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माँसाहार, मानवता और महामारी : अजय कुमार झा

 

हिमालिनी  अंक अगस्त 2020 । कोरोना महामारी के संकट से मुक्ति के लिये समूची दुनिया की नजरे सनातन संस्कृति के आधारभूमि भारत पर टिकी है, भारत की संस्कृति एवं जीवनशैली पर दुनिया का भरोसा बढ़ रहा है । क्योंकि योग, अहिंसा, सह–अस्तित्व, शाकाहार, नैतिकता, संयम आदि जीवन के आधारभूत जीवनमूल्य इसी देश की माटी में रचे–बसे हैं । विशेषतः भारत में जैनधर्म एवं उसका जीवन–दर्शन कोरोना के वर्तमान संकट के दौर में समाधान के रूप में सामने आया है, जैनमुनि मुंह पर पट्टी (मुंहपत्ती) बांधते हैं, जो आज मास्क के रूप में समूची दुनिया अंगीकार कर रही है । सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग), आइसोलेशन, व क्वारंटीन (एकांत) जैन मुनि एवं साधक के जीवन के अभिन्न अंग आज दुनिया के लिये कोरोना मुक्ति के सशक्त आधार बन रहे हैं । शाकाहार एवं मद्यपान का निषेध भी जैन जीवनशैली के आधार है, जिनका बढ़ता प्रचलन कोरोना महासंकट से मुक्ति का बुनियादी सच है ।

मनुष्य एक अकेली प्रजाति है जिसका आहार अनिश्चित है । अन्य सभी जानवरों का आहार निश्चित है । उनकी बुनियादी शारीरिक जरूरतें और उनका स्वभाव फैसला करता है के वे क्या खाते हैं और क्या नहीं, कब वे खाते हैं और कब उन्हें नहीं खाना होता है । किन्तु मनुष्य का व्यवहार बिलकुल अप्रत्याशित है, वह बिल्कुल अनिश्चितता में जीता है । लेकिन अगर मनुष्य थोड़ी सी भी समझदारी दिखाए, अगर थोड़ी सी बुद्धि से जीने लगे, थोड़ी सी विचारशीलता के साथ, थोड़ी सी अपनी आँखें खोल ले, तो सही आहार का निर्णय लेना बिलकुल कठिन नहीं होगा ।
मनुष्य का शरीर रासायनिक तत्वों से बना है, शरीर की पूरी प्रक्रिया रासायनिक है । अगर मनुष्य के शरीर में शराब डाल दी जाये, तो उसका शरीर पूरी तरह उस रसायन के प्रभाव में आ जायेगास यह नशे के प्रभाव में आ कर बेहोश हो जायेगा । कितना भी स्वस्थ, कितना भी शांत मनुष्य क्यों न हो, नशे का रसायन उसके शरीर को प्रभावित करेगा । कोई मनुष्य कितना भी पुण्यात्मा क्यों न हो, अगर उसे जहर दिया जाये तो वह मारा जायेगा ।

ध्यान, सहिष्णुता, प्रेम, करुणा, हार्दिकता, नैतिकता, स्वास्थ्य, पर्यावरण, धार्मिकता, अध्यात्मिकता, सांस्कृतिक, सौंदर्य, आर्थिक लगायत अन्य चेतनागत उत्थान तथा व्यक्तित्व निर्माण हेतु मनुष्य शाकाहार को अपनाते हैं । शाकाहारियों में मासूमियत और सादगी तथा सहृदयता अधिक पाया जाता है । माँस घंटो में सड़ने लगता है जबकि फल और सब्जी हप्तों तक स्वस्थ रहता है, इसीकारण शाकाहारियों में बीमारियों से लड़ने की क्षमता ज्यादा होती है । आज के इस कोरोना महामारी में चीन लगायत के सभी माँसाहारी देस तथा विश्व स्वास्थ संगठन ने भी आम नागरिकों में शाकाहारी भोजन पर अधिक ध्यान देने के लिए जोड़ देता आ रहा है ।

