मीडिया को जिम्मेदार बनाने की पहल कौन करेगा : वीरेन्द्र बहादुर सिंह
डर इस बात का है कि देश में हर जगह सरकारी विचारधारा के आधार पर विभाजन हो रहा है और इसे ध्यान मेें रख कर देखा जाए तो संभव है कि आगे चल कर भी कोई कंपनी ऐसा कह सकती है कि सरकार विरोधी कंटेंट दिखाने वाले को विज्ञापन नहीं देगी अथवा किसी पार्टी या किसी नेता का विरोध करने वाले चैनल या अखबार को विज्ञापन नहीं देगी। अगर ऐसा होता है तो इससे मीडिया को जिम्मेदार बनाने के बजाय माहौल और अधिक बिगड़ने का खतरा पैदा हो सकता है।
वीरेन्द्र बहादुर सिंह | लाख रुपए का सवाल यह है कि मीडिया को जिम्मेदार बनाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी? संसद, सरकार या अदालतें आगे आएंगी या सामान्य आदमी इसका नेतृत्व कारेगा या फिर बाजार की ताकतें इन्हें जिम्मेदार बनाएंगी? फिलहाल तो सरकार ने इस सारे मामले से हाथ खींच लिए हैं। पैसा देकर टीआरपी बढ़ाने का न्यूज चैनलों का घोटाले का खुलासा हुआ तो सूचना और प्रसारणमंत्री ने कहा कि व्यवस्था में बहुत बड़े बदलाव की जरूरत है, पर यह बदलाव करना सरकार के कार्यक्षेत्र में नहीं है।
तो क्या इसके लिए न्यायालय से अपेक्षा की जा सकती है? फिलहाल देश की अनेक अदालतों में मीडिया अथवा उससे जुड़े लोगों को लेकर केस दाखिल किए गए हैं। कोरोना फैलने के एकदम शुरू के दिनों में दिल्ली में तबलीगी जमात के तमाम लोगों के बड़ी संख्या में कोरोनाग्रस्त मिलने की घटना का जिस तरह से कवरेज किया गया था, उसे लेकर हाईकोर्ट कुछ दिनों पहले ही नाराजगी जता चुका है। कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में अभव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग किया गया था। मीडिया द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी के दुरुपयोग को लेकर बॉलीवुड भी सामूहिक रूप से कोर्ट में पहुंचा है और उनके बारे में मन में जो आए वह बोलने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
इसके पहले बाजार ने भारतीय मीडिया को जिम्मेदार बनाने की एक पहल की है और उसका स्वागत भी होना चाहिए। जबकि उसके अपने भी भय हैं, परंतु अगर मीडिया की इज्जत और स्वतंत्रता बचानी है तो इस तरह की पहल का स्वागत करना ही पड़ेगा। पारले-जी कंपनी ने कहा कि आक्रामक और हमेशा जहर उगलने वाले समाचार परोसने वाले न्यूज चैनलों को वह अपने एक भी प्रोडक्ट का विज्ञापन नहीं देगी। उसके पहले ऑटोमोबाइल सेक्टर की कंपनी बजाज ग्रुप ने घोषणा की थी कि वह भड़काऊ और समाज को विभाजित करने वाली सामग्री प्रसारित करने वाले चैनलों को विज्ञापन नहीं देगी। दोनों कंपनियों की पहल अच्छी है और उनके इरादे के बारे में शंका भी नहीं करनी चाहिए।
पर इसमें डर इस बात का है कि देश में हर जगह सरकारी विचारधारा के आधार पर विभाजन हो रहा है और इसे ध्यान मेें रख कर देखा जाए तो संभव है कि आगे चल कर भी कोई कंपनी ऐसा कह सकती है कि सरकार विरोधी कंटेंट दिखाने वाले को विज्ञापन नहीं देगी अथवा किसी पार्टी या किसी नेता का विरोध करने वाले चैनल या अखबार को विज्ञापन नहीं देगी। अगर ऐसा होता है तो इससे मीडिया को जिम्मेदार बनाने के बजाय माहौल और अधिक बिगड़ने का खतरा पैदा हो सकता है।
