वाणी की मिठास, घोले जीवन में मिठास : बबीता प्रसाद ” प्राची “
“ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए औरन को शीतल करे आपौ शीतल होए” कबीर के इस दोहे का तात्पर्य सर्व विदित है सभी इसके मर्म को समझते है । सामान्य रूप से प्रत्येक मनुष्य की आंतरिक इच्छा यही होती है कि उसकी भाषा और स्वर में मिठास हो । मिठास का अर्थ है अंतर्मन के भावों में विराजित मृदुता । मिठास का अर्थ यह कदापि नहीं है कि केवल शब्दों की बनावट सुंदर हो और मन के भावों से शब्द मेल न खाते हो । अर्थात जब आपके भावों में सहजता , मधुरता और निष्कपटता आयेगी तभी आप परोक्ष और अपरोक्ष रुप से जन जन के प्रति सेवा , प्रेम और स्नेह के सुमधुर भावों से पुरीत हो उठेंगे । कहा गया है मनुष्य परिस्थितियों का दास है । इस कथन के भी दो पक्ष है एक तो यह कि जो कर्म पर विश्वास नहीं करता उसे परिस्थितियाँ अपने अधीन कर लेती है अर्थात अगर आपने कर्म किया ही नहीं केवल भाग्य के परिवर्तित होने की प्रतिक्षा में है तो आपके जीवन को परिस्थितियाँ अपने अधीन कर लेगी ।
जीवन के आपाधापी में स्वयं को सँभाल कर रखना तथा अपने व्यवहार में सहजता , मृदुता और निष्कपटता को बनाये रखना भी एक अद्भुत कला है । हम सभी जीवन संग्राम में चलते जाते है हमें पता नहीं होता की कब कैसी परिस्थितियां आयेंगी । कठीन परिस्थिति हो या आसान परिस्थिति हो हमें परिस्थितियों का दास नहीं बनना है तथा अपने मन के सहज विचारों से सदा जुड़े रहना है किसी के प्रति गलत धारणा , छल और ईर्ष्या हमारे व्यवहार में भी प्रभाव डालती है। सुविचार हमारे वाणी तथा व्यवहार को मिठास प्रदान करते है । अपने अंतर्मन को नकारात्मकता से बचाये रखने के अथक प्रयास करना पड़ता है क्योंकि इस संसार में ऐसे व्यक्तित्व की कमी नहीं है जो सुंदर पुष्प को तोड़कर मसल देते है । यह बात कड़वी अवश्य है परंतु सत्य है । इसका तात्पर्य केवल इतना ही है कि जो व्यक्ति पवित्र , निष्कपट और सहज होता है , उसके शत्रु भी बहुत पैदा हो जाते है उसकी आलोचना करने वाले लोग कम नहीं होते है । सही को सही और गलत को गलत कहने वाले लोगो की संख्या इस संसार में बहुत कम है । क्योंकि लोग स्वार्थवश तथा अपने कार्य की सिद्धि हेतु चापलुसी करने से भी नहीं कतराते है ।
ऐसे लोगों की वाणी में मिठास अवश्य होगी परंतु यह उनका बाह्य रुप है । बनावट और चापलुसी की तह में दबा हुआ उनका व्यवहार कभी सहज और मृदु हो नहीं सकता है। वाणी और व्यवहार में मिठास तभी आ सकती है जब आप पूर्ण रूप से सहज होंगे आपके अंतर्मन में निर्मल भावों का समावेश होगा । आप सकारत्मकता से परिपूर्ण होगे । मेरे विचार से सकारात्मक रहना कठिन अवश्य है परंतु असंभव कदापि नहीं है । जब आप भूमि में एक बीज का प्रत्यारोपण करते है तो क्या उसमें तुरंत फल और फूल आ जाते है , नहीं आते है ना । इसके लिए हमें क्षण दिन , महीने और सालों प्रतिक्षा करनी पड़ती है । ठीक उसी भाँति सकारात्मक भावों को मन में भरने हेतु हमें अथक प्रयास करने पड़ते है । नकारात्मकता से दूर रहना सहज नहीं होता है मानव जीवन की परिस्थितियाँ , आपसी संबंध की कटुता , अव्यवहारिक परिवेश के फलस्वरूप नकारात्मक भाव हमारे मन में स्थान ग्रहण करने लगते है ।
यह हम सबकी विशेषता होनी चाहिए कि किस प्रकार हम अपने वाणी और व्यवहार को शुद्ध बना सकते है , किस प्रकार हम अपने अंतर्मन को पवित्र कर सकते है ।
उपसंहार = इस संदर्भ में मेरी एक कविता की पंक्तियां है — ” संबंधो की गरिमा कभी कहीं तौली नहीं जाती कटु भाव रख वाणी में मिश्री घोली नहीं जाती ” सत्य तो सदा शाश्वत है उसके रूप को कभी परिवर्तित नहीं किया जा सकता है । अगर आप सच्चे और निष्कपट है आपके हृदय में परिवार और समाज के लिए स्नेह और सम्मान है तो संसार की कोई भी ताकत आपके व्यवहार के मिठास पर प्रहार नहीं कर सकती है । ” मन चंगा तो कटौती में गंगा ” मन में मृदुभावों की गंगा तभी बहेगी जब आपके विचार शुद्ध और पवित्र और होंगे और आप परहित को अपना हित समझेंगे। अत: निर्मल , परिष्कृत मन हो तो वाणी और व्यवहार में मिठास स्वत: ही आ जाती है । ———-
बबीता प्रसाद ” प्राची ” ( नाशिक , महाराष्ट्र )

