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राजनीति में ‘रवीन्द्र मिश्र’ आतंक : लिलानाथ गौतम

 
रवीन्द्र मिश्र, फाईल तस्वीर

लीलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक अगस्त 2021 । साझा विवेकशील पार्टी के अध्यक्ष रवीन्द्र मिश्र ने हाल ही में सामाजिक सञ्जाल द्वारा एक राजनीतिक प्रस्ताव सार्वजनिक किया । सार्वजनिक प्रस्ताव में उन्होंने कहा है कि वर्तमान संघीय व्यवस्था नेपाल के हित में नहीं है, इसको पुनर्संरचना के लिए विचार–विमर्श होनी चाहिए और धर्म निरपेक्षता के संबंध में जनमत संग्रह होनी चाहिए । ‘विचार–विमर्श के लिए’ मिश्र द्वारा दिए गए इस प्रस्ताव को लेकर सिर्फ विवेकशील साझा पार्टी के अन्दर ही नहीं, अन्य राजनीतिक पार्टी और नेताओं के बीच भी काफी बहस शुरु होने लगी है । 

 

विशेषतः गणतन्त्र, संघीयता और धर्मनिरपेक्षता के लिए संघर्ष करनेवाले राजनीतिक शक्तियों के बीच इस प्रस्ताव को लेकर असंतुष्टि है, एक प्रकार से इन लोगों के बीच आतंक मचा हुआ है । हां, मिश्र द्वारा सार्वजनिक प्रस्ताव को लेकर विवेकशील पार्टी के भीतर ही मतान्तर है, बहुसंख्य युवागण इसके विपक्ष में दिखाई दे रहे हैं । यूं कहें तो इस प्रस्ताव को लेकर विवेकशील साझा से अधिक तरंगीत अन्य राजनीतिक पार्टी और नेतागण हैं, उन लोगों के चेहरों पर एक प्रकार का भय दिखाई दे रहा है । इसीलिए वे लोग मिश्र के प्रति तीव्र आक्रोश भी व्यक्त कर रहे हैं । एक प्रकार से राजनीति में स्थापित पार्टी और नेता आखिर क्यों नये–नये राजनीतिज्ञ मिश्र से इस तरह भयभित हो रहे हैं ? मिश्र द्वारा प्रस्तावित एक राजनीतिक प्रस्ताव को लेकर उन लोगों को डर क्यों लग रहा है ? यह विचारणीय प्रश्न है । 

 

विशषेतः नयी राजनीतिक व्यवस्था के लिए संघर्ष करनेवाले राजनीतिक शक्ति मिश्र द्वारा प्रस्तावित विचार से ज्यादा भयभीत हैं । गणतन्त्र, संघीयता और धर्म निरपेक्षता हमारे लिए एक लिए नयी राजनीतिक व्यवस्था है, जिसमें हम लोग अभ्यासरत हैं । लेकिन नयी राजनीतिक व्यवस्था के प्रति आम लोगों में जो वितृष्णा का विकास हो रहा है, उसी को मध्यनजर करते हुए पिछली बार साझा विवेकशील पार्टी के अध्यक्ष मिश्र ने अपना विचार सार्वजनिक किया, जहाँ उन्होंने स्पष्ट कहा कि संघीयता और धर्मनिरपेक्षता के कारण नेपाल का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है, देश के विदेशीकरण होने की संभावना है, खण्डित होने की संभावना है, हमारी धर्म, संस्कृति और मौलिकता नष्ट होते जा रहे हैं, इसीलिए हमें इस विषय पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है । 

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मिश्र द्वारा प्रस्तावित इस प्रस्ताव के पक्ष और विपक्ष में सामाजिक सञ्जाल से लेकर ‘बिग–मीडिया हाउस’ में भी काफी बहस है । बहस में सहभागी लोगों का विचार और तर्क अपना–अपना है । यहाँ बहुसंख्यक ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो इस बहस में सहभागी नहीं हो रहे हैं और वे लोग मिश्र के पक्षधर भी हैं । विशेषतः नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले से जुड़े हुए अधिकांश पुराने नेता–कार्यकर्ता मिश्र के पक्षधर हैं, लेकिन पार्टी की लाइन के कारण वे लोग खुलकर बहस में सहभागी नहीं हो रहे हैं । अगर हो जाते हैं तो ‘परिवर्तन विरोधी’ का आरोप लगने का डर उन लोगों में दिखाई देता है । अनुमान तो यह भी है कि आम जनता और पुराने पार्टी से संबंद्ध कुछ पुराने नेता–कार्यकर्ताओं के इसी मनोभाव को राजनीति में ‘कैश’ करने के उद्देश्य से ही मिश्र ने उल्लेखित प्रस्ताव को सार्वजनिक किया है । 

 

