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देवी नहीं, बस हमें इंसान रहने दो : डॉ. श्वेता दीप्ति

 

नारी को यदि समाज राहत देना चाहता है तो उसके लिए स्त्री सुलभ कार्य देकर देकर उसकी निपुणता का लाभ उठाए ना कि उसे उसकी शारीरिक संरचना के आधार पर शोषण का सामान बनाए ।

 

हिमालिनी मार्च २०२१ अंक । नेपाल को भौगोलिक सीमा की दृष्टिकोण से तीन भागों में बाँटा जाता है—हिमाल, पहाड़ और तराई । किन्तु अगर नारी की बात करें तो कमोवेश नजारा और परिस्थिति एक सी है चाहे वह नारी पहाड़ की हो, हिमाल की हो या तराई की । आज भी समाज में कुरीतियों और परम्पराओं की मार नारी ही झेल रही हैं । शहर का दृश्य भले ही सुखद अनुभूति देता है किन्तु गाँव और पिछड़े इलाके में औरत आज भी शोषित, कुचली और मानसिक तथा शारीरिक हिंसा का शिकार हैं ।

नारी को हम सम्पूर्णता में नहीं देख पाते हैं

दहेज प्रथा का कोढ़ दिन प्रतिदिन विकराल रूप लेता जा रहा है । डायन कह कर आज भी महिलाओं को प्रताडि़त किया जा रहा है । बहुविवाह आज भी अपने अस्तित्त्व में है । गरीबी और अशिक्षा के बोझ तले वो साँसें ले रही हैं । खुलेआम उनका व्यापार किया जा रहा है । विदेशों की ओर पलायन होती महिलाएँ अपना सब कुछ लुटाकर आती हैं और उसके बाद या तो वो मानसिक रूप से बीमार होती हैं या आत्महत्या करने को विवश ।

बलात्कार और शारीरिक शोषण की शिकार वो आज भी हो रही हैं और सम्भवतः पहले की अपेक्षा अधिक हो रही हैं । देश में कानून है पर उसकी उपादेयता कितनी है ? ना तो कानून तक आम लोगों की पहुँच है और ना ही वो जाना चाहते हैं क्योंकि यह प्रक्रिया इतनी लम्बी और कष्टदायक होती है कि वहाँ तक महिलाएँ जाना ही नहीं चाहती । और अगर चली भी गईं तो एक कष्टदायक प्रक्रिया से गुजरने के बाद भी उसे न्याय मिल जाएगा यह कहना कठिन है ।

देश में हर बात के लिए बने कानून की तरह कुछ कानून महिलाओं के लिए भी बने हैं । महिलाओं के हक अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कानून की व्यवस्था की गई है । पर क्या सिर्फ नियम बना देने से समस्या का समाधान हो जाता है त होना ना पड़े इस हेतु सम्पत्ति में भी ठद्द नारीः विगत से वर्तमान समान हक दिया गया है । महिलाओं के ऊपर होने वाले घर ेलु हिंसा को र ोकने के लिए एक अलग कानून बनाया गया है । विडम्बना÷कार्यान्वयन पक्ष सदैव कमजोर साबित हुआ । महिला के ऊपर होने वाले किसी भी तर ह के भेदभाव को र ोकने के लिए संयुक्त र ाष्ट्रसंघीय महासन्धि (सिडा) में भी नेपाल ने अपना हस्ताक्षर किया है । महिलाओं के ऊपर होने वाली हिंसा को उखाड़ फेकने के लिए बेइजिंग घोषणपत्र में भी सम्बोधन किया गया है ।

हम कानुन में संशोधन कर ते गए, लेकिन अपनी सोच में संशोधन की आवश्यकता पर कभी मनन नहीं किया । कानून तभी साथ देगा जब समाज साथ दे । परन्तु ऐसा नहीं होता । अपर ाधी की गिर फ्तारी के लिए जितने कानून बनते हैं उसकी रि हाई के भी उतने ही हथकंडे होते है । एक तो महिलाएँ जल्दी कानून के गलियारे जाना नहीं चाहती और अगर चली भी जाती है तो न्याय के लिए उसे इतनी मानसिक पीड़ा से गुजर नी पड़ती है कि वह एक जिंदा लाश बन जाती है । बात नेपाल के सन्दर्भ में हो या विश्व के किसी भी कोने की नारी किसी ना किसी तर ह कमोवेश शोषण का शिकार होती हैं । नारी से जुड़े ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिससे समाज का एक पक्ष निर न्तर जूझ र हा है । बहस होती हैं । रैलियाँ निकाली जाती हैं । पर नतीजा शून्य होता है । सच तो यह है कि हमारी परम्परागत सोच ने नारी को दो हिस्सों में बाँट दिया गया है । एक जिसे हम देवी मानते हैं और सर्वत्र उसकी पूजा कर ते हैं और दूसरी वो जो सिर्फ एक शरीर के रूप में सामने होता है । एक बार जुथुस्त्र ने एक बुढि़या से पूछा, बताओ स्त्री के बार ेमें सच्चाई क्या है ?

