अजयकुमार झा, जलेश्वर । नेपाल के नव स्थापित संघीयता और संघीय गणतंत्र मधेश आंदोलन और साहिदों के बलिदानी का ही उपहार है। यह वही मधेश आंदोलन था, है और रहेगा जिसका शंखनाद आदरणीय श्री गजेंद्र बाबू ने किया था। परंतु इसका भावनात्मक विजारोपण और पोषण परमांदरणीय श्री रामनारायण बाबू के व्यक्तित्व से आरंभ हुआ था। सदभावना पार्टी जन्म, विघटन तथा मधेसी जनाधिकार फोरम के जन्म और विघटन के साथही तमलोपा और जसपा जैसे पार्टियों को अपनी शहादत से पालन पोषण करनेवाली मधेसी नागरिक आज अपनेही नेतृत्व के अयोग्यता से त्राहिमाम है। अब मधेसीयों के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक, भाषिक और प्रशासनिक पहचान स्थापित करने साथ साथ इसकी समृद्धि और संरक्षण करना हम बुद्धिजीवी और युवाओं का परम दायित्व बन चुका है। इसके लिए भटके हुए नेताओ को सही मार्ग पे लाना तथा नियंत्रण में रखने का काम भी हमे ही करना होगा। नेपाल के अखंडता और संप्रभुता को सबलता प्रदान करते हुए अपनी उपास्थितिको सशक्त बनाना होगा। सत्ताभोगी मधेश को ही नही देश को ही लूटने और बेचने को आतुर है। धर्म और उग्र राष्ट्रवाद के नमा पर आम नागरिक के साथ क्रूर खेल खेलना इनका स्वभाव होते जा रहा है। क्षेत्रीय और प्रांतीय भावना को भड़काकर देशको बाटने दुश्चक्र रचने वालों से हमे सावधान रहते हुए गतिशील रहना होगा।
नेपाल के लिए जातीय समीकरण कोई नई बात नहीं है। यह तो आधुनिक नेपाल के अस्तित्व में आने से भी पहले से है। मानदेव, धर्मदेव, ए लोग नेपाली इतिहास के प्रथम पुरुष माने जाते हैं। ए लोग न थारू थे न नेबार, न राना थे न थापा। न ब्राह्मण न यादव तो आखिर ए लोग थे कौन? इनकी जाति क्या थी? और इनके बाद में भारत के विहार, मुजफ्फरपुर से आए मल्ल लोग किस जाति के थे? इसके बाद शाह और राणा लोग कहां से एकाएक टपक पड़े? इन सारी बातों को खोजने का प्रयास किया जाय तो नेपाल देश ही द्विविधाग्रस्त हो जाएगा। सारा देश कन्फ्यूज हो जाएगा। मंगोल आंदोलन चल रहा है। ए मंगोल लोग कौन हैं? ए लोग मंगोलियन हैं अर्थात मंगोलिया से आए हैं। फिर इनका यह देश कैसे हुआ? जब मधेसी भारत से आया है तो राणा भी तो राजस्थान से आया है। ब्रह्मण में कुछ ईरानी भी हैं, जिनका धर्म यहूदी और पारसी है। वे लोग हिंदू नही है। इसीलिए ईसाईकरण के लिए सक्रिय रहते हैं। इस तर्क के आधार पर तो थारूको ही मूल नेपाली के रूप में मानना होगा। बांकी के सब भगोड़े हैं। और इस देश पर अधिकार जमाए बैठे हैं।
नेपाल के संविधान में हम मधेसियों के सम्मान में नेपाल के सर्वोत्तम नागरिक के हैसियत से बुलंद अक्षरों में जबतक समान अधिकार हेतु लिखा नही जाएगा तब तक हम नेपाली होनेपर गर्व नही कर पाएंगे। इस रहश्य को, इसकी भावनात्मक गहिराई को पहाड़ी सत्ताधारी समझना ही नही चाहता है, जो कि भयंकर भूल है। सत्ता परिवर्तन संसार का स्वाभाविक सिद्धांत है और क्रूर शासक के साथ विश्व राजनीतिक पटल पर अबतक कैसा व्यवहार होता आया है; शायद नेपाल के अहंकारी सत्ताधारी इसकी गंभीरता को नजरअंदाज करने की भूल कर रहा है। वर्तमान में नेपाली सरकार को यूरोप, अमेरिका, चीन और भारत का प्रत्यक्ष दबाव खेलना पड़ रहा है तो वही अप्रत्यक्ष दबाव इस्लामिक देशों का भी है। 