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पहली बार हो रहा है ग्यारह साल में तीस दिन का कुंभ : श्रीगोपाल नारसन

 
पारूल विश्वविद्यालय की ओर से कुंभ दर्शन एंड इट्स सोशल एंड साइक्लोजिकल इम्पेक्ट विषय पर वेबीनार आयोजित

वड़ोदरा के पारूल विश्वविद्यालय में संचालित डिपार्टमेंट ऑफ साइक्लॉजी की ओर से कुंभ दर्शन एंड इट्स सोशल एंड साइक्लोजिकल इम्पेक्ट विषय पर वेबीनार आयोजित की गई। वेबीनार के मुख्य अतिथि एवं प्रखर वक्ता, साहित्यकार एवं विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ के मानद उपकुलसचिव श्रीगोपाल नारसन ने फेकल्टी सदस्यों, विद्यार्थियों एवं प्रतिभागियों को कुंभ के बारे में रौचक जानकारी दी।वेबीनार का शुभारंभ श्रीगोपाल नारसन ने कुंभ के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए की।उन्होंने बताया कि कोरोना की गाईड लाईन का पालन करते हुये पहले शाही स्नान में करीब 22 लाख लोगों ने कुंभ की  डुबकी लगाई। जिन लोगों ने कोरोना गाईड लाईन की अनुपालना नहीं की उनमें से करीब 2500 गाडियों में आये लोगों को बिना स्नान किये ही बैरंग लोटना पड़ा। श्रीगोपाल नारसन ने कुंभ के करीब 850 साल के प्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर इसके इतिहास का वर्णन किया।जिसके तहत  पहला कुंभ मेला आदि शंकराचार्य की ओर रे आंरभ करने की बात  कही गई।उन्होंने समंद्र मंथन के जरिये उत्पन्न हुये अमृत कलश को लेकर देवताओं एवं राक्षसों में हुये झगडे़ को लेकर कलश की कुछ बूंदों के नासिक, हरिद्वार, उज्जैन एवं प्रयागराज में गिरने के बाद से अब तक पारंपरिक रूप से कुम्भ मेले के भरने की परंपरा के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि कुंभ अमुमन 12 साल में एक बार भरता है लेकिन कुछ खगोलिय घटनाओं के चलते ऐसा पहली बार हुआ है कि 11 साल में ही यह कुंभ हरिद्वार में भरा है। यह मेला 98 दिवस का होता है। मगर इस बार आंरभ में तो सरकार ने चार महीने की ही तैयारियां की थी लेकिन कोरोना के चलते इसे एक महीने तक ही सीमित कर दिया गया।उन्होंने कुंभ के दौरान हुई आपदाओ, बीमारियो, महामारी एवं भीड़ के कारण मची भगदड़ का जिक्र किया और इनमें मरे लोगो की संख्या का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि आरंभ से ही कुंभ मेलों में लाखों करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु आते रहे है। आरंभ में इस प्रकार की यात्राओं में शामिल होने वाले लोग इसे अपनी अंतिम यात्रा ही मानकर चलते थे एवं जिवित रहते तो घरों लोटकर आते थे।यदि यात्रा के दौरान कोई मर जाता तो उसका अंतिम संस्कार तीर्थ स्थान पर कर दिया जाता था। मगर आज यात्रा में पर्याप्त संसाधनों के कारण लोग यात्रा, तीर्थाटन एवं पर्यटन के लिये भी कुंभ जैसे मेलों में जाते है एवं एक दिन में ही स्नान, पूजा आदि कर घर लौट जाते है। कुंभ मेलों में हुई महामारी के कारण कोरोना काल जैसे ही सोशल डिस्टेंस  लागू हुई थी। पहले भी कुंभ के दौरान खुले में शोच पर रोक लगाई गई थी, ताकि बीमारियां न होने पाए।  उन्होंने प्रशासन एवं पुलिस के कार्यों की सराहना की व कुंभ के पहले शाही स्नान की सफलता  पर खुशी जाहिर की। उन्होंने कुंभ के कारण स्थानीय जनता की परेशानियों एवं उन पर साईक्लोजिकल प्रभावों को लेकर भी प्रकाश डाला।  उन्होंने मां गंगा के जल के महत्व पर कहा कि हर की पौड़ी से भरा हुआ गंगाजल  कभी खराब नहीं होता।  उन्होंने कहा कि चाहे कितनी भी संख्या में श्रद्धालु हरिद्वार में आ जाये, चाहे इनकी संख्या करोड़ों में हो लेकिन यहां कोई भूखा नहीं सोता । वेबीनार के दौरान श्रीगोपाल नारसन ने प्रश्नोंत्तरी के माध्यम से प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं को  शांत किया। वेबीनार में उन्होंने विभिन्न अखाड़ो, साधु महात्माओं की ओर से किये जाने वाले आयोजनों के बारे में जानकारी दी। वहीं संत महात्माओं की तपस्याओं से भी अवगत कराया।
पारुल विश्वविद्यालय की ओर से प्रो.रमेश कुमार रावत ने वेबीनार के आरंभ में श्रीगोपाल नारसन का स्वागत स्वागत किया । वेबीनार में देश के विभिन्न प्रदेशो से सैकंडो विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं पत्रकारों ने भाग लिया।

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