दहेज बलात्कार, शोषण और सभी सामाजिक कुरीतियों को रोक पाना दक्षिण एशियाली मुल्कों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रही है । नेपाल में महिलाओं की अनुमानित संख्या ६७,६७,३२३ है । कुल जनसंख्या का ५० प्रतिशत से अधिक । परन्तु शिक्षा दर देखा जाय तो ग्राफ बहुत नीचे पाया जाता है । असुरक्षा और भेदभाव का ग्राफ कुछ ज्यादा ही ऊपर है । देश के किसी भी कोने पर दृष्टि डाली जाय तो कहीं भी स्थिति अच्छी नजर नहीं आती । लड़कियाँ कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं आए दिन समाचार पत्र में ऐसी घटनाएँ छपती रहती हैं जो दिलों को हिलाकर रख देती है । न तो छ वर्षीया बच्ची सुरक्षित है और ना ही साठ वर्षीया महिला । कानून है पर उसकी पूरी प्रक्रिया इतनी लम्बी और शंकास्पद है कि उस पर यकीन नहीं किया जा सकता । पीडि़ता मंत्रालय में गुहार लगा ले या समाज में परन्तु न्याय की संभावना क्षीण ही होती है ।

महिला हिंसा तथा भेदभाव रोकने के लिए राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कानून अवश्य बनाए गए हैं । परन्तु कार्यान्वयन पक्ष कमजोर होने के कारण यह भेदभाव रुकने का नाम नहीं ले रहा है । खास कर के नेपाल में महिलाओं के ऊपर होते आ रहे सभी प्रकार के लैंगिक भेदभाव को अन्त करने के लिए मुलुकी ऐन में भी बहुत सारे संशोधन किए गए हैं ।

महिलाओं को किसी पर आश्रित होना ना पड़े इस हेतु सम्पत्ति में भी समान हक दिया गया है । महिलाओं के ऊपर होने वाले घरेलु हिंसा को रोकने के लिए एक अलग कानून बनाया गया है । विडम्बना÷कार्यान्वयन पक्ष सदैव कमजोर साबित हुआ । महिला के ऊपर होने वाले किसी भी तरह के भेदभाव को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघीय महासंधि (सिडा) में भी नेपाल ने अपना हस्ताक्षर किया है । महिलाओं के ऊपर होने वाली हिंसा को उखाड़ फेकने के लिए बेइजिंग घोषणपत्र में भी सम्बोधन किया गया है । हम कानून में संशोधन करते गए, लेकिन अपनी सोच में संशोधन की आवश्यकता पर कभी मनन नहीं किया । कानून तभी साथ देगा जब समाज साथ दे । परन्तु ऐसा नहीं होता । अपराधी की गिरफ्तारी के लिए जितने कानून बनते हैं उसकी रिहाई के भी उतने ही हथकंडे होते हैं । एक तो महिलाएँ जल्दी कानून के गलियारे जाना नहीं चाहती और अगर चली भी जाती है तो न्याय के लिए उसे इतनी मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है कि वह एक जिंदा लाश बन जाती है । बात नेपाल के सन्दर्भ में हो या विश्व के किसी भी कोने की नारी, शोषण का शिकार होती हैं ।

नारी से जुड़े ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिससे समाज का एक पक्ष निरन्तर जूझ रहा है । बहस होती हैं । रैलियाँ निकाली जाती हैं । पर नतीजा शून्य होता है । सच तो यह है कि हमारी परम्परागत सोच ने नारी को दो हिस्सों में बाँट दिया है । एक जिसे हम देवी मानते हैं और सर्वत्र उसकी पूजा करते हैं और दूसरी वो जो सिर्फ एक शरीर के रूप में सामने होती है । एक बार जुथुस्त्र ने एक बुढि़या से पूछा, “बताओ स्त्री के बारे में सच्चाई क्या है ? तो उसने कहा, बहुत सी सच्चाई ऐसी है जिनके बारे में चुप रहना ही बेहतर है । हाँ अगर तुम औरत के पास जा रहे हो तो अपना कोड़ा साथ ले जाना मत भूलना ।” तात्पर्य यह है कि पुरुष सोच हमेशा यही रही है कि यह पक्ष उसके द्वारा ही संचालित हो । जब ऐसा नहीं होता तो उसका अहंकार चोट खाता है और उसका दुष्परिणाम हम हर रोज अपने आस–पास देखते हैं । जहाँ एक पक्ष रोशन है वहीं दूसरा पक्ष रोशनी की खोज में हैं ।

