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सृष्टि की अनमोल धरोहर नारी : मुकेश भटनागर

 

हिमालिनी मार्च २०२१ अंक,सम्पूर्ण कायनात बेमिसाल खजानों, नियामतो से परिपूर्ण है चाहे वह वनस्पति के रूप में हो, सागर की गहराईयों में हो, अंतरिक्ष की ऊंचाईयों में हो, धरती के गर्भ में हो अथवा जल चर, नभ चर, थल चर के रूप में हो । इस रहस्यमयी, विस्मित कर देने वाली दुनिया को मनुष्य ने अपनी खोजी प्रवृत्ति एवं चिन्तन से प्रकृति और वातावरण के ताने–बाने को समझा और प्राणी जगत पर उसके प्रभाव को देखा और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि समन्वित विकास एवं प्रगति के लिए, सभी घटक एक दूसरे के पूरक है जिसके लिए आपसी तालमेल की बहुत आवश्यकता है । मनुष्य की विचार शक्ति ने इस ताने–बाने को गहराई से समझा और रहस्यमई रहस्यों को उजागर किया । परन्तु सम्भवतः जिसे वह कभी भी सही ढंग से नहीं समझ पाया वह है स्त्री–पुरुष के ताने–बाने को । कोई भी फल–फूल स्वादिष्ट सुगन्धित, सुन्दर हो सकता है, कोई भी पक्षी या जानवर मनोहारी अथवा शक्तिशाली हो सकता है परन्तु रचयिता ने जो गुण और विलक्षणता नारी को प्रदान की हैं वह अद्वितीय है । नारी स्वयं में प्रकृति का स्वरूप है बल्कि यह कहना अधिक श्रेयस्कर होगा कि वह प्रकृति ही है इसलिए भी की वह जननी है ।
इस प्राणी जगत में सभी का अपना–अपना योगदान है इसलिए प्रकृति में संतुलन बना रहता है । परन्तु हमने अपना समाजिक ढांचा पुरुष प्रधान बना लिया और देखा जाए तो एक प्रकार से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, उद्यमिक, कृषक आदि सभी क्षेत्रों को पुरूष की नजर से देखा गया, दिखाया गया, समझाया गया और समझा गया । चाहे वह त्रेता युग का रामायण काल रहा हो या द्वापर युग का महाभारत काल । कलयुग की तो बात ही अनोखी है । स्त्री को सदैव सहिष्णुता, सहनशीलता, सौम्यता, सुन्दरता की प्रतिमूर्ति समझा जाता रहा ।
इस अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर एक नजÞर महिलाओं के उत्कर्ष पर डालते है । आज महिला सशक्तिकरण की बात की जाती है और महिला समानता, सुरक्षा, अधिकार व महिला कल्याण पर अधिनियम, कानून भी बन गए फिर भी कहीं न कहीं व्यवहारिक दृष्टि से उसको वांछित आदर मान सम्मान से नहीं देखा जाता । गुरु नानक ने कहा है ः

“सो क्यों मंदा आखिए, जित जम्मे राजन !”
अर्थात उस स्त्री को क्यो कम आंके जिन्होंने राजाओं को जन्म दिया ।

चाहे भारत हो या विश्व का कोई भी देश, महिलाओं के वजूद से ही विश्व को महान वैज्ञानिक मिले, आविष्कारक मिले, समाज सेवी वा समाज सुधारक, इन्सानियत के मसिहा, पथ प्रदर्शक, राजा, महाराजा व विलक्षण नेता मिलें । वह सभी अपनी छाप छोड़ गये और सदैव याद किए जाते हैं । थोमस एल्वा एडिशन जिसने बिजली के बल्ब का आविष्कार किया, उसमें उसकी मां का अभूतपूर्व योगदान रहा । प्राइमरी कक्षा में ही स्कूल से निकाल देने पर उसकी मां ने उसको शिक्षा दीक्षा दी और परिणाम जग जाहिर है । समझने की बात यह है कि चाहे पुरुष का वर्चस्व रहा हो या महिला का, महिला ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अग्रणी रही ।

