सशक्तिकरण का आधार स्तम्भ शिक्षा और आत्मनिर्भरता है : कंचना झा

हिमालिनी, अंक मार्च, 2021। मेरा नाम कंचना झा है । मैं पद्मकन्या बहुमुखी क्याम्पस में हिन्दी की उप–प्राध्यापक हूँ । साथ ही रेडियो में कार्यक्रम निर्माता, पटकथा एवं कार्यक्रम प्रस्तोता के रूप में कार्यरत हूँ । बचपन से ही मुझे कुछ बनना है, काम करना है महिलाओं के लिए यह सपना रहा मेरा । क्योंकि, जिस परिवेश से मैं आती हूँ वहाँ की महिलाओं की अवस्था उस वक्त बहुत खराब हुआ करती थी हालांकि आज भी उनकी अवस्था में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ है ।
महिलाएं तब भी अपने स्वास्थ्य, अपनी शिक्षा, अपने अधिकार के बारे में नहीं सोचती थी आज भी बहुत ज्यादा नहीं सोचती हैं । जिसकी वजह से स्वयं तो दुख भोगती ही है और आने वाले नस्लों को भी यही सिखाती हैं कि चुप रहो, बर्दाश्त करो, सहना सीखो जो मुझे कभी बहुत रास नहीं आया और मैंने सोच बना रखी थी कि अगर ऐसा अवसर आया तो मैं बेजुबानों की आवाज बनूँगी । रुचि से भी ज्यादा ये मेरे लिए अभियान है । परिवेश का असर मुझ पर भी आया । लेकिन बोलना है सो मैंने रेडियो कार्यक्रम द्वारा अपनी आवाज उठाई जिससे मुझे बहुत हद तक संतुष्टि मिली । स्नातकोत्तर में मैंने पत्रकारिता का अध्ययन किया । साथ ही मैंने पत्रकारिता संबंधी बहुत तरह के प्रशिक्षण भी लिए हंै ।
पारिवारिक सहयोग के मामले में मैं बहुत भाग्यशाली रही । मेरे दोनों परिवार के लोगों ने मेरा बहुत साथ दिया । पिताजी की हार्दिक इच्छा थी कि हम बहनें कभी घर में न बैठे । ये उस वक्त की बात है जब बिहार में बहुत ज्यादा लड़कियों को पढ़ाया नहीं जाता था या फिर थोड़ा बहुत पढ़ाया भी जाता था तो अच्छे घर में विवाह के लिए । लेकिन मेरे माता पिता की इच्छा ही थी कि हमें पढ़ लिखकर कुछ बनना है काम करना है और इसके लिए उन्होंने सबकी बात का विरोध करहमें शिक्षित बनाया । शादी नेपाल में हुई । परिवेश नया था इसलिए कुछ समय सबकुछ समझने में लगा । कुछ साल बाद मैंने स्नातकोत्तर की पढ़ाई शुरु की तो मेरे ससुर जी बहुत खुश हुए उन्होंने मुझसे कहा था कि – अब मैं बीस साल और जीना चाहता हूँ । आप अच्छे से पढि़ए कुछ करके दिखाइए । मेरे रेडियो में काम करने से उप प्राध्यापक होने तक हर बात की खबर को सुनकर वो बहुत आशिर्वाद दिया करते थे । उनकी बहुत इच्छा थी कि लोग मुझे मेरे नाम से जाने ।
घर के सभी सदस्यों ने मेरा हौसला बढ़ाया । काम के सिलसिले में बेटी और पति ने जो भूमिका निभाई उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता । हाँ शुरुआत में जब कभी बहुत ज्यादा घर से बाहर जाना होता तो बहुतों को ये अच्छा नहीं लगता था । कोई कुछ बोल नहीं पाते थे । मैंने इसे नकारात्मक रूप में नहीं लिया मुझे लगता है यह घर परिवार के लोगों का मेरे प्रति स्नेह या चिंता थी कि मैं अकेली कहाँ और कैसे काम करुँगी ? धीरे–धीरे मेरे प्रति उनका विश्वास बढ़ता गया । परिवारवालों की वजह से ही मैं आज इस जगह तक पहुँच सकी हूँ । बच्ची अभी भी बहुत ज्यादा बड़ी नहीं हुई है लेकिन वो कभी मेरे काम में बाधक नहीं बनी ।
वो हमेशा मेरा उत्साह बढ़ाती रहती है । काम के सिलसिले में मुझे पुरुष मित्रों के साथ काम करने का ज्यादा अवसर मिला है पर मैंने कभी अपने आप को असुरक्षित महसूस नहीं किया । मुझे पुरुष मित्रों का सहयोग ही मिला है । वैसे समाज है जहाँ विभिन्न मानसिकता के लोग रहते हैं ऐसे में अपनी सूझ–बूझ से आगे बढ़ना पड़ता है और मैंने वही किया । काम के सिलसिले में मैं बहुत से पुरुष मित्रों से मिली मैंने बहुत काम किया लेकिन कभी कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा । शिक्षित और आत्म निर्भर बने । जिस सशक्तिकरण की हम बात करते हैं उसका आधार स्तम्भ शिक्षा और आत्मनिर्भरता ही है ।


A very good article by Kanchana Jha, encouraging to youths. Education and use of science and technology will make women self dependent, build up confidence and empower them in family, society and nation.
We want to see Himalini publishing positive articles like this.