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नारी की नई सहस्त्राब्दी में सर्वदा एक नई छवि उभर रही है । महिलाएँं, पिछली सदियों मे जिन बेडि़यों से जकड़ी थीं, उसे तोड़कर आज वह अपनी नई पहचान बनाने में जुटी है । लेकिन देखा जाय तो, आज भी नारी अस्तित्त्व के असंख्य प्रश्न, महिला आन्दोलनों और जागरुकता के बाद भी उतने ही गंभीर और चिन्ताजनक हंै जितने सदियों पहले थे । उन प्रश्नों के चेहरे बदल गए हैं, परिधान बदल गये हैं लेकिन प्रश्नों का मूल स्वरूप आज भी यथावत है । आखिर कहाँ से आएगा नारी से सम्बन्धित समस्याओं का समुचित समाधान ? न बलात्कार कम हुए हंै, न अत्याचार, न हत्याएँ बन्द हुई है न हिंसा ।

अपहरण हो या आत्महत्या, आँकड़े लगातार बढ़ रहे हैं । और प्रशासनिक शिथिलता अपनी बेबसी पर खड़ी हँस रही है । कभी–कभी लगता है, महिलाओं के प्रति बढ़ती विकृतियों का कारण पुरुष से कही अधिक वह सामाजिक सोच है जो जन्म से लेकर मृत्यु तक स्त्री पुरुष को अलग–अलग नियमों में जकड़ देती है । पुरुष कभी देख सुन ही नही पाता कि स्त्री के भीतर कितना और कैसा दर्द रिसता है । भावनात्मक वेदना तो दूर की बात है मानवता के नाते भी स्त्री के प्रति जो गहरी संवेदनशीलता पुरुष मन में उपजनी चाहिए वह नही उपज पाती । मुस्लिम संस्कृति में तो महिलाओं का जीवन और भी नारकीय है । बहुविवाह और तलाक ये दो पक्ष ऐसे हैं जिन्हें धर्म और शरियत के नाम पर औरतों पर लादा जाता है और वो उसके बोझ तले दबी रहती हैं । आज भी महिलाओं का दुनिया में सबसे ज्यादा शोषण मुस्लिम देशों मे ही होता है जहाँ पर्दा और बुरके के अन्दर महिलाओं को बाँधकर रखा जाता है । प्यार करने का उन्हें हक नहीं है और तो और उनके सन्दर्भ में कोई संस्था आगे भी नहीं आती क्योंकि उन्हें भी फतवा से डर लगता है अपनी कट्टरता के लिए जाना जाने वाला यह धर्म, धर्म के कथित ठेकेदारों के द्वारा इतना कठोर बना दिया गया है कि धर्म का मूल अर्थ ही कहीं खो गया है । यह तो जाहिर है कि नारी कहीं की भी हो दर्द उसका एक ही है । विश्व का कोई कोना हो उसकी पीड़ा एक है, आज भी नारी जनंनागों का विभत्सतापूर्वक खतना किया जा रहा है और विश्व चुप है क्योंकि यह धर्म के नाम पर किया जा रहा है और धर्म वह संवेदनशील मुद्दा है जिस पर हर समुदाय प्रायः चुप ही रहना चाहता है । काश ईश्वर खुद आकर कह पाते कि बन्द करो मेरे नाम पर अपनी मर्जी को चलाना । महिलाओं के ही सन्दर्भ मे राष्ट्र निर्माता स्वामी विवेकानन्द ने वर्षों पहले कहा था – “किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सर्वोत्तम थर्मामीटर है वहाँ की महिलाओं की स्थिति । हमें नारियों को ऐसी स्थिति मे पहुँचा देना चाहिए, जहाँ वे अपनी समस्याओं को अपने ढंग से स्वयं सुलझा सके । हमें नारी शक्ति का उद्धारक नही, वरन् उनका सेवक और सहायक बनना चाहिए ।”

सेवक मत बनो, सहायक बन जाओ तो शायद वही काफी होगा । एक ही ईश्वर की बनाई हुई संरचना है नर और नारी किन्तु एक सबल हो गया और दूसरा निर्बल । हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक राजेन्द्र यादव ने अपने एक आलेख ‘आदमी की निगाह में औरत’ में बड़े ही बेवाक तरीके से औरत को आँका है मर्द की निगाह से– “सच तो यह है कि हमारे सारे परम्परागत सोच में नारी को दो हिस्सों में बाँट दिया गया है । कमर से ऊपर की नारी और कमर से नीचे की औरत । हम पुरुष को उसकी सम्पूर्णता में देखते हैं, उसकी कमियों और कमजोरियों के साथ उसका मूल्यांकन करते हैं ।

