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इनसाइड द हिन्दू मॉल एक हालिया प्रकाशित पुस्तक -अदभूत हिन्दू भारत को जानने का अवसर

 

 

 

अमिय भूषण ।  इनसाइड द हिन्दू मॉल एक हालिया प्रकाशित पुस्तक है।अनोखे नाम वाली इस पुस्तक को पढ़कर आप अनूठे अदभूत हिन्दू भारत को मोटे तौर पर जान और पहचान सकते है। ऐसा इस पुस्तक को पढ़ने के बाद महसूस होता है।लेखक अभिजीत सिंह जी की पुस्तक लिखने के पीछे भी शायद यही कुछ मंशा रही होगी ऐसा इस पुस्तक को पढ़ने के बाद लगता है।अगर बात इसके जरा हटकर अलग से लगते नाम की करे तो इसे हम लेखक का नजरिया भी मान सकते है।संभवतः लेखक ने सम्पूर्ण हिन्दू संस्कृति को एक मॉल के रूप में देखा और सोचा हो।जहाँ सब के लिए कुछ न कुछ है।अगर सरल सहज शब्दों में कहे तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ या फिर उसकी जरूरत और सोच से संबंधित यहाँ काफी कुछ है।पेशे से बैंकर,बैंक अधिकारी श्री अभिजीत सिंह जी व्यक्तिगत जीवन में भी एक विनम्र सादगी पसंद और बेहद ईमानदार कहे तो अपने पेशे से अपनी बातों तक वाले शख्सियत है।जिन्हें आप एक शौकिया लेखक कवि शायर ज्योतिष और सामाजिक सांस्कृतिक कर्मी के रूप मे भी जान और पहचान सकते है।हिंदी अंग्रेजी के साथ ही उर्दू भाषा में भी दखल रखने वाले अभिजीत सिंह एक बहुभाषी बहुआयामी व्यक्तित्व के भी धनी है।फेसबुक जैसे सोशल मीडिया नेटवर्क मे इनके हजारों प्रशंसक मित्र शुभेच्छु है। जिनके माध्यम से ये न केवल समसामयिक विषयों पर सार्थक चर्चा अभियान छेड़ते रहते है बल्कि बौद्धिक चर्चा गोष्ठियों के द्वारा भी उसे परिणति परिणाम तक ले जाते है।इनके और इनके समूह विशेष के बुद्धिजीवियों द्वारा ऐसे आयोजन समय समय पर होते रहते है।बात अगर सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण और सेवा कार्यो की करे तो भी ये और इनकी ये मित्र मंडली इसमें भी बढ़ चढ़ कर सक्रिय रहती है और ऐसे अभियानो का संचालन करती है।पत्र पत्रिकाओं के लिए छिटपुट लेखन और सोशल मीडिया पर लगातार सार्थक लेखन ने अभिजीत जी को एक सशक्त सार्थक पहचान दी है।किंतु एक रचना,एक रचनात्मक लेखन के रूप में ये पुस्तक उनकी पहली सृजनात्मक रचना है।बात अगर केवल लेखक के परिचय या व्यक्तित्व से प्रभावित होकर पढ़ने या पढ़ने के सुझाव देने की हो तो ये लेखक और पुस्तक दोनों के साथ ज्यादगी,नाइंसाफी होगी।

