विश्व की कोई भाषा मातृभाषा का स्थान नहीं ले सकती : राजदूत अखिलेश मिश्र
5 years ago
नारनौल। विश्व की कोई भाषा मातृभाषा का स्थान नहीं ले सकती। देश, वेश और परिवेश बदलने पर भी मातृभाषा नहीं बदलती। यह कहना है भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और आयरलैंड के मनोनीत राजदूत अखिलेश मिश्र का। मनुमुक्त ‘मानव’ मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा ‘हिंदी की वर्तमान स्थिति और भविष्य की चुनौतियां’ विषय पर आयोजित ‘वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय विचार-गोष्ठी’ में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने कहा कि जिस दिन भारतीय अपनी मातृभाषा हिंदी पर गर्व करने लगेंगे, उस दिन हिंदी का गौरव पूरे विश्व में स्वत: ही बढ़ जाएगा। अटलबिहारी वाजपेई हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल (मध्य प्रदेश) के कुलपति डॉ खेमसिंह डहेरिया ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि हिंदी जनभाषा ही नहीं, जीवंत भाषा भी है। उन्होंने विश्वास प्रकट किया कि हिंदी शीघ्र ही राष्ट्रसंघ की 7वीं आधिकारिक भाषा बनेगी। नॉर्थ कैरोलिना (अमेरिका) की विख्यात लेखिका तथा ‘विभोम स्वर’ पत्रिका की संपादक सुधा ओम ढींगरा ने हिंदी के सम्मुख उपस्थित चुनौतियों की चर्चा करते हुए कहा कि भारतीयों को विदेश में हिंदी के प्रसार की बात करने से पूर्व देश में उसके विकास की चिंता करनी चाहिए।
चीफट्रस्टी डॉ रामनिवास ‘मानव’ के प्रेरक सान्निध्य और डॉ पंकज गौड़ के कुशल संचालन में संपन्न हुई इस महत्त्वपूर्ण और विचारोत्तेजक संगोष्ठी में केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली के सहायक निदेशक डॉ दीपक पांडेय, पोर्ट ऑफ स्पेन (त्रिनिडाड) में भारतीय दूतावास के द्वितीय सचिव डॉ शिवकुमार निगम, लिस्बन विश्वविद्यालय, लिस्बन (पुर्तगाल) के हिंदी
प्रोफेसर डॉ शिवकुमार सिंह, कीव राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, कीव (यूक्रेन) के हिंदी प्रोफेसर डॉ यूरी बोत्विंकिंन, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा विश्वविद्यालय, चेन्नई तमिलनाडु) के कुलसचिव डॉ प्रदीपकुमार सरमा तथा नागरी लिपि परिषद्, नई दिल्ली के राष्ट्रीय महासचिव डॉ हरिसिंह पाल ने, इस अवसर पर, विशिष्ट अतिथि वक्ता के रूप में हिंदी की वर्तमान स्थिति और भावी चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए, कहा कि देश में हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ने के साथ-साथ विदेश में भी उसका वर्चस्व बढ़ा है, जो स्वागत-योग्य है। सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) में हिंदी-विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डाॅ रामनिवास ‘मानव’ ने स्पष्ट किया कि राजकाज और कामकाज से जुड़े बिना हिंदी का समुचित विकास संभव नहीं है।
लगभग अढाई घंटों तक चली इस संगोष्ठी में डॉ एस अनुकृति तथा प्रो सिद्धार्थ रामलिंगम, वाशिंगटन डीसी और डॉ मीरा सिंह, फिलाडेल्फिया (अमेरिका), डॉ पुष्करराज भट्ट, काठमांडू और रचना शर्मा, चितवन (नेपाल), डॉ संध्या सिंह, सिंगापुर सिटी (सिंगापुर), बैजनाथ शर्मा, दोहा (कतर), सुमति करीम, पोर्ट ऑफ स्पेन (त्रिनिडाड), डॉ नूतन पांडेय, डॉ राजीवकुमार रावत, गिरधर शर्मा और संजना सिंह, नई दिल्ली, सौम्य दुबे, चेन्नई (तमिलनाडु), राजेशकुमार सिंह, लखनऊ, कर्नल प्रवीण पुरोहित, नोएडा, डॉ अरविंद उपाध्याय, भदोही, डॉ शंकरलाल शर्मा, धामपुर, डॉ संतोषकुमार शर्मा, अलीगढ़ तथा सविता निगम और अंश निगम, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश), उज्ज्वल राठौड़, शिमला (हिमाचल प्रदेश), नीलम कुलश्रेष्ठ, अहमदाबाद (गुजरात), प्रकाश निर्मल और जयवीर सिंह, पुणे (महाराष्ट्र), शिवकुमार दुबे, डॉ अरुण शुक्ल तथा अभिलाषा शुक्ला, जबलपुर और आशा राठौर, दमोह (मध्य प्रदेश), सुरुचि मिश्र, बिलासपुर (छत्तीसगढ़), डॉ अर्चना झा, रांची (झारखंड), विकास कायत, भिवानी, पुष्पलता आर्य, दादरी तथा डॉ कांता भारती, डॉ जितेंद्र भारद्वाज, विपिनकुमार शर्मा, शर्मिला यादव और हिम्मत सिंह, नारनौल (हरियाणा) आदि की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही।