नारी को हम सम्पूर्णता में नहीं देख पाते हैं । कमर से ऊपर की नारी महिमामयी है, करुणाभरी है, सुन्दरता और शील की देवी है—वह कविता है, संगीत है, अध्यात्म है और अमूत्र्त है । कमर से नीचे वह काम कंदरा है, कुत्सित और अश्लील है, ध्वंसकारिणी है, राक्षसी है और सब मिलाकर नरक है ।इसी बँटे और दुहरे रवैए से हम उसके शरीर की ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर की यात्राएँ करते हैं । उसके मातृत्व की शारीरिकता को नहीं, वात्सल्य की भावना को गरिमा देते हैं……….. देह, स्त्री की एकमात्र पहचान के रूप में उसका गुण भी है और गाली भी ।

जब तक वह पुरुष की इच्छा और वासना के नियंत्रण में है, वह सौंदर्य है, उद्दीपन है और ऐसा अवयव समूह है जो वांछनीय है, अगर उससे निरपेक्ष और उसके नियंत्रण से बाहर है तो भत्र्सनीय और दण्डनीय है । हमारी भाषा की सारी अश्लील गालियाँ या तो पुरुष की असमर्थता, अक्षमता की घोषणाएँ हैं या फिर काम दिवानी स्त्री के द्वारा अपने शरीर के दुरुपयोग की सामाजिक भत्र्सनाएँ, या वासना के आवेश में नैतिक मर्यादाओं के उल्ल्घंनों पर लांछन ।……पुरुष औरत को सिर्फ शरीर या उसके कुछ अंगों को ही उसके सम्पूर्ण पहचान के रूप में देखने की जिद में रहना चाहता है, लेकिन जब औरत स्वयं अपने को इस रूप में देखने या मानने लगती है तो बौखला उठता है…स्त्री शरीर रहे, लेकिन उससे अधिक मानना उसकी उच्छृंखलता और अमर्यादा ।” यह है वह मानसिकता जो किसी ना किसी रूप में मर्द समाज में व्याप्त है ।

यह और बात है कि कभी तो यह शिक्षित और सभ्यता के पर्दे में छुपा होता है और कभी अमर्यादित रूप में हमारे सामने आ जाता है । बहुत मुश्किल होता है मन को यह समझाना कि औरत सिर्फ शरीर नहीं एक चेतनशील प्राणी है । इसी सन्दर्भ में अरविन्द जैन की पुस्तक “औरत होने की सजा” के कुछ अंश द्रष्टव्य है— “मैं आदमी हूँ यानी पुरुष, मर्द, स्वामी, देवता, मंत्री, संतरी, सामंत, राजा, मठाधीश और न्यायाधीश—सब कुछ मैं हूँ और मेरे लिए ही सब कुछ है या सब कुछ मैंने अपने सुख सुविधा, भोग विलास और ऐयाशी के लिए बनाया है । सारे धर्मों के धर्मग्रंथ मैंने ही रचे हैं । धर्म, अर्थ, समाज, न्याय और राजनीति के सारे कायदे कानून मैंने बनाए हैं और मैं ही समय–समय पर उन्हें परिभाषित और परिवर्तित करता हूँ.. तुम औरत हो यानि मेरी पत्नी, वेश्या और दासी — जो कुछ भी हो, मेरी हो और मेरे सुख, आनंद, भोग और ऐश्वर्य के लिए सदा समर्पित रहना ही तुम्हारा परम धर्म और कत्र्तव्य है । मेरे हुक्म के अनुसार चलती रहोगी, सम्पूर्ण रूप से समर्पित होकर वफादारी के साथ मेरी सेवा करोगी तो सीता, सावित्री और महारानी कहलाओगी, सुख, सुविधाएँ, कपड़े, गहने, धन, एश्वर्य, मान, सम्मान और प्रतिष्ठा पाओगी । मगर मुझसे अलग मेरे विरुद्ध आँख उठाने की कोशिश भी करोगी तो कीड़े मकोड़ों की तरह कुचल दी जाओगी ।” कमोवेश आधुनिकता कहलाए जाने वाले समाज की अवधारणा कुछ ऐसी ही है । कोई पुरुष अगर खुद को उस मर्दवादी मानसिकता से निकालना भी चाहे तो यही समाज उसे नपुसंक, जोरु का गुलाम आदि सम्बोधन देगा ।