इसलिए सबसे अच्छी बात यह होगी कि मीडिया अपना नियमन खुद ही करे। पर सवाल यह है कि मीडिया अपना नियमन स्वयं किस तरह करे? एक रास्ता यह है कि पत्रकारत्व के उच्च आदर्शों को नजर के सामने रखा जाए और उसके आधार पर आचरण हो। पर वर्तमान समय में यह संभव नहीं है। अखबारों को सर्क्यंलेशन बढ़ा कर नंबर वन होना है, तो चैनलों को टीआरपी में नंबर वन होना है। इसी तरफ डिजिटल मीडिया को भी व्यूज की संख्या बढ़ा कर अग्रसर होना है। इसमें आजकल नंबर वन बनाने वाले कितने ‘चोर दरवाजे’ भी खुल गए हैं। डिजिटल मीडिया के नकली या खरीदे गए व्यूअर्स देने का काम भी बेधड़क चल रहा है। सोशल मीडिया प्लेटकार्म भी रुपए लेकर सामग्री प्रमोट कर रहा है।
ऐसा ही कुछ खेल प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी चल रहा है। यह उजागर करने वाले समाचार भी आ रहे हैं। यह भी पता चला है कि तमाम संस्थाएं सर्क्युलेशन और टीआरपी के आंकड़ों में अग्रसर रहने के लिए तरह-तरह के उल्टे-सीधे रास्ते अपना रहे हैं। विज्ञापन पाने के लिए ऐसा करना जरूरी होता है। हकीकत में विज्ञापन की पूरी व्यवस्था आंकड़ों के गणित पर ही टिकी है। आंकड़े बढ़ाने की होड़ के कारण ही समाचार की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसी होड़ में अखबार, चैनल और डिजिटल मीडिया लोगों की रुचि पर असर डाल रहे हैं। हर वस्तु के आधार को उचित ठहरा दिया जाता है कि लोग यही देखना चाहते हैं। जबकि हकीकत उसकी उल्टी होती है। लोग मजबूरी में कमजोर कंटेंट देखते और पढते हैं।
देश के किसी भी नागरिक ने नहीं कहा कि न्यूज चैनलोें ने सालों पहले यह जो सिद्धांत स्थापित कर दिया था कि ‘थ्री सी’ यानी सिनेमा, क्रिकेट और क्राइम बिकता है। सालों तक ये तीनों चीजें बिकती रहीं। उसके बाद हर मामले को सनसनीखेज बना कर बेचना शुरू हुआ, जो आज भी चल रहा है। सबसे आगे रहने की होड़ में, सबसे पहले समाचार बताने की उतावल में और समाचार को सबसे अधिक सनसनीखेज बना कर पेश करने की चिंता में चैनल, डिजिटल मीडिया और कुछ हद तक अखबारों ने भी अपनी साख को नुकसान पहुंचाया है। नंबर वन बनने और अधिक से अधिक विज्ञापन पाने की प्रतियोगिता में लोकतंत्र का इस चौथे स्तंभ ने खुद को तमाशा बना लिया है, जिसे सुधारने की जरूरत है। संसद, सरकार और अदालतें यह काम कर भी रही हैं। बाजार ने तो शुरू भी कर दिया है। परंतु अच्छा यह होता कि अगर मीडिया स्वयं यह काम करती। अगर बाहर की ताकतें भले ही कोई उचित संस्था क्यों न हो, मीडिया को नियंत्रित करने या जिम्मेदार बनाने की पहल करेगी तो मीडिया को अपनी स्वतंत्रता और अधिकार खोने पड़ सकते हैं। इससे मीडिया समूहों को खुद ही पहल करनी चाहिए। प्रेस एसोसिएशन, ब्राडकास्ट एसोसिएशन, प्रेस काउंसिल आफ इंडिया, प्रेस क्लब जैसे संगठनों को आगे आना चाहिए। ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए, जिससे सरकार, संसद और अदालतों को यह संदेश जाए कि मीडिया द्वारा घोटालों को सुधारने का प्रयास हो रहा है। यह अपने लिए अपनी गौरवशाली विरासत को बचाने का एक निर्णायक पहल का समय है। क्योंकि स्वतंत्र और सद्बुद्धि वाला पत्रकारत्व बचेगा तभी देश, समाज, लोकतंत्र और नागरिकों को बचाना संभव होगा।

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