कोरोना के कहर के बीच इंसान के खुशहाल जीवन एवं निरोगता के लिये खानपान में बदलाव की स्वर दुनियाभर में सुनाई दे रहे हैं । मांसाहार को लेकर भी नजरिया बदल रहा है, मांसाहार के बुरे नतीजों को लेकर दुनिया चिन्ताग्रस्त एवं सावधान हुई है । ऐसा प्रतीत होता है शाकाहार का प्रचलन तेजी से बढ़ेगा क्योंकि कोविड१९ वायरस भी, जो अभी पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले चुका है, पिछली शताब्दी में फैली कई महामारियों की तरह इसी मांसाहार की आदत की ही देन है । हिंसा का बदला हिंसा के रूप मे प्रकृति अपना कहर हम मनुष्यों पर ढाती आई है । भयानक पीड़ा से गुजरने वाली उस कÞत्ल खाने की क्रुरता को देखकर जिस किसी का भी कलेजा काँप उठेगा । पत्थर दिल इंसान भी कुछ पल के लिए सन्न रह जाएगा । माँसाहार करना तो दूर, वह ठीक से सो भी नहीं पाएगा । फिर भी अधिकतर लोग माँसाहार करते हैं । हाल के वर्षों में मांसाहार छोड़ने वालों की संख्या भारत ही नहीं दुनिया में बढ़ी हैं, कोरोना महामारी के कारण इसमें अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिल रही है ।

अभी ग्लोबल रिसर्च कंपनी इप्सोस के कराये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार कोरोना महामारी से पहले ही ६३ प्रतिशत भारतीय अपने भोजन में मांसाहार के स्थान पर शाकाहार को अपनाने लगे थे, अमरीका में डेढ़ करोड़ व्यक्ति शाकाहारी बन चुके थे । दस वर्ष पूर्व नीदरलैंड की डेढ़ प्रतिशत आबादी शाकाहारी थी जबकि वर्तमान में वहाँ पांच प्रतिशत व्यक्ति शाकाहारी हैं । सवा आठ करोड़ की आबादी वाला जर्मनी जनसंख्या की दृष्टि से यूरोप का सबसे बड़ा और संपन्नता की दृष्टि से भी एक सबसे अग्रणी देश है. यूरोप में सर्वोच्च जीवनस्तर वाले देशों के एक सर्वे में वह २०१६ में तीसरे नंबर पर था । पूरी तरह मांसाहारी संस्कृति और परंपरा वाले जर्मनी में अब कम से कम १० प्रतिशत लोग पूरी तरह शाकाहारी बन गये हैं । कुछ तो इतने विशुद्ध या कट्टर शाकाहारी बन गये हैं कि वे दूध–दही–मक्खन जैसी उस हर चीजÞ से परहेजÞ करते हैं, जो पशुओं या मधुमक्खियों जैसे जीव–जंतुओं से मिलती है । ऐसे कठोर निरामिषों के लिए १९४४ में अंग्रेजÞी में ‘वीगन’ नाम का एक नया शब्द गढ़ा गया था । इस बीच जर्मनी ही नहीं, अनेक पश्चिमी देशों में भी फैल रहे ‘वीगन–वाद’ को, जनसाधारण के खान–पान की आदतों में परिवर्तन लाने की एक ऐसी नयी विचारधारा भी कहा जा सकता है, जो शाकाहार को भी पूर्णतः अहिंसक बनाने के आंदोलन का रूप लेने लगी है । सुपर बाजÞारों में ‘वीगन–वादियों’ के लिए अलग से स्टैंड बनने लगे हैं और उनके लिए विशेष रेस्त्रां भी खुलने लगे हैं ।
सुप्रसिद्ध गैलप मतगणना के अनुसार इंग्लैंड में प्रति सप्ताह तीन हजार व्यक्ति शाकाहारी बन रहे थे । वहाँ कोरोना से पहले पच्चीस लाख से अधिक व्यक्ति शाकाहारी बन चुके थे । बढ़ती बीमारियां के कारण जीवन की कम होती सांसों ने इंसान को शाकाहार अपनाने के लिये विवश किया और अब कोरोना महामारी का बड़ा सत्य यही है कि शाकाहार एक उन्नत जीवनशैली है, निरापद खानपान है, स्वस्थ जीवन का आधार है । प्रकृति ने मनुष्य को स्वभाव से ही शाकाहारी बनाया है । कोई भी श्रमजीवी मांसाहार नहीं करता, चाहे वह घोड़ा हो या ऊँट, भैसा, गदहा, खच्चर, बैल हो या हाथी । फिर मनुष्य ही अपने स्वभाव के विपरीत मांसाहार कर संसार भर की बीमारियां, विकृतियां एवं कोरोना महामारी को पनपने का खतरा क्यों मोल ले रहा है ?