आज के आधुनिक समाज में नारी सन्दर्भ में अगर सबसे अधिक पीड़ादायक कुछ है तो वह है दहेज और शारीरिक शोषण की समस्या । दहेज की वजह से भ्रुण हत्या जैसा घृणित काम हो रहा है । वैवाहिक अनुष्ठान को सम्पन्न करने के लिए अभिभावकों को जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है उसके जैसा विवाह जैसा मंगल कार्य भी भार स्वरूप हो गया है । इसकी वजह से वैवाहिक सम्बन्ध जटिल और कटुतापूर्ण हो गए हैं । मध्यमवर्गीय परिवार तो और भी इस मार से पीडि़त है । उच्चवर्ग तो स्वभावतः साधन सम्पन्न होता है । विवाह सम्बन्धी लेन–देन उसे उतना नहीं अखरता, वो तो स्वयं अधिक खर्च करते हैं । निम्नवर्ग के वैवाहिक कार्यक्रम अधिक सरल रीति से सम्पन्न होते हैं और उनमें दहेज की विकरालता औरों की अपेक्षा कम होते हैं । वैसे आजकल तो उनमें भी यह रोग विस्तारित होता जा रहा है । समाज में एक और जो नारी के लिए अभिशापित पक्ष है वह है वेश्यावृत्ति । आर्थिक विपन्नता और पराधीनता के कारण स्त्रियों का वेश्या होना मानवता का एक ऐसा अभिशाप है जिसके विषय में जो भी कहा जाय वह कम है । वेश्या की स्थिति तो गुलाम से भी बुरी है । गुलामी का वह रूप उसे मिलता है कि वह उस नरक से कभी मुक्त ही नहीं हो पाती है ।

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गुलाम बनने के पीछे जो मुख्य बात होती है वो है आर्थिक विपन्नता किन्तु वेश्यावृत्ति के मूल में आर्थिक विपन्नता तो होती ही है किन्तु उसका नैतिक पतन भी हो जाता है । आर्थिक पराधीनता का एक दुष्परिणाम यह भी होता है कि यह नारियों को मनोवैज्ञानिक रूप से हताश और निराश कर देता है । समाज में आज नर और नारी टकराव की स्थिति में खड़े हैं । यह एक अजीब सी बात है । यह स्थापित सत्य है कि सृष्टि के ये दोनों अंग एक दूसरे के बिना अधूरे हैं । अगर पुरुष स्त्री को अपना बल देकर शक्तिशाली बनाता है तो स्त्री भी अपना बल देकर उसे शक्तिशाली बनाती है । दोनों एक दूसरे के पूरक हैं किन्तु इस पूरकता के महत्तव को समझ नहीं रहे हैं । इन सभी परिस्थितियों के बीच जिस दिन नारी अपने आपको स्थापित कर लेगी, उसी दिन वह समर्थ हो जाएगी । इसके लिए सबसे अधिक अगर किसी बात की आवश्यकता है, तो वह यह है कि नारी को ही नारी को समझना होगा । ‘नारी ही नारी की दुश्मन है’ इस मान्यता को खंडित करना होगा और हर घर की नारी को शिक्षा को अपनी शक्ति और सम्बल बनाना होगा । यही वो शक्ति है जो उसे समाज में स्थापित करने में सहायक सिद्ध होगा । बेटी के साथ बेटों को भी यह शिक्षा देनी होगी कि तुम्हारी माँ, तुम्हारी बहन, बेटी और पत्नी भी तुम्हारी तरह ही इंसान है । वह किसी भी हाल में तुमसे कम नहीं है । अगर वह तुम्हारा सम्मान करती है तो वह भी तुमसे सम्मान पाने की अधिकारिणी है । यह सोच जिस दिन हर पुरुष अपने मस्तिष्क में बिठा लेगा उस दिन अवश्य इस समाज की परम्परागत संरचना में बदलाव होगा । नारी को यदि समाज राहत देना चाहता है तो उसके लिए स्त्री सुलभ कार्य देकर देकर उसकी निपुणता का लाभ उठाए ना कि उसे उसकी शारीरिक संरचना के आधार पर शोषण का सामान बनाए ।

सशक्तिकरण के बिगड़ते अर्थ

आज नारी स्वतंत्रता के नाम पर जो अभियान चल रहे हैं वो हमारे समाज और परिवार की नींव कमजोर करने पर लगे हुए हैं । पौर्वात्य पर पाश्चात्य संस्कृति ने कुछ ऐसा हमला किया है कि हमारे जीवन सम्बन्धी मूल्य खण्डित हो रहे हैं । हमारी सभ्यता की आधार शिला संस्कृति एवं सदाचार पर निर्भर रही है । किन्तु आज यह कहीं विलीन होती जा रही है । पाश्चात्य के प्रकाश में प्राप्त प्रगति के नाम पर समाज पतन की जिस राह पर बढ़ रहा है वह हमारी संस्कृति को खत्म करने में सहायक सिद्ध हो रहा है । पश्चिम ने सदाचार की संयम सीमा को महत्तव ना देकर जिस सभ्यता को पोषित किया है, वह हमारे समाज को आगे नहीं बढ़ा रहा है, बल्कि पश्चिम के इसी संस्कार के अनुकरण ने समाज में अशान्ति को जन्म दिया है । हमें यह समझना होगा कि प्राकृतिक रूप से नर और नारी की संरचना में अन्तर है और इसी के आधार पर इनका कार्य विभाजन तय हुआ है ।

