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शरदपूर्णिमा : पौराणिक एवं प्रचलित कथा

 


इस दिन चन्द्रमा व भगवान विष्णु का पूजन, व्रत कथा पढ़ी जाती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी दिन चन्द्र अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होते हैं।
शरद पूर्णिमा के दिन सुबह उठकर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद किसी पवित्र नदी या कुंड में स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद अपने ईष्टदेव की अराधना करें। पूजा के लिए आसन पर बैठ कर घी का दीपक जला कर, पवित्री, चंदन, शिखा बंधन कर गणेश मन्त्र का पाठ, स्वस्तिवाचन, संकल्प, गणपति पूजन, कलाशस्थापन वरुण पूजन, पँचदेवता पूजन, नवग्रह पूजन विशेष कर चन्द्रमा का पूजन कर एक चौकी पर श्री लक्ष्मी नारायण का पूजन करें और भगवान को गंध, तिल, अक्षत, तांबूल, दीप, पुष्प, धूप, सुपारी और दक्षिणा अर्पित करें। और भगवान के सामने बैठ कर दिन और रात में 108 बार समयानुसार श्री सूक्त का और 108 या 11 बार विष्णुसहस्त्रनाम, कनकधारा, एवं चन्द्र कवच का पाठ एवं हवन करें। रात्रि के समय गाय के दूध से खीर बनाएं और भगवान को भोग लगाएं। रात को खीर से भरा बर्तन चांद की रोशनी में रखकर उसे 12 बजे के बाद या दूसरे दिन ग्रहण करें। यह खीर प्रसाद के रूप में सभी को वितरित करें।
*पौराणिक एवं प्रचलित कथा -*
एक कथा के अनुसार एक साहुकार को दो पुत्रियां थीं। दोनो पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। लेकिन बड़ी पुत्री दिन रात का पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की संतान पैदा होते ही मर जाती थी।
उसने पंडितों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी, जिसके कारण तुम्हारी संतान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक दिन और रात करने से तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है।
उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। बाद में उसे एक लड़का पैदा हुआ। जो कुछ दिनों बाद ही फिर से मर गया। उसने लड़के को एक पाटे (चौकी) पर लेटा कर ऊपर से कपड़ा ढंक दिया। और फिर उसको उसके नीचे सुला दिया और बड़ी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पाटा दे दिया। बड़ी बहन जब उस पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया।
बच्चा घाघरा छूते ही रोने लगा। तब बड़ी बहन ने कहा कि तुम मुझे कलंक लगाना चाहती थी। इस लिए नीचे सुला दिया, मेरे बैठने से यह मर जाता। तब छोटी बहन बोली कि यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है।