राजनीति और महिला : अंशुकुमारी झा
‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ ।
नारी सृष्टि है । नारी प्रकृति है । प्रकृति के बिना पुरुष महत्वहीन है । इसलिए संसार चलाने में नारी का बहुत बड़ा योगदान है । आज के आधुनिक युग में सर्वत्र नव जागृति का शंख ध्वनि गुंजायमान है । मनुष्य में चेतना का लहर संचार हो रहा है । समानता की सामन्जस्यता को देखकर बसुधैव कुटुम्बकम की भावना भी महसूस हो रही परन्तु इस विषय पर अगर सूक्ष्म रूप से दृष्टिपात की जाय तो नारी शब्द अपने आप में परिपूर्ण है । यह दो अक्षर का नारी शब्द केवल हृदय के अन्तरंग की वीणा झंकृत ही नहीं करती, सिर्फ विलास का गहना ही नहीं एक देवी, शिक्षिका, और सृजनकारी प्रकृति भी हैं । वैदिक काल में नारी का जो महत्व था अभी तक वो महत्व उसे नहीं मिल पाया है ।
आज के युग में महिलाएं चारदीवारी से निकलकर हरेक क्षेत्र में दखल रखने लगी है पर आंशिक रूप से । ये कहना मुनासिब नहीं होगा कि जितना अधिकार मिला है महिलाओं को, वो उस तक पहुंच पाई है, अभी भी महिलाएं अपने सुनिश्चित अधिकार से बहुत पीछे है ।
विश्व के सन्दर्भ में नेपाल में भी महिलाओं को विशेष अधिकार प्रदान किया गया है । वि.सं ।२०६३ साल के संविधान में महिलाओं की दयनीय स्थिति पर दृष्टिपात करते हुए उसके सुधार पर विशेष ध्यान दिया गया । उक्त संविधान अनुसार बेटी को भी पिता की संपत्ति में से बेटा बराबर का अंश मिलेगा और अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी को तलाक देगा तो उसे अपनी सम्पत्ति में से ५० प्रतिशत देने का नियम उल्लेख है ।
इसी प्रकार हमारे नेपाल के उत्कृष्ट संविधान में महिला को ३३ प्रतिशत अधिकार मिलने का हक उल्लेख है परन्तु महिला वहां तक पहुंच नहीं पाई है । अभी भी हमारे समाज में अधिकांश महिलाएं इस प्रकार की हंै जिसे उनके हक और अधिकार के सम्बन्ध में जानकारी भी नहीं है । संविधानसभा में ३३ प्रतिशत महिला को स्थान देने का नियम है पर वह ३३ प्रतिशत भी जैसे तैसे व्यवस्थापन किया जाता है । क्योंकि हमारे समाज में महिला अभी भी दबी हुई ही है । वो भी राजनीति के विषय पर तो और भी । प्रायः देखा जा रहा है कि जिस महिला का पति, पिता, भाई या उनके संबन्धित नेता है तो वही महिला राजनीतिक क्षेत्र में आती है । चाहे मन से हो या दबाब में । पितृसतात्मक सोच अनुरूप सामाजिक मूल्य मान्यता तथा सदियों से महिलाओं के साथ होता आ रहा भेदभावपूर्ण व्यवहार तो यथार्थ ही है । इसको बढ़ावा देने में लैंगिक हिंसा, शोषण इत्यादि घटनाएं काफी है । इस प्रकार के क्रियाकलाप से महिलाओं पर बहुत ही नकारात्मक असर होता है । जिससे उसकी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अवस्था भी कमजोर हो जाती है । पुरुष और महिला में समानता लाने के उद्देश्य से १०६ वर्ष पूर्व से ही ८ मार्च के दिन को अन्तराष्ट्रीय नारी दिवस के रूप में मनाया जा रहा है । इस अभियान का मुख्य उद्देश्य शान्ति, विकास, न्याय और समानता के प्रारम्भ को स्मरण कर महिलाओं के सर्वांगिन विकास पर ध्यानाकर्षण कराना है ।