15 हजार माओवादी सेना के आगे घुटने टेक देनेवाली सरकार के हैसियत को दुनियां पहचान चुकी है। साथही मंगोलियन और मधेसी किराती को दूसरे दर्जे के नागरिक जैसा व्यवहार करने के कारण आंतरिक द्वेष और कलह को दुनियां जानती भी है और इसके नब्ज को पहचानती भी है। जब चाहे विद्रोह को भड़का दे और जब चाहे साम्य कर दे, समझौत करा दे। पार्टी को तोड़ दे और नए पार्टी का गठन करा दे। नेताओं को विख्यात करा दे और बात नमानने पर दो कौड़ी का बना दे। ऐसी हालत में देश कितना सुरक्षित है इसको समझने में दिक्कत नही होना चाहिए। अतः देश के 88 प्रतिशत जनता को अधिकार विहीन तथा असुरक्षित भविष्य में डालकर शांति से जीने की ख्वाहिश रखना दिवा स्वप्न के समान है।
विद्वानों का कहना है।
” है तंत्र वही सर्वोत्तम जिसमे सबकी सहमति ली जाए।
सबका आदर सबका खयाल प्रतिभा की इज्जत की जाए।।
जबतक सबका सम्मान नही तबतक उत्तम परिणाम नहीं।
अथ प्रज्ञा शरणं गच्छामि भज बुद्धम शरणं गच्छामि।।
अर्थात्, जबतक सब को सम्मान नही मिलेगा तब तक उत्तम परिणाम लिए माहौल नही बन सकता। षडयंत्र बढ़ता ही गया, मुठ्ठीभर लोग बहुमत को दबाने का दानवीय कृत्य करते ही रहे, देश को योजनाबद्ध तरीके से मिलजुल कर लूटना जारी ही रहा, भ्रष्टाचारी और बलात्कारी को सम्मान और संरक्षण मिलता ही रहा, हत्यारा और दंगाइयों को सुरक्षा मिलता ही रहा तो तालिबान को पनपते कितना समय लगेगा? वैसे भी उपर्युक्त कुकृत्य दानवीय प्रतिभा का जनक और पोषक है। तो क्या हम भीतर से तालिबान ही तो नहीं!
अपनी नैसर्गिक और प्राकृतिक मानवीय अधिकार के लिए आंदोलनरत मधेसियों के ऊपर अंधाधुंध गोली बरसाना, घर में घुसकर हत्या करना, हर प्रकार के अधिकार से वंचित रखना, सामाजिक रूप से टार्चर करना, जाति, भाषा और प्रदेश के व्यवस्थापन में योजनाबद्ध रूप में विभेद सृजना कर मधेस और मधेसी को आर्थिक, प्रशासनिक, भौतिक तथा सामरिक रूप से असहाय बनाए रखना क्या दैविक कृत्य है? क्या वेद यही कहता है? हमारा उपनिषद, रामायण, गीता, महाभारत यही कहता है? कदापि नहीं! इसप्रकार के सोच और व्यवहार को तो दानवी, पिसाची और आतंकी कहा गया है। अतः यही है नेपाल के तालिबान।
माओवादी के द्वारा किए गए देश व्यापी हिंसात्मक संघर्ष और सरकार द्वारा निर्दोष मधेसियो के ऊपर वर्षाए गए गोलियां इतिहास में कदापि सम्मानित नही माना जाएगा। सत्ता के मद और शक्ति के अहंकार में बहुसंख्यक जनता के ऊपर किया गया अत्याचार और दमन विश्व किसी भी शब्दकोष में सम्मानित अक्षरों तथा वाक्यो में नही लिखा गया है, वल्कि ऐसे कुकृत्यों को मानवता के लिए कलंकित धब्बा के रूप में चित्रित किया गया है। हिटलर, मुसोलिनी, महमूद गजनवी, औरंगजेब जैसों को आज हम मानवता के ऊपर कलंक ही मानते है। कल्ह के मधेसी इतिहास में इसी प्रकार कुछ कलंकित व्यक्तियों को काला धब्बा के रूप में चित्रित नही किया जाएगा इसका भरोसा कौन दिला सकता है ?