पीछे जाना तो सबको है भला
मृत्यु ने क्या कभी
जवान और बुढोँ को अलग रुप से देखा है
यम की जिद्द के आगे
इन्सान ने हमेशा घुटना टेका है
ये समय है नयी सीख लेने का
हर क्षण जीवन के सुख से जीने का
कल कुछ अच्छा करेँगे सोच
ब्यर्थ आजको नही खोना है
हर पल हर धड्कन को
सन्तोष आनन्द के साथ जीना है
छोड कर अच्छे कर्म अपने
कोरोना को चौँका कर जाना है
भोले प्यारे प्रिय सभी
कतार मे मुझे आगे आना है
तुम से ज्यादा इस धर्ती पर
समय मैने गुजारा है
सम्झी नासम्झी मे
बहुत पाया और कुछ खोया है
वक्त जो गुजरा
वो लौट के ना कभी आया है
थाम लो कसकर उन पलोँ को
जो अभी हाथ तुम्हारे आया है
कल हम हो ना हो
जान किसने पाया है
बाँकी बचा सारा स्नेह, करुणा
तुम पर हम ने बरसाया है