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आज विश्व के सभ्य और सुशिक्षित लोग शाकाहारी जीवन प्रणाली को अधिक आधुनिक, प्रगतिशील और वैज्ञानिक मानने लगे हैं, गर्व महसूस करने लगे हैं । इस कोरोना महामारी ने तो उनकी सोच को और अधिक पुष्ट कर दिया है ।
जर्मनी के ‘डीजीई’ के आहार विशेषज्ञों का कहना है कि शाकाहार में भी उन विटामिनों और सूक्ष्म मात्रा वाले खनिज तत्वों के विकल्प उपलब्ध हैं, जिन्हें मांसाहार की विशेषता बताया जाता है । उदाहरण के लिए पालक में लोहा ही नहीं कैल्शियम भी होता है । यही कैल्शियम करमसाग (अंग्रेजÞी में केल) और बथुआ (अरूगुला) में भी होता है । दालों से भी लोहे की सारी कमी पूरी की जा सकती है । आयोडीन के लिए आयोडीन वाला नमक लिया जा सकता है । जस्ता (जिÞंक) मिलेगा गेहूं और जौ के चोकरदार आटे तथा कुम्हड़े (कद्दू) के बीज में । विटामिन बीद्द और विटामिन डी मशरूम (खुमी, कुकुरमुत्ता) में मिलता है । इस संस्था के आहार वैज्ञानिक मार्कुस केलर कहते हैं, ‘वास्तव में समझबूझ के साथ जुटाये गये शाकाहार से भी सभी आवश्यक पोषक तत्व मिल सकते हैं । उदाहरण के लिए उनमें उच्च रक्तचाप और रक्तवसा (कोलेस्ट्रोल) को घटाने वाले और पाचनक्रिया पर अनुकूल प्रभाव डालने वाले ऐसे माध्यमिक (सेकेंडरी) पदार्थ भी हो सकते हैं, जो केवल शाकाहार में ही संभव हैं ।’