अब हम आते हैं, हमारे देश की राजनीति में महिला की अवस्था कैसी है ? विदित ही है कि राजनीति शब्द को भ्रष्टाचारी, बेइमानी गन्दे विचारों से इतना न दुषित कर दिया गया है कि कोई भी इज्जतदार व्यक्ति राजनीति में जाना पसन्द नहीं करते । उसमें महिला तो और भी लज्जा और मर्यादाओं को सम्हालने के चक्कर में राजनीति के रा शब्द से भी दूर रहने की कोशिश करती है । वैसे महिलाओं में लज्जा का होना भी स्वाभाविक ही है क्योंकि महिला का यह गुण इश्वर प्रदत है । वैसे नेपाल की राजनीति में भी महिलाओं की सक्रियता थोड़ी बहुत देखने को मिल रही है । फिलहाल राष्ट्र प्रमुख ही महिला हैं । सभामुख के स्थान पर भी महिला रहीं और प्रधान न्यायाधीश के पद पर भी महिला विराजमान हो चुकी है । अगर हम थोड़ा पीछे मुड़कर राजनैतिक इतिहास को पलटाकर देखें तो २००३ साल का विराटनगर जुटमिल में हुए मजदूर आन्दोलन में महिलाओं का योगदान अविस्मरणीय है । नालापानी की लड़ाई से लेकर २००७ साल तक के जहानियां शासन विरुद्ध का संघर्ष तथा २०६२–६३ के जनआन्दोलन में नारियां पुरुष के साथ शुरु से ही सक्रिय रही । फिर भी महिलाएं सदैव हरेक स्तर से अवहेलित और प्रताडि़त ही रही । यहां तक की राज्य की नीति निर्माण स्तर में भी नगण्य रूप से सहभागी नहीं हो पाई है ।
महिलाएं आन्दोलन में तो सहभागी दिखाई दे रहीं पर पद लेने के समय में उसके साथ भेदभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है । ३१ गते अषाढ १९८९ साल में योगमाया द्वारा लिया गया जल समाधि को स्मरण करते हुए रौंगटे खडे हो जाते हैं । इसी प्रकार रेमन्त कुमारी आचार्य, मंगलादेवी सिंह, प्रभा देवी तथा कामक्षदेवी की अध्यक्षता में बहुत सारी महिलाओं ने मिलकर संघ, संगठन का स्थापना किया और महिलाओं के हक अधिकार के लिए आवाज उठाती रही । परन्तु जब २०१५ साल में प्रथम प्रतिनिधि सभा का निर्वाचन हुआ तो १०५ स्थानों पर १५ महिलाओं ने उम्मीदवारी दी जिसमें से सिर्फ एक महिला द्वारिकादेवी ठकुरानी निर्वाचित हुई और नेपाल के इतिहास में वह प्रथम मन्त्री हुई ।
समग्र में राजनीतिक गतिविधि में महिलाएं सदियों से सक्रिय दिखाई देती है परन्तु उसे हमेशा से ही दबाया गया है । वर्तमान में राजनीति में महिला का ३३ प्रतिशत स्थान लगभग सुनिश्चित ही दिखाई देता है पर अन्य क्षेत्रों में महिला की सहभागिता कम ही है ।
जिसका मुख्य कारण है शिक्षा का आभाव । राजनीति में तो शिक्षा नहीं भी होने से महिला को स्थान मिल जाता है परन्तु अन्य क्षेत्रों में शिक्षा का होना अत्यन्त आवश्यक होता है । अभी भी ग्रामीन क्षेत्र की महिलाएं अधिकांश रूप से निरक्षर ही होती है । महिला अधिकार वहां भी तो है । पर हम उन्हें नजर अन्दाज कर देते हैं इससे तो महिलाओं का सर्वांगिण विकास असम्भव है । यह विषय बहुत ही संवेदनशील है । महिलाएं अगर शिक्षित है, सक्षम है तो देश विकसित होने में समय नहीं लगेगा । हमारा देश भी अन्दर से खोखला नहीं रहेगा, सक्षम बनेगा ।