इस लेख में मैं कुछ ऐसी ही महान महिलाओं के योगदान का जिÞक्र करना चाहूँगा जो संसार में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गईं । मैरी क्यूरी और फ्लोरेंस नाइटिंगेल को कौन नहीं जानता, एन्जेला मर्केल, जर्मनी की चांसलर बनी, जÞुजÞाना कैपुत्वा, स्लोवाकिया की पहली महिला राष्ट्रपति बनी, बिद्या देवी भण्डारी नेपाल की पहली राष्ट्रपति बनी, हाल ही में भारतीय मूल की कमला हैरिस अमेरिका की उपराष्ट्रपति चुनी गई, मैलिन्दा गेट्स, मिशैल ओबामा ने अपनी अपनी शख्सियत के आधार पर नाम कमाया ।

भारत के संदर्भ में बात करें तो सबसे पहले १९वीं शताब्दी की सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले का नाम याद आता है जो स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल एवं विधवा–विवाह जैसी कुरीतियों पर आवाज उठाने वाली देश की पहली महिला शिक्षिका व सुधारक बनी । सावित्री बाई फुले अपने पति समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा राव फुले से पढ़कर सामाजिक चेतना फैलाने में कामयाब हुई । उन्होंने अंधविश्वास और रूढि़यों की बेडि़यां तोड़ने के लिए लंबा संघर्ष किया । छुआ–छूत, सतीप्रथा, बाल और विधवा विवाह निषेध के खिलाफ पति के साथ काम किया खुद पढ़ीं और ज्योतिबा राव फुले के साथ मिलकर ९ बालिकाओं से शुरुआत करते हुए देश में सबसे पहला बालिका विद्यालय खोला, नारी शिक्षा की अग्रणी बनीं । सावित्रीबाई ने लड़कियों के लिए तब स्कूल खोले जब बालिकाओं को पढ़ाना–लिखाना सही नहीं माना जाता था ।

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सावित्रीबाई का जन्म ३ जनवरी १८३१ में महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित नायगांव नामक छोटे से गांव में हुआ था । महज ९ साल की छोटी उम्र में पूना के रहने वाले ज्योतिबा फुले के साथ उनकी शादी हो गई । विवाह के समय सावित्री बाई फुले पूरी तरह अनपढ़ थीं, उनके पति तीसरी कक्षा तक पढ़े थे । जिस दौर में वो पढ़ने का सपना देख रही थीं, तब दलितों के साथ बहुत भेदभाव होता था । उस वक्त की एक घटना के अनुसार एक दिन सावित्री अंग्रेजी की किसी किताब के पन्ने पलट रही थीं, तभी उनके पिताजी ने देख लिया । वो दौड़कर आए और किताब हाथ से छीनकर घर से बाहर फेंक दी । इसके पीछे उन्होंने यह वजह बताई कि शिक्षा का हकÞ केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही है, दलित और महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करना पाप है । फैकी हुई किताब वो वापस ले आई और प्रण कर बैठीं कि कुछ भी हो जाए वो एक न एक दिन पढ़ना जरूर सीखेंगी । १८४८ में महाराष्ट्र के पुणे में देश का सबसे पहले बालिका स्कूल की स्थापना की । एक महिला के लिए उस दौर में विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना आज सोची भी नहीं जा सकती । लड़कियों क शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी ।

सावित्रीबाई ने एक वर्ष के भीतर ही पुणा में अठारह स्कूल खोले । ये वो दौर था जब वे स्कूल जाती, तो लोग पत्थर मारते । पर अपने निश्चय पर अडिग रही और पढ़ लिखकर देश की प्रथम महिला शिक्षिका के रूप में प्रख्यात हुई ।

सावित्रीबाई की ही तरह पाकिस्तान की १४ वर्षीय युसूफजई मलाला ने बालिकाओं की शिक्षा के लिए अपनी जान की भी परवाह नहीं करी और नोबेल शांति पुरस्कार की दावेदार बनी और भारत के कैलाश सत्यार्थी के साथ संयुक्त रूप नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया । मलाला इस प्रकार विश्व की सबसे कम उम्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाली महिला बनी । सावित्रीबाई और युसुफजई की तरह असंख्य महिलाओं ने हर क्षेत्र में और हर दौर में अग्रिम भूमिका निभाई ।