ज्ञातव्य हो ! ’गेहूं के १०० ग्राम ज्वारे में २०.५७ मिलीग्राम आयरन, ५७.१४ ग्राम काबोहाइड्रेट, २८.५७ग्राम प्रोटीन, फायबर २८.६ ग्राम, पोटैशियम ३००० मिलीग्राम, विटामिन सी १७१.४ मिलीग्राम होता है । इसके अलावा इसमें बीटा कोरोटेन और विटामिन बी ९ भी मिलता है ।’
मयामी यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर एवं ‘फिलास्फर एंड द वुल्फ’ और ‘एनिमल्स लाइक अस’ जैसी पुस्तकों के लेखक मार्क रौलैंड्स चेतना और पशु अधिकारों संबंधी अपने शोध के माध्यम से दुनिया को चेताया है कि मांसाहार कोरोना महामारी से भी अधिक पीड़ा दायक स्थित उत्पन्न सकता है । वे लोगों में असहिष्णुता और संवेदनहीनता को देखते हुए कहते हैं कि, ‘मुझे लगता है, लोगों को समझाने की जरूरत है कि मांसाहार से उन्होंने अपना कितना नुकसान कर लिया है ।’ यह न केवल हृदय संबंधी बीमारियां, कैंसर, डायबिटीज और मोटापा बढ़ा रहा है बल्कि मानसिक, सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न कर रहा है । शाकाहारी पुरुषों–महिलाओं के शरीर की ही नहीं, उनके पसीने की गंध भी मांसाहारी पुरुषों–महिलाओं की अपेक्षा सुखद होती है !
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में देखा गया कि शाकाहारियों का हृदय अपेक्षाकृत जल्दी द्रवित होता है और मांसाहारियों में हिंसाभाव कुछ ज्यादा ही होता है । वास्तव में मांसाहारी, तामसी व्यक्ति अतिशय भोजन करता है । वह पेट को इतना भर लेता है कि मस्तिष्क को ध्यान की तो बात दूर, विचार करने तक के लिए ऊर्जा नहीं मिलता । और धीरे–धीरे उसका मस्तिष्क छोटा होता चला जाता है, सिकुड़ जाता है । उसका तंतु–जाल मस्तिष्क का निम्न तल का हो जाता है । वह पशुवत हो जाता है । बस एक शरीर मात्र रह जाता है ।
एक सर्वेक्षण के द्वारा पता चला है कि अपराधियों में मांस खाने वालों की संख्या अधिक पाई गई है । मांसाहारी व्यक्तियों में अधिक रोग पाए जाते हैं । उसकी सहनशक्ति कम हो जाती है, उसके अन्दर गुस्सा व चिड़चिड़ापन ज्यादा बढ़ जाता है, वासना और उत्तेजना की सोच बढ़ जाती है । मनुष्य क्रूर व निर्दयी हो जाता है, उसकी अपराधिक सोच बढ़ जाती है । मांस गलत सोच को जन्म देता है जिससे समाज में आपसी मनमुटाव, घर का तनाव, लड़ाई झगड़े, लूटमार, आदि की वारदातें बढ़ जाती हैं ।
अभी कुछ दिन पहले बंगला देश में ढाका में एक आदमी पकड़ा गया, जो मरे हुए मुरदों को खाकर जी रहा था वर्षों से । युगांडा के क्रूर शासक ईदी अमीन जब अपनी राजधानी को छोड़ कर भागा तो उसके फ्रीज में छोटे बच्चों का मांस पाया गया । और उसकी राजधानी में रोज बच्चे चुराए जाते थे और ईदी अमीन की पुलिस जांच–पड़ताल करती थी कि बच्चे कहां गए । और बच्चे जाते थे ईदी अमीन के फ्रीज में । तो पकड़ें उनको कैसे ? पकड़े कौन राष्ट्रपति को । लेकिन ईदी अमीन ने बाद में स्वीकार किया कि कोई कुछ भी कहे, लेकिन छोटे बच्चों का मांस जितना स्वादिष्ट होता है इतनी स्वादिष्ट चीज दुनिया में कोई और होती ही नहीं । तो क्या इनकी मान कर चलेंगे ? स्वाद के लिए क्या बच्चों को काटंगे ? स्वाद के लिए क्या जानवरों को काटेंगे ?
स्वाद का कितना मूल्य है ? स्वाद है ही क्या ? हमारी जीभ पर थोड़े–से दाने हैं, बिंदु है जो स्वाद को अनुभव करते हैं, जरा–सी सर्जरी से उनको अलग किया जा सकता है । इतने से स्वाद के लिए जीवन को नष्ट नहीं किया जा सकता ! शास्त्रों की सहायता तो हर चीज में ली जा सकती है । अब पुराने शास्त्र कहते हैं कि जीव ही जीव का आधार है, वही उनका आहार है । तो ऐसे शास्त्र शास्त्र नहीं हैं । ऐसे शास्त्र बेईमानों ने लिखे हैं । ऐसे शास्त्र उन्होंने लिखे हैं जो जीव का आहार करना चाहते हैं । योगी के भेष में भोगियों ने रचा है ऐसा शास्त्र । जब मानवता का चरमोत्कर्ष प्रेम, करुणा और सहिष्णुता है तो फिर हिंशा का स्थान ही कहाँ बचा ?
हृदय के शुद्ध भाव और शान्त मन से प्रकृति को देखने पर एसा लगता है जैसे प्रकृत्ति, प्राणी और मनुष्य का आपस में पौराणिक काल से गहरा नाता चला आ रहा है । हिन्दू धर्म में सूर्य, जल, अग्नि, वायु, पृथ्वीलगायत के सभी प्राकतिक धरोहरों को मनुष्य जीवन के लिए उपयोगी मानकर इन सभी तत्वों को देवताओं का दर्जा देकर इन्हें पूजनीय बताया गया है ।
