चुनाव की संभाव्यता
नेपाल में राजनीतिक संक्रमणकाल का अन्त कब होगा – कहना मुश्किल है । वैसे तो नेपाली राजनीति में व्याप्त संक्रमणशीलता को अन्त करने की तिथि अगहन ४ को निश्चित कर दी गई है । सवाल उठता है कि क्या इस तिथि में चुनाव होगा – कारण वर्तमान राजनीतिक वृत्त में संलग्न राजनीतिक वैचारिक भिन्नताएं स्पष्टतः दिखाई देती हैं ।
एक पक्षका कहना है कि निर्वाचन जैसे भी होगा । दूसरा पक्ष कहता है कि हम निर्वाचन होने ही नहीं देंगे । कोई तीसरा पक्ष ऐसा भी ही है, जो पर्ूण्ा रूप से बहिष्कार भी करता नहीं दिखाई देता । पर कुछ पार्टियाँ निर्वाचन में सहभागी बनने को तैयार भी नहीं दिखती, चौथा पक्ष निर्वाचन न होने देने का बाधक हैं- प्रमुख पार्टियों द्वारा अपने-अपने भातृ संगठनों से सम्वद्ध क्रियाशील युवाओं का सैन्य दस्ता तैयार करना । सैन्य दस्ते के निर्माण से क्या चुनावी माहौल सहज बन सकता है – यह भी विचारणीय पक्ष है । पाँचवां पक्ष है क्षेत्र निर्धारण के प्रति राजीतिक दलों में असहमति । छठा बाधक पक्ष है- मधेश में मधेशी लोग नागरिकता एवं परिचय पत्र के अभाव में आगामी चुनाव में मतदान करने से वञ्चित हो अनागरिक घोषित किए जाने की सम्भावना । ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है । ऐसी संख्या २३ लाख ७८ हजार है । इतनी बडी संख्या वाली मधेशी जनता को संवैधानिक अधिकार से वञ्चित किए जाने की अवस्था में मधेश में अधिकार प्राप्ति के लिए द्वन्द्व नहीं होगा, इसकी कोई ग्यारेण्टी नहीं । तब क्या होगा – दूसरी ओर स्वतन्त्र मधेश के लिए लडÞ रहे सशस्त्र समूहों के द्वारा एकजूट होकर आगामी निर्वाचन के विरुद्ध आवाज उठाने की धमकियाँ आए दिन पत्रपत्रिकाओं में पढÞने को मिलती हैं । क्या ऐसी अवस्थाओं में आगामी ४ अगहन में चुनाव सम्भव है – इसके प्रति हरेक नेपाली में आशंका होना अस्वाभाविक नहीं है । हिंसा और सैन्य दस्ताओं में होनेवाली भिडन्त की छाया में चुनाव निष्पक्ष एवं भयरहित होगा, ऐसा कहना अदूरदर्शिता होगी । 
किसी भी देश में राजनीतिक स्थिरता लाने के लिए और भावी संविधान निर्माण के लिए चुनाव कराना एक मात्र निर्विकल्प रास्ता है, इसमें कोई दो मत नहीं । अतः आगामी चुनाव को सकारात्मक दिशा में ले जाने के लिए, चुनाव को निष्पक्ष, धांधलीरहित बनाने के लिए, चुनाव के विरुद्ध आवाज उठाने वाले ३३ दलों को, मधेश भूमि में आवाज उठानेवाले सशस्त्र समूहों को तथा मधेश में मताधिकार से वंचित होनेवाली वातों को ध्यान में रख कर सरकार एवं उच्चस्तरीय राजनीतिक समिति को चाहिए कि सभी सम्बन्धित पक्षों से तुरन्त वार्ता द्वारा सहमति में लावें । सबों को सहमित में लाकर चुनाव कराना र्सार्थक होगा । नहीं तो गत संविधानसभा की तरह तारीख पे तारीख बढÞता जाएगा और नेपाल का गणतन्त्रात्मक स्वरुप का अस्तित्व भी खतरे में पडÞ सकता है ।
अतः आज की आवश्यकता है- सब मिलकर अगामी निर्वाचन को सफल कराना । यदि निश्चित तिथि में चुनाव सम्पन्न नहीं हुआ तो जनता इसका सम्पर्ूण्ा दोष राजनीतिक दलों को ही देगी । निर्वाचन राजनीतिक रुपान्तरण करने का सर्वोत्तम साधन है, तर्सथ हरेक नेपाली को चाहिए कि निर्वाचन को सफल, र्सार्थक, निष्पक्ष, भयरहित बनाने के लिए अपने-अपने स्तर पर योगदान दें ।