आज यह तय करने की आवश्यकता है कि इस विभाजन का मापदण्ड क्या होना चाहिए । परम्परागत रूप में यह मान्यता स्थापित हैं कि स्त्री की प्राथमिकता घर है और पुरुष की प्राथमिकता कमाई । क्योंकि पुरुष कमाता है और स्त्री घर संचालित करती है । यह अवधारणा आज भी ज्यों की त्यों है किन्तु सामाजिक स्वरूप में बदलाव आया है । स्त्री अब सिर्फ घर की चहारदीवारी में कैद नहीं है उसे यह स्वतंत्रता मिली है कि वह घर से बाहर निकल कर अपनी इच्छानुसार अपने कार्यक्षेत्र का चुनाव कर सकती है । परन्तु देखा जाय तो इस स्वतंत्रता ने नारी को और भी विकट परिस्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है । घर उसे देखना ही है और अगर वह घर से बाहर निकलती है तो बाहर की जिम्मेदारी भी उसे पूरी करनी होगी क्योंकि यह उसका दायित्व है । इस तरह उसके ऊपर जिम्मेदारियों का दोहरा दवाब होता है । उदाहरणतः एक बच्चे के लिए जो माँ का दायित्व है वह माँ ही कर सकती है पिता नहीं ।

बच्चे को भूख लगी है तो स्तनपान की जिम्मेदारी माँ की होती है । माँ ही यह समझती है कि बच्चे को कब किस चीज की जरुरत है उसे क्या चाहिए । माँ बच्चों की मानसिकता से जुड़ी होती है इसलिए यह काम वही कर सकती है । इस बात को स्त्री को समझना होगा कि यहाँ उसकी प्राथमिकता बच्चा है ना कि नौकरी । आज इस भावना की कमी स्पष्ट रूप में दिख रही है । अधिकार और सशक्तिकरण के नाम पर घर में ही तनाव का माहौल बना हुआ है । घर बिखर रहे हैं, टूट रहे हैं । जिस धैर्य और संयम की परिभाषा नारी के लिए दी जाती थी वह आज कम हो रहा है । नई पीढ़ी समझौता करने के लिए तैयार नहीं है । हमारी संस्कृति और परम्पराएँ खण्डित हो रही हैं क्योंकि पाश्चात्य का असर कुछ इतनी गहराई से हमारे समाज पर हावी हो रहा है कि आज यहाँ भी महिलाएँ विदेशों की तरह स्वतन्त्रता के नाम पर सिर्फ महिलाएँ बन कर रह गई हैं । उन्हें किसी नाते रिश्ते की परवाह नहीं होती है । आज परि स्थिति यह है कि महिलाएँ नारी सशक्तिकरण के नाम पर अपने प्राकृतिक स्वभाव को भूल रही है । मंहगाई की विकरालता को देख कर आवश्यक है कि पति–पत्नी दोनों रोजगार करे और अपनी गृहस्थी चलाए । पर यहाँ जो दायित्व गृहिणी का है उसे वह नकार नहीं सकती । घर का कार्य करना या उसे सम्भालना उसका शोषण नहीं है । बल्कि वह अपनी गृहस्थी की आधार है, यह सोच नारी को अपने अन्दर विकसित करनी चाहिए ।

पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से हम परिवार नाम की संस्था का विघटन कर रहे हैं, यह सोचना आवश्यक है । घर का ऐसा माहौल तैयार करें कि आपके साथ का व्यक्ति आपको सहयोग करे और आपको आगे बढ़ाने में योगदान दे । किन्तु यह सिर्फ औरत की जिम्मेदारी तो कदापि नहीं हो सकती । उसे परिवार का और सबसे अधिक पति के साथ की आवश्यकता होती है और यही उसके साथ नहीं होता है । औरत आगे बढ़ती है तो बाहर के लोग सराहना करते हैं, पर वह अपने ही घर में उपेक्षित होती है । एक वक्त होता है जब स्वयं पति चाहता है कि पत्नी घर से निकले और काम करे किन्तु जब वही पत्नी घर से निकलती है, काम करने लगती है और कामयाबी को प्राप्त करने लगती है तो कभी पति का पुरुषत्व, कभी अहं तो कभी शक सामने आ जाता है और इसकी वजह से परिवार में कलह होता है और तनाव इतना बढ़ता है कि घर टूटने की स्थिति बन जाती है । ऐसा ना हो इसके लिए पति को भी अब परमेश्वर की दुनिया से निकलकर यह मानना चाहिए कि वह अपनी पत्नी का परमेश्वर नहीं बल्कि साथी है और उसका सहयोगी है । नर और नारी दोनों महत्तवपूर्ण हैं, दोनों के कार्य महत्तवपूर्ण हैं, इसलिए यहाँ यह सवाल नहीं उठना चाहिए कि, किसका काम अधिक है और किसका कम । अपनी–अपनी क्षमता के हिसाब से दोनों काम करते हैं और दोनों ही एक अहम् भूमिका का निर्वाह करते हैं । जिस पर समाज और परिवार टिके हुए हैं । समाज के ऊपर भी यह जिम्मेदारी है कि वह समाज और परिवेश की बदलती परिस्थितियों को समझे और उसके अनुसार ही आज की नारी को अवसर प्रदान करे ।

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स्त्री पुरुष को एक दूसरे के लिए चुनौती नहीं बल्कि शक्ति बनने की आवश्यकता है । आज भी पुरुष का अहं आगे आ जाता है जब वो ये देखता है कि उसकी पत्नी आगे बढ़ रही है । जबकि औरत की मानसिकता इससे बिल्कुल अलग होती है । जब किसी औरत का पति कामयाब होता है तो सबसे अधिक खुशी उसे ही होती है किन्तु सामान्यतया यह मानसिकता मर्दों की नहीं होती । आज का वक्त दोनों को अपनी–अपनी क्षमता को पहचानने की है और उसे एक दूसरे का आलम्बन बन कर बढ़ाने की है । आज की महिलाएँ शिक्षित हो रही हैं और अब वह घर के दायरे में मात्र सिमट कर नहीं रह सकती है । वह अपना विकास चाहती है और अपने साथ अपने परिवार को देखना चाहती है । तनाव यहीं से शुरु हो जाता है । अगर उसकी सोच को उसके परिवार का साथ मिले तो निःसन्देह वह एक नई उर्जा के साथ आगे बढ़ेगी । परिवार का सहयोग नहीं मिलता है तो भी वह घर से बाहर तो निकलेगी ही लेकिन इससे वह भी तनावग्रस्त रहेगी और उसका परिवार भी । इसलिए सोच को एक नई दिशा देनी होगी ताकि हर पक्ष संतुष्ट रहे । ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं है बस अपने अन्दर से सदियों से चली आ रही मानसिकता को थोड़ा वक्त के अनुसार परिमार्जित कर ना होगा । यह आज की आवश्यकता भी है और बदलते समय की माँग भी । पौर्वात्य संस्कृति में परिवार की अवधारणा बहुत मजबूत है और स्त्रियों से यह अपेक्षा की जाती रही है कि, वह अपने परिवार को विखण्डित होने से बचाए । यह अपेक्षा आज भी है किन्तु वक्त बदल गया है । अगर गृहस्थी दोनों से चलती है तो इसे बचाने की जिम्मेदारी भी दोनों की है क्योंकि नर और नारी दोनों ही परिवार , समाज और देश की आधारशिला है ।

 

इस सच को नकारा नहीं जा सकता । थोड़ी सी उदार मानसिकता स्थिति को परिर्विर्तत कर सकता है । आज न तो पति परमेश्वर का रूप ले सकता है और ना ही आज की नारी हर बात पर अग्निपरीक्षा देने को तैयार है । आज की नारी कदम मिलाकर साथ चलने में यकीन रखती है । औरत को कमअक्ल या पैरों की जूती समझने का वक्त लद चुका है । अब औरत माँ, बहन, बेटी, पत्नी के अलावा इंसान के रूप में स्वयं को स्थापित करना चाहती है । स्त्री को जब तक भोग्या समझा जाएगा तब तक उसकी स्थिति में सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती है । उसे एक शरीर नहीं इंसान समझने की आवश्यकता है । अगर वो अपने सुकर्मों से आगे बढ़ती है, समाज में अपनी पहचान बनाती है तो उसे सराहना और प्रोत्साहन की आवश्यकता है ताने और लांछना की नहीं । अभी भी समाज में एक तबका ऐसा है जो कामकाजी महिला को अच्छा नहीं मानता । आज भी साथ काम करने वाले मर्दों की यह मानसिकता होती है कि बाहर निकलने वाली औरतों को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है । इस स्थिति से हर कामकाजी महिला गुजरती है । अपने सहकर्मी पुरुष मित्रों से अगर हँस कर बात कर ली जाय तो उसे लगता है कि यह तो अपनी सम्पत्ति हो गई । विवशता है कि बात करनी पड़ती है किन्तु एक मानसिक यंत्रणा का शिकार हर रोज महिला होती है । एक स्वस्थ दृष्टिकोण ही स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकता है ।

 