पशु–पक्षी भी प्रकृत्ति की अनमोल देन है और साथ–साथ ये ज्योतिष की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण हैं । आपने देखा होगा कि हर देवी–देवता का कोई ना कोई वाहन होता है जो पशु या पक्षी है, मान्यताओं के अनुसार इन वाहनों की पूजा करने से संबंधित देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है ।
अगर आपकी कुंडली में सूर्य की स्थिति खराब है, तो आपको घोड़े बुलबुल, कोयलस चंद्रमा के लिए कुत्ता, बिल्ली, चिडि़या, मछली, कछुआस मंगल ग्रह के लिए हाथी, लोमड़ी, शिकारी कुत्ता, बाज, चील, गिद्दस बुध ग्रह के लिए बंदर, कुत्ता, नेवला, तोतास बृहस्पति के लिए बैल, घोड़ा, हिरण, चील, मोर, मछलीस शुक्र ग्रह के लिए, बकरी, सांड, चिडि़या, कबूतर शनि ग्रह के लिए, काले कुत्ते, बिल्ली, खरगोश, भालू, ऊंट, जहरीले, समुद्री मछली, उल्लू स राहु–केतु के लिए काले–भूरे रंग के जीवों की सेवा करनी चाहिए । इस प्रकार सारे जीव पूज्यनीय हो जाते हैं, फिर स्वाद के लिए हिंसा क्रूरता, असभ्यता और मूढ़ता का प्रतीक ही मना जाएगा ।
प्रकृति के द्वारा सृजित हरेक प्राणी का इस अस्तित्व में विशेष स्थान है । एक मेंढक के कम होने से डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियों के वाहक मच्छरों और फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट, टिड्डे, बीटल्स, कनखजूरा, चींटी, दीमक और मकड़ी तेजी से पनपने लगे हैं । सर्प के विनास से वातावरण में छिपे विषाक्त पदार्थ बढ़ने से रोगों का प्रकोप बढ़ने लगा है । पक्षियों के विनास के कारण आज मनुष्य को अनेकों कीड़े मकोड़े का अकारण दुखद सामना करना पड़ रहा है । गाय जो पृथ्वी को वंजर होने से बचाती है तथा कृषि और मानव के हजारों रोगों से बचाती है, उसका भी निर्ममता पूर्वक किए जा रहे हत्या से मानव जीवन संकटग्रस्त होता जा रहा है ।
ध्यान रहे ! कुछ खÞास प्रकार के कीटाणु और विषाणु, खÞास प्रजाति के पशु–पक्षिओं के शरीर में ही जीवित रहते हैं । उनका निवास स्थान उस जीव के सरीर में ही सहज होता है, लेकिन जब उस कीटाणु को उपर्युक्त शरीर नहीं मिलता तो वह दूसरा सरीर खोजना शुरु करता है, जो कि एकदम स्वाभाविक है । इस हालात में चमगादर जैसे प्राणियों का शरीर जो कोरोना के लिए उत्तम निवास स्थान है, उसे मारकर खाने के कारण कोरोना को रहने के लिए बाध्य होकर नया शरीर खोजना पड़ा, जिसमे कोरोना को आहार के रूप मे लेनेवाले मनुष्य ही आसानी से मिला । आज विश्व मानवता उसी निर्दयता का फल भोग रही है । कोरोना मनुष्य को मारना थोड़े ही चाहता है ! वास्तवमे कोरोना अपने लिए सुरक्षित स्थान ढूँढ रहा है । परन्तु हमारा शरीर उसके प्रभाव को सहन नहीं कर पा रहा है । धीरे धीरे हमारा शरीर कोरोना के साथ जीना सीख रहा है । अब समझने वाली बात यह है कि क्या माँसाहार के कारण इस तरह के महामारी और समस्याओं को जन्म देकर अपना गौरव बढ़ा रहे हैं ? क्या माँसाहारी चरित्र उच्च मानवता का द्योतक है ? क्या हिंसक पशुवत वृत्तियों से आज के सभ्य समाज मुक्त नहीं हो सकता ? क्या हम इतने क्षुद्र और गिरे हुए हैं ? क्या आज भी दानवता ही हमारा आदर्श रहेगा ? नहीं, स्वाद के लिए मासूम पशुओं को अन्धाधुन्ध पैदा करना और उसे निर्दयता पूर्वक काटना दोनों प्रक्रिया प्रकृति से साथ खिलवाड़ है । प्रकृति के साथ क्रूर व्यवहार है ।
ज्ञातव्य हो ! जैसा जीवन हमें प्यारा है, वैसे ही अन्य पशुओं को भी प्यारा है । हम कभी नहीं चाहेंगे कि मेंरे ऊपर कोई भेडि़या हमला कर दे और खा जाए । तो हमें भी दूसरों के साथ वैसा हिंसात्मक व्यवहार नहीं करना चाहिए । जीवन सबका प्रिय होता है । वास्तव में पोषणकारी और वैज्ञानिक आहार वही होता है जो उत्तेजना पैदा न करे, वे नशीला न हो, और भारी न लगे, स्फूर्तिदायक हो, संतुष्टिदायक हो, आनंददायक हो । उत्तम आहार लेने के बाद आपको भारीपन और तंद्रा महसूस नहीं होनी चाहिए । आलस और निद्रा नहीं आना चाहिए । लेकिन शायद हम सभी भोजन के बाद भारीपन और तंद्रा महसूस करते हैं, तब हमें जानना चाहिए कि हम सही भोजन नहीं कर रहे हैं ।

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