जीजाबाई शाहजी भोंसले (१५९८–१६७४) छत्रपति महाराज शिवाजी की मां थी उन्हीं की शिक्षा व प्रेरणा से आगे चलकर शिवाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य की स्थापना करी । अहिल्याबाई होलकर (१७२५–१७९५) कुशल शासक, योद्धा व माल्वा की बागडोर ३० वर्षों तक संभाली । इन्दौर, मध्यप्रदेश में उन्हीं के नाम पर एयरपोर्ट और विश्वविद्यालय का नाम रखा गया है । जोधाबाई ने अपने अनपढ़ पति शहंशाह अकबर को तालीम दी और नीति कुशल बनाया । अवध की बेगम हजÞरत महल (१८२०–१८७९) और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८२८–१८५८) ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई । चन्द्रमुखी बासु (१८६०–१९४४) भारत की प्रथम महिला स्नातक मानी जाती है । अन्ना चांदी (१९०५–१९९६) देश की सर्वप्रथम हाईकोर्ट जज (१९५९) नियुक्त की गई, वहीं कोरनेलिया सोराबजी (१८६६–१९५४) प्रथम महिला अधिवक्ता रही । कमलादेवी चट्टोपाध्याय (१९०३–१९८८) बहुआयामी समाज सेवी थी जिसकी दूरदर्शिता से ‘नैशनल स्कूल ऑफ ड्रामा’ का गठन हुआ । देश की महान विभूतियों में सुचेता कृपलानी, सरोजिनी नायडू, लता मंगेशकर, नरगिस दत्त, शबाना आजÞमी, सुब्बालक्ष्मी, बेगम अख्तर, मदर टेरेसा, किरण बेदी, सानिया नेहवाल, मैरी कॉम, इंद्रागांधी, प्रतिभा पाटिल, सुधा मूर्ति आदि शामिल हैं जो २० वीं शताब्दी में और उत्कर्ष पर पहुंची ।

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इक्कीसवीं शताब्‍दी में, महिलाओं ने न सिर्फ धन अर्जन करने में अपनी भूमिका दर्ज कराई है बल्‍िक भावी संगठनों का निर्माण करते हुए अभिकर्ताओं का स्‍वरूप भी परिवर्तित किया है । हाल के वर्षों में, महिलाओं ने जीवन के हर क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है । विगत तीन दशकों में, महिलाओं ने का‘रपोरेट जगत में महत्‍वपूर्ण सफलता हासिल की है, सामाजिक नैतिकता की बाध्‍यताओं को पार करते हुए घर तथा कार्यस्‍थल पर स्‍वयं को सफल उद्यमी एवं कार्यकारी व्‍यावसायिकों के रूप में साबित किया है । भारतीय महिला उद्यमी वर्ग ने नए उद्यमों को आरंभ करने एवं उनका सफलतापूर्वक संचालन करने में बेहतर कार्य–निष्‍पादन के कई उदाहरण प्रस्‍तुत किए हैं ।
अप्रैल २०१३ में, फिक्‍की महिला संगठन ने “सभी विषमताओं के विरूद्ध उद्यमिता’’ उपाधि प्राप्‍त १५० महिला उद्यमियों की कहानियों का एक संकलन प्रकाशित किया । वे कहानियां बताती हैं कि कैसे इन महिलाओं ने संघर्ष करते हुए, बाधाओं से लड़ते हुए उद्यमिता के जगत, पुरूषों के अधिपत्‍य, में अपनी महत्‍वपूर्ण उपस्‍थिति एवं स्‍थान दर्ज कराने में सफल हुई हैं । प्रत्‍येक कहानी महिलाओं के अटूट साहस, दृढ़ निश्चय तथा स्‍त्री शक्‍ति के अदभुत सामर्थ्‍य को सही अर्थों में प्रतिबिम्बित करती है ।

उद्यमिता की जिम्‍मेवारियों को अपने कंधे पर लेने वाली महिलाओं की संख्‍या पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी है । आवश्‍यकता इस बात की है कि अधिक से अधिक महिलाओं को नया उद्यम आरंभ करने एवं संचालन कर सकने संबंधी उनकी क्षमताओं के प्रति उन्‍हें पूरी तरह आश्‍वस्‍त करने की ।

