बनारस के नेपाली घाट से अतिक्रमित मंदिर तथा मूर्ति प्राप्त, पुनः विधिवत स्थापना हेतु सहमति : अंशु झा
भारत सरकार के सहयोग से बनारस के नेपाली घाट से अतिक्रमित मंदिर तथा मूर्ति प्राप्त, पुनः विधिवत स्थापना के लिए मौखिक सहमति
२७ अक्टूबर, काठमांडू । लगभग ४०–५० वर्ष से काशी के बनारस में अवस्थित नेपाली घाट तथा मन्दिर परिसर के रणमुक्तेश्वर महादेव के साथ ही विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां तथा ललितादेवी पादुका अतिक्रमण हुई थी जो भारत सरकार के सहयोग से प्राप्त हुई है । रणमुक्तेश्वर महादेव और ललितादेवी मन्दिर खाली कर खोए हुए विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां पुनः विधिवत स्थापना के लिए मौखिक सहमति हुई है ।
काशी के बनारस में भागीरथी गंगा बहती है । उक्त स्थान को शिव की नगरी भी कहा जाता है । धर्म शास्त्र के अनुसार काशी बााबा शिव के त्रिशुल पर अवस्थित है अर्थात् पृथ्वी से ऊपर । यह पवित्र स्थल धर्म कर्म के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है । इसी नदी के किनार में बाबा विश्वनाथ की मन्दिर भी अवस्थित है । इसलिए इस क्षेत्र का कुछ भाग नेपाल का राजा रणबहादुर शाह ने काशी नरेश से प्राप्त किया था और शाह ने उक्त स्थान में नेपाली घाट निर्माण किया । नेपाली घाट निर्माण के साथ ही राजा शाह ने वहां विभिन्न मठ, मन्दिर और धर्मशाला भी निर्माण किया था । बाद में नेपालीघाट को उनकी पत्नी रानी ललितत्रिपुरसुन्दरी ने जीर्णोद्धार कर और भी परिष्कृत किया, साथ ही मठ, मन्दिर और धर्मशाला भी बनाई । वही नेपाली घाट ललिताघाट के नाम से प्रख्यात हुआ । वनारस हिन्दु विश्वविद्यालय के सङ्ग्रहालय में टांगा गया विशाल तैलचित्र में भी ललिताघाट का नाम तथा स्थान उल्लेख है । रणबहादुर शाह द्वारा काशी नरेश से प्राप्त ललिताघाट क्षेत्र नेपाल राष्ट्र के अन्तर्गत ही है ।
परन्तु ४०–५० वर्ष पहले ललितागौरी मन्दिर के छत पर अवस्थित रणकेश्वर महादेव के साथ ही तीन और शिवलिङ्ग तथा ललिता गौरी माता की चरण शिला अवस्थित स्थान अतिक्रमण हो गया था । उक्त स्थान पर सिमेन्ट का छत लगाकर उक्त मन्दिर को अनाधिकृत रूप में आवास में परिणत कर लिया गया था ।
अन्वेषक गोपाल झा के अनुसार ‘ललितादेवी मन्दिर के ऊपर मौनी बाबा का मठ निर्माण हुआ है । और उसी स्थान पर सिद्ध बाबा के नाम से जाने जाने वाला मौनी बाबा ने अपना आसन जमा लिया है । इसके बाबजुद भी रणकेश्वर महादेव और गौरी माता के चरण की पूजा यथावत ही रहा ।
श्री साम्राज्वेश्वर पशुपतिनाथ महादेव मन्दिर तथा धर्मशाला संचालक समिति (ट्रष्ट) का प्रबन्धक रोहित ढकाल के अनुसार ‘संवत् २०४० से सिद्ध बाबा की मृत्यु पश्चात गजानन्द सरस्वती ने उक्त क्षेत्र को अपने अधिन में कर लिया तथा वहां जनसाधारण का आवागमन भी वन्चित कर दिया । विभिन्न जाल झेल कर ललिताघाट स्थित रणकेश्वर महादेव मन्दिर तथा ललितागौरी चरण मन्दिर का धनीपूर्जा अपने नाम से करबा लिया । और वहां पर अगर कोई नेपाली कुछ बोलने जाता तो उसके साथ बदसलुकी से पेश आता था । एक बहुत बडा त्रिशुल लेकर खदेडता था । उसने रणकेश्वर महादेव मन्दिर को रसोई घर में परिणत कर लिया और वहां अवस्थित तीन शिवलिंगों में से दो शिवलिंग भी गायब हो गया । इसकी जानकारी होते ही नेपाली धर्मशाला संचालक डा. गोपाल प्रसाद अधिकारी ने पुलिस को सूचना दी । सीओ चौक के नेतृत्व में पुलिस टीम ने मौके पर पहुंची । पुलिस ने पुराने चित्रों से मौके का मिलान कराया । जांच के दौरान पुलिस ने बोरे में छिपाकर रखा गया नंदी बरामद किया । दोनों शिवलिंगों के बारे में पूछ ताछ करने पर आरोपित जबाब नहीं दे सके । पुलिस ने एक को गिरफ्तार कर लिया । शिवलिंग की स्थापना वर्ष १८४३ में तत्कालिन नेपाल नरेश ने किया था ।
नेपाल राष्ट्र का पुरातात्विक सम्पदा के साथ ललिताघाट क्षेत्र में विविध प्रकार से अतिक्रमण हो रहा है और इसके लिए नेपाल सरकार तथा निकट सम्बन्ध रखने वाला गुठी संस्थान इसे संजोग कर रखने के लिए कोई उचित पहल नहीं दिखा रही है । नेपाल सरकार की अकर्मन्यता के कारण नेपाली सनातनी साँस्कृतिक तथा धार्मिक सम्पदा की रक्षा नहीं हो पा रही है जो नेपाल के लिए अत्यन्त दुखद तथा ग्लानिपूर्ण विषय है ।
ललिताघाट क्षेत्र नेपाल सरकार, संस्कृति मन्त्रालय के प्रत्यक्ष संरक्षण में है । और ललिताघाट क्षेत्र का विकास, सम्वर्धन तथा सुरक्षा के लिए ‘श्री साम्राज्येश्वर पशुपतिनाथ महादेव मन्दिर तथा धर्मशाला सञ्चालक समिति (ट्रष्ट)’ की स्थापना की गई है । इसके बाबजुद भी नेपाल सरकार उक्त धरोहर सुरक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है । भारत सरकार तथा उत्तरप्रदेश की सरकार ने आश्वासन दी है कि नेपाल का मठ मन्दिर तथा मूर्तियों को उपलब्ध कराकर पुनः स्थापित की जायेगी ।