औरत के जितने भी रिश्ते मान्य हैं, उसे जितने भी रूप में देखा जाता है वह समाज के हर व्यक्ति से सम्बद्ध है । इसलिए उसका सम्मान करना उसे अवसर प्रदान करना और उत्साहित करना समाज का फर्ज बनता है । एक नई सोच, एक नए समाज की नींव और संरचना तैयार कर सकता है । जब घर की बहु–बेटियाँ बाहर होती हैं तो एक अन्जाना डर हर अभिभावक के दिल में व्याप्त होता है । वो चिंतित होते हैं कि वो घर सुरक्षित लौटेंगी या नहीं । यह डर, यह त्रास हटाना आवश्यक है और इसके लिए हमें अपने बेटों के अन्दर यह संस्कार भर ना होगा कि तुम जिसे छेड़ रहे हो, वो तुम्हारी बहन नहीं है किन्तु किसी की तो है और हो सकता है कि कहीं और कोई इसी तरह तुम्हारी बहन को छेड़ रहा होगा । जो यकीनन तुम्हें अच्छा नहीं लेगा । अगर यह सोच दिल में घर कर जाय तो शायद लड़कियों को देखने का उनका नजरिया बदल जाय । इसलिए बेटियों को घर से जितनी सीख दी जाती है उसी तरह बेटों को भी घर से ही सीख देने की आवश्यकता है । तभी सोच में परिवर्तन होगा और समाज में औरतों को मर्यादापूर्ण स्थान प्राप्त होगा । बेटे और बेटियों में विभेद का कोई कारण नजर नहीं आता । प्रकृति ने दोनों के जन्म में कोई अन्तर नहीं किया है, फिर हम और आप कैसे यह अन्तर कर जाते हैं ? अक्सर यह देखा जाता है कि माँ अपने बेटे को ज्यादा प्यार करती है, परन्तु क्या बेटे और बेटी के जन्म के समय उसकी प्रसव पीड़ा अलग थी ? नहीं न फिर परिवार में मिलने वाले प्यार और अधिकार में अन्तर क्यों ? इसलिए सोच में सुधार की आवश्यकता सबसे पहले परिवार से ही है । बेटे और बेटी में अन्तर खत्म करें । बेटे को यह बताएँ कि बेटी किसी भी हालत में तुमसे कम नहीं है ।

 

समाज की संरचना सदियों से ऐसी रही है कि औरत का कोई घर ही नहीं होता । माता पिता के घर में बचपन से यह सुनाया जाता है कि तुम पराया धन हो तुम्हारा घर यह नहीं है, तुम्हारे पति का घर तुम्हारा घर है । पर पति के यहाँ अगर किसी हालात में अनबन हो जाय तो वह आराम से कह देता है कि मेरे घर से निकल जाओ, ऐसे में एक औरत का घर कौन सा हुआ ? आज भी यह समस्या मध्यमवर्गीय परिवार में है । जहाँ आर्थिक रूप से कमजोर महिलाएँ जिन्दगी भर इसी कशमकश में जिन्दगी गुजार देती है कि उसका अपना क्या है । पिता, भाई, पति और बेटे से उसकी जिन्दगी जुड़ी होती है और इसी तरह गुजर भी जाती है । समाज में बेटे को महत्तव देने का एक कारण समझ में यह आता है कि, समाज की यह धारणा रही है कि पुत्र ही माता–पिता का सहारा होता है । पर अब तो यह अवधारणा भी खण्डित होती दिख रही है । अधिकांश वृद्ध अपनी जिन्दगी अलग और अकेले बिताने के लिए बाध्य हैं । इस भागती जिन्दगी में किसी को इतना अवकाश नहीं है कि वो दो पल अपने माता–पिता के साथ गुजार ले । कई घर तो ऐसे मिल जाएँगे जहाँ माता पिता वो पुराना सामान हो जाते हैं जिन्हें आधुनिकता से सम्पन्न घर में बेकार की चीज समझा जाता है और फिर उन्हें किसी वृद्धाश्रम में भेज दिया जाता है । ऐसे में पुत्रमोह का तो कोई औचित्य ही नहीं समझ में आता है । जबकि बेटियाँ अपने माता–पिता से कहीं अधिक जुड़ी होती हैं । इन सारी परिस्थितियों को सही करने और सुधारने की कोशिश हमें ही करनी है और अपने परिवार से ही इसकी शुरुआत करनी है । परिवार से समाज और समाज से देश तक इस पहल की आवश्यकता है । नारी की स्थिति को सुधारने के लिए नारी को ही अपनी सोच बदलनी होगी और आगे आना होगा । इस परिभाषा को बदलना होगा कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है । जिस दिन यह परिभाषा बदल जाएगी वह दिन निश्चय ही एक सुनहरा इतिहास लिखेगा ।

    डॉ श्वेता दीप्ति
    सम्पादक, हिमालिनी ।

 

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1 thought on “देवी नहीं, बस हमें इंसान रहने दो : डॉ. श्वेता दीप्ति”

  1. समाज में स्त्रियों की स्थिति को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करता सुंदर आलेख। स्त्रियों को लेकर समाज क्या सोच रखता है, उसकी मानसिकता के स्याह पक्ष को बेबाक रूप में चित्रित किया गया है इस आलेख में।
    हार्दिक शुभकामनाएं💐💐

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