भारत में सफल महिला उद्यमियों के अनेकोनेक उदाहरण मिलते हैं । जैसे – राधा भाटिया (अध्‍यक्ष, बर्ड ग्रुप), मल्लिका श्रीनिवासन (अध्‍यक्ष तथा सीईओ, ट्रैक्‍टर्स एण्‍ड फार्म इक्‍िवपमेंट), प्रिया पॉल (अध्‍यक्ष, एपीजय पार्क होटल्‍स), शाहनाज हुसैन (सीईओ, शाहनाज हर्बल्‍स इन्‍क), एकता कपूर (संयुक्‍त प्रबंध निदेशक, बालाजी टेलीफिल्‍म्स) और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों में उच्‍चतम मुकाम हासिल करने वाली महिलाएं जैसे इंद्रा कृष्‍णामूर्ति नूई (अध्‍यक्ष तथा मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी पेप्सिको), नैनालाल किदवई (समूह महाप्रबंधक तथा देश प्रमुख, एच एस बी सी इंडिया), नीता अंबानी (मुम्बई क्रिकेट, आई पी एल की मालिक व समाज सेवी) ।

यह कहना गलत न होगा कि भले ही महिलाएं व्‍यवसाय के संचालन में समान रूप से सक्षम हैं, लेकिन महिला उद्यमी बनने की उनकी राह में अनेक सामाजिक और सांस्‍कृतिक अड़चनें आज भी देखीं जाती हैं । इनमें सबसे प्रमुख न सिर्फ भारत में बल्कि पूरे विश्‍व में पुरूष अधिपत्‍य वाले कॉरपोरेट विचारधारा का होना है । इसीलिए अक्सर महिला सशक्तिकरण की बात होती है ।

महिलाओं में निःसंदेह कुछ सहज एवं स्‍वाभाविक गुण होते हैं जो उन्‍हें सफल नेता बनाते हैं । विविध कार्यों को निष्‍पादित करने में महिलाओं की क्षमता एक अदभुत विशिष्‍टता है जो कार्यस्‍थल विशेषकर वरिष्‍ठ प्रबंधन स्‍तर पर सहज ही परिलक्षित होती है, एक ही लक्ष्‍य पर ध्‍यान केंद्रित करते हुए महिलाओं को भिन्‍न–भिन्‍न प्रकार की जिम्‍मेदारियों का निर्वहन करना पड़ता है ।

हाल ही कुछ वर्षों में यह देखने में आया है किस प्रकार महिलाओं ने अपनी दृढ़संकल्प व स्वशक्ति से अपने सामने आए हर अवरोध का पार किया । कोरोना काल में भी यह देखने में आया कि किस प्रकार कुछ समाज–सेवी महिलाएँ तालेबंदी में घरों में बैठे विद्यार्थियों, गरीब बच्चों और नौजवानों का उत्साह वर्धन करती रही । वेबिनार व ओन लाइन प्रक्रिया द्वारा पूरे विश्व को एक प्रकार से ‘ओपन वैश्विक स्कूल’ बना दिया । ऐसी काफी महिलाएं सामने आई उनमें मुख्य नाम देहरादून की स्वरलीन कौर, मुम्बई की शैफाली चोपड़ा, दिल्ली की डा । नैन्सी जुनेजा, रणजीता अशेष, बंदन प्रीत महाजन, रंजीता नाथ घई, देहरादून की ही श्रेया कत्याल, फरीदाबाद की प्रियंका बेह्ल, स्वामी अमर देव स्कूल, करनाल की प्रधानाचार्या सुश्री राखी गिबरानी, चण्डीगढ़ की डा । गगनदीप कौर गुलाटी, जालन्धर के ग्रेस डेनियल, नागपुर की स्नेह मेषराम शामिल है । किसी ने ‘द टॉक रूम’ की शुरुआत करी तो किसी ने ‘दिल की आवाज’, ‘क्षितिज– जहां सपने हकीकत बने’, ‘ईच वन टीच वन’, ‘वीविंग र्डिम्स’ अथवा ‘मैन्टरेक्स ग्लोबल’ । स्वरलीन कौर के ‘द टॉक रूम’ और डा । नैन्सी जुनेजा के ‘रैव अप एवं मैन्टरेक्स’ भारत को दुनिया भर में १०० से अधिक देशों से सम्पर्क पुल बनाने में सहायक साबित हुए । जहां युवा सशक्तिकरण और महिला सशक्तिकरण पर चर्चा, विचार विमर्श व गोष्ठियों का आयोजन किया गया । ‘पर्सनेलिटी आर्किटेक्ट’ प्रियंका बेह्ल ने एक पुस्तक की रचना करी जिसमें उनके द्वारा पढ़ाये–सिखाये गये २५ बच्चों ने २५ प्रेरणादायक शख्सियतों पर जीवनी लिखी । ये सभी बच्चें ९ वर्ष ले कर १९ वर्ष की उम्र है और इनमें दो तिहाई लेखक बालिकाएं है । चुनी हुई शख्सियतें भी अधिकांश महिलाएं है जो नारी सशक्तिकरण व स्वालम्बन की मिसाल है जिनमें दिव्यांग दीपा मलिक (पैरा ओलम्पिक मेडलिस्ट), ईरा सिंघल ( आई ए एस टॉपर), अरूणिमा सिन्हा (कृत्रिम पांव से एवरेस्ट पर पताका), डा । मल्लविका अइयैर (बाम्ब ब्लास्ट सर्वाइवर), लक्ष्मी अग्रवाल ( ऐसिड फाइटर), डा । शिवांगी मलेशिया, डा । राखी अग्रवाल, अरुंधती राय, सुनिथा कृष्णन, किम हिल आदि । इन जैसी हजारों महिलाएं और भी है और वे सभी भी जो अपने अपने घरों में गुमनामी में रहते हुए भी इस धरा को देदीप्यमान व प्रफुल्लित किए रखती है । आज पूरे पुरुष समाज को को यह समझने की आवश्यकता है – नारी सम्मान है जहां ; सुख समृद्धि शांति है वहां ।