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दरसल ये पुस्तक सरल उदाहरण और खूबसूरत पौराणिक आख्यानों से भरा पड़ा है।जिसे लेखक ने मानवीय संवेदना,मानव मन के साथ ही तर्क तत्व तथ्य यथार्थ के द्वारा सुंदर कथ्य और सरल शब्दों के द्वारा पन्नों पर उकेरा है।हिंदू संस्कृति को एक गतिशील सर्वग्राह्य सर्वस्पर्शी संस्कृति के रूप में पेश किया है।इस पुस्तक मे लेखक ने अपने चौअन (५४)लेखों के माध्यम से हिन्दू धर्म,हिन्दू धर्मशास्त्र-हिंदू अर्थशास्त्र,हिन्दू जीवन मूल्य-हिंदू जीवन और हिन्दू भूमि भारत वर्ष को छुआ है।यहाँ प्रेम के शाश्वत भारतीय अवधारणा पर भी बात है तो चर्चाओ के नारीवादी दृष्टिकोण को भी लेखक ने अपने विषय वस्तु के रूप में लिया है।पर यह हमारी परम्परागत सोच और इसको लेकर हमारे दिमाग में चलने वाले बातों से ये इतर और उलट है।मसलन जब हम प्रेम की बात करते है तो हमारे जेहन में शाहजहाँ मुमताज़ और ताजमहल ही होता है।वही जब हम नारी अधिकार स्वाभिमान की बात करते है तो दुनिया का हर धर्म हर मजहब और संस्कृति समाज हमे नारियों का दमनकर्ता नजर आता है।किंतु यहाँ लेखक ने अपने बातों से फेमिनिज्म के परम्परागत फंडे “we aim for equality”
को “we aim for excellence” वाले नजरिये के साथ हम सबो के समक्ष रखा है।वही लेखक ने प्रेम के यादगार धरोहर के रूप में ताजमहल नही अपितु रामसेतु को रख हम सबो को चौकाया भी है।इनके दृष्टि में रामायण केवल एक महाकाव्य एक धर्म ग्रंथ मात्र न होकर अपितु दुनिया का सबसे पुरातन प्रेम काव्य भी है। लेखक,रामायण के इन सुंदर प्रेम पर आधारित आख्यान प्रसंगों के माध्यम से इसका मूल्यबोध नई पीढ़ी को करा रहे है।इस पुस्तक में ऐसे कई उदाहरण है नारी पुरुष,राजा प्रजा,गुरु शिष्य,गृहस्थ सन्यासी,
पिता पुत्र और प्रकृति परमात्मा के आपसी संबंधों से हमारा परिचय कराते है।उनके मूल्य के साथ उनका मोल भी बताते समझाते है।वही योद्धा वैष्णव संत बंदा वीर वैरागी और उनके पांच वर्षीय पुत्र अजय सिंह जी के जीवन के आखिरी क्षण,
संकल्पना,सत्य के साथ वाले साक्षात्कार और आत्माहुति आत्मोत्सर्ग वो भी आतंकियों के सामने को भी इन्होंने बड़े सुंदर तरीके से पेश किया है।मगर बलात इन बलात्कारियों के सामने का बलिदान और समर्पण नही करने के दर्शन,दृष्टि को इन्होंने “डर?ओ की हुँदा आ?” शीर्षक के माध्यम से मार्मिक तौर पर उकेरा है।बात अगर संख्या और पूर्णता की हो तो सनातनी मान्यताओ मे जहाँ एक सौ आठ पूर्णता का दोतक है वही चौअन अभी आधे हुए पूरे का सूचक दोतक है। ये हमारी भारतीय चिति का चिंतन है।इस विचार के आधार पर एक समीक्षक के तौर पर अभिजीत सिंह जी के लिए यही राय होगी कि ये इस श्रेणी या क्रम मे पूर्ण पूरी और अंतिम रचना नही होनी चाहिये।इसका दूसरा हिस्सा भी यथाशीघ्र आना चाहिये उपलब्ध होना चाहिए।जिसमें शेष बचे विषय और बिंदु भी सामने आ पाये।ऐसी अपेक्षा है कि अगले खंड में हमें ढेरों नया विषय और उनपर आपके उपयोगी सार्थक विचार पढ़ने को मिलेगे।वैसे इस पुस्तक के पढ़ने के बात पूरी तरह आश्वस्त होकर कही जा सकती है कि लेखक के पास अभी इतना कुछ ज्ञान और ऊर्जा है कि बिना दुहरावो के काफी कुछ नया पढ़ने को भी मिलेगा।बाकी लेखक अपने बातों को कहने की अपनी इस शैली को बनाये रखें।क्योंकि आज के दौर के युवा पीढ़ी की यही जरूरत और सोच है।ऐसे ही लेखनों के माध्यम से नई पीढ़ी हिन्दू भारत की विशेषताओं की ओर आकृष्ट और मुखातिब होते रहेंगे।

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वही बात अगर संस्कृत, संस्कृतनिष्ट हिंदी मे प्रकाशित धार्मिक हिन्दू साहित्य और हालिया वर्षों में प्रकाशित बेस्ट सेलर अंग्रेजी पौराणिक गाथाओं वाले फिक्शनो की करे तो बाजार में मौजूद इन पुस्तकों से भी बात नही बननी है।एक से युवा दूर है और दूसरा उसे उसकी मान्यताओं जड़ों से नित्य प्रति दूर ले जा रहा है।ऐसे में द हिन्दू मॉल जैसे पुस्तक और इस प्रकार के प्रयोग,प्रयास की नितांत और निरंतर आवश्यक है।वैसे इस पुस्तक के पढ़ने के लिए केवल इसलिए नही कहा जा सकता कि लेखक एक भले व्यक्तित्व है और हिंदुत्व के पैरोकार है। अपितु इसलिए भी ये पुस्तक पढ़नी चाहिये कि वे एक भविष्य द्रष्टा है भविष्य की होने वाली घटनाओं के सटीक आकलनकर्ता भी है। वो वर्तमान को लेकर बड़ी गहरी और पैनी नजर रखते है।अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व,नौकरी और सामाजिक गतिविधियों को करते हुए हिन्दू हिंदुत्व,भारत भारतीय के प्रति निरंतर अध्ययनशील चिंतनशील रहते है।ये पुस्तक “इनसाइड द हिन्दू मॉल” उसी की परिणति है।अगर आपको इन मूल्यों में विश्वास,अपने देश धर्म और संस्कृति से प्रेम अनुराग है इसमें आकर्षक हो तो आपको ये पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए।
-अमिय भूषण

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