अनुमान यह भी है कि मिश्र द्वारा प्रस्तावित प्रस्ताव उनके ही पार्टी में अल्पमत में पड़नेवाला है । पार्टी सम्बद्ध युवा समूह ने मिश्र को काउन्टर देते हुए विपरित प्रस्ताव में सार्वजनिक किया है । खैर ! इसने राजनीतिक बहस को एक प्रकार से तरंगित बनाया है । जिसने पुनः सवाल खड़ा कर दिया– क्या सच में ही संघीयता और धर्म–निरपेक्षता नेपाल के लिए आवश्यक नहीं है ? क्या यह विदेशी एजेण्डा ही है ? पुरानी राजनीतिक व्यवस्था से पीडि़त और नयी राजनीतिक व्यवस्था के लिए लड़ने वाले बहुसंख्यक लोगों का मानना है कि यह सच नहीं है, संघीयता, गणतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता के लिए नेपाली जनता और विशेषतः युवा वर्ग ने अधिक संघर्ष किया है । उन लोगों का मानना है कि कई चरण के जनआन्दोलन से यह प्राप्त हुआ है । अगर ऐसा है तो आज फिर इसके विरुद्ध आम लोगों में वितृष्णा क्यों बढ़ती जा रही है ? पक्षधर लोगों के लिए यह एक गम्भीर प्रश्न है । 

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यहाँ एक सच उल्लेखनीय है– आज भी नेपाल के अधिकांश गांव में दलित समुदाय के ऊपर होनेवाला सामाजिक विभेद अंत नहीं हुआ है । मधेसी समुदाय को विश्वासयोग्य नेपाली मानने में हिचकने वाले जमात आज भी हैं । राज्य–प्रदत सेवा–सुविधा प्राप्ति में नेता तथा उच्च प्रशासनिक व्यक्तियों की ही वर्चश्व है । परिवारिक सदस्यों को दो शाम की रोटी दिलाने के लिए खाड़ी देशों में जानेवाले युवाओं की संख्या में कोई भी कमी नहीं आई है । नयी राजनीतिक व्यवस्था इस तरह की प्रतिनिधिमूलक आम–जनता की समस्या को सम्बोधन करने में क्यों असफल हो रही है ? इस प्रश्न का जवाब देने में नयी राजनीतिक व्यवस्था को नेतृत्व प्रदान करनेवाले हमारे पुराने नेता असफल हैं । राजनीतिक व्यवस्था तो परिवर्तन हो गई, लेकिन हमारे पुराने नेताओं की मानसिकता और चरित्र में परिवर्तन ना आने के कारण आम जनता में परिवर्तन की अनुभूति नहीं हो रही है । जिसके चलते नयी राजनीतिक व्यवस्था के प्रति कई सवाल खड़ा होने लगा है । उसी में से एक है– विवेकशील साझा पार्टी के अध्यक्ष मिश्र की ओर से सार्वजनिक सवाल । ऐसी अवस्था में खुद को परिवर्तनकारी नेता कहनेवाले लोग मिश्र के प्रति आक्रोश व्यक्त करते हुए कह रहे हैं कि क्या यह समस्या का समाधान है ?

 

मिश्र को भी एक समझना होगा– सैकड़ो वर्ष से राज्य–दोहन करनेवाले राजा और राजतन्त्र की तुलना शिशु गणतन्त्र और संघीयता से नहीं हो सकता । साथ में आम जनता को अधिकार सम्पन्न बनाने के लिए हो एवं राज्य–प्रदत सेवा–सुविधा में आम लोगों की सहज पहुँच स्थापित के लिए ही क्यों ना हो, राजतन्त्र से अधिक बेहतर गणतान्त्रिक व्यवस्था ही है । लेकिन इसके लिए नेताओं की मानसिकता और चरित्र में परिवर्तन आवश्यक है, जो आज नहीं दिख रही है । 

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आम लोग देख रहे हैं– कल प्रजातान्त्रिक एवं राजतन्त्रकालीन व्यवस्था में जो नेता थे, आज भी वही हैं, कल भी वह सत्ता में थे, आज नयी व्यवस्था में भी वहीं सत्ता में है, उन लोगों का चरित्र भी वैसा ही है । यह लोग सिर्फ काठमांडू को नेपाल समझते हैं, अपनी जाति और कार्यकर्ताओं को जनता मानते हैं । समस्या यहीं है । खुद के साथ जुड़े हुए अलग जाति–समुदाय, भाषा–संस्कृति, जीवन पद्धति, कला–कौशल आदि को स्वीकार करने के लिए उन लोगों को मुश्किल हो रही है । भ्रष्ट–संस्कृति का विकास पञ्चायतकाल से भी तीव्र गति से बढ़ता जा रहा है । राज्य का अधिक स्रोत–साधन नेता और कर्मचारियों के भरण–पोषण में खतम हो जाती है । विकास निर्माण के लिए विदेशों से अनुदान और ऋण लेना पड़ रहा है, इसमें भी अधिक रकम भ्रष्टाचार में ही खतम हो जाती है । यह सब ‘ओपन सेक्रेट’ है । ऐसी अवस्था में नयी राजनीतिक व्यवस्था के प्रति आम जनता कैसे आस्थावन हो सकें ?

 

हां, आज की आवश्यकता संघीयता को मजबूत बनाना है, संविधान में उल्लेखित समाजवादी व्यवस्था निर्माण करना है । राज्य का कोई भी धर्म नहीं होता । हर धर्म के प्रति आस्थावान जनता की भावना को संरक्षण करना और सभी धर्मावलम्बी के प्रति समभाव रखना राज्य का दायित्व है । यह सब करने के लिए एकात्मक एवं राजतन्त्रात्मक राज्य व्यवस्था में नहीं, गणतन्त्रतामक राज्यव्यवस्था में सहज है । इसीलिए आज की आवश्यकता व्यवस्था परिवर्तन नहीं है, नेता तथा उनकी चरित्र परिवर्तन का है । अब संघर्ष ही करना है तो इसके लिए संघर्ष होना चाहिए ।

 

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