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प्रिन्सिपल राखी गिबरानी का तो यहां तक कहना है कि हिन्दूओं के तीन प्रमुख देवताओं में से भगवान शिव को सबसे संहारी देवता माना गया है, परन्तु उन्हीं शिव ने अर्द्धनारीश्वर रूप धारण कर यह सन्देश दिया कि नारी और नर का जीवन एक समान, संतुलित है । प्रकृति का भी प्राकृतिक विकास इसी संतुलन पर कायम है ।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस केवल एक दिन का पर्व नहीं इसका एहसास हम सबको प्रतिदिन होना चाहिए । कहा भी गया है मां से बढ़कर तो भगवान भी नहीं ।
अंत में कुछ विलक्षण बालिकाओं को उल्लेख करना चाहूंगा जिन पर मुझे नाजÞ है और आने वाला समय उन्हें महिला सशक्तिकरण का प्रतिरूप समझेगा । कुमारी आशिमा कौर, जान्या तलवार,, ऋथ्वी कौशिक, अन्या जैन सानवीं नंदा, रबानि जौली, विपनप्रीत कौर, ऐलिआना, कंगना खैरा, इक्रा खान, जिया अग्रवाल, सुरभि, आस्था, अदिति अरोरा, शनमुखा प्रिया ये वो नन्हे व किशोर बालिकाएं है जो पब्लिक स्पीकिंग, अभिनय, नाट्य–मंचन, क्राफ्ट, वाद–विवाद, ऐन्करिंग, संगीत, कविता पाठ, गायन आदि में पारंगत हैं इनमें से कुछ तो फिल्मों में भी काम कर चुकी है तथा कोरोनावायरस के दौरान सभी ने औसतन २५ से ५० ऑनलाइन प्रतियोगिताओं में प्रशस्ति–पत्र प्राप्त करें । अतः यह कहना सही होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस अपने उद्देश्य में खरा उतरा है । वर्ष २०२१ का इस महिला दिवस का स्लोगन भी विचारणीय है – ‘चुनौतियां चुनें ’ (ऋजययकभ तजभ ऋजबििभलनभ) ।

आज वो समय आ गया है जब महिलाएं, पुरूषों के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ने में तत्पर हैं । चाहे नौसेना हो, वायु सेना या थल सेना हों, खेल का मैदान हो या वैज्ञानिक प्रयोगशाला, पुलिस में महिला हो या चिकित्सा क्षेत्र में, ऐन्टार्टिक हो या अंतरिक्ष, शिक्षण, राजनीति या समाज सेवा हो वे हर जगह नारित्व का परचम फहरा रही है ।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सभी को शुभकामना ।

मुकेश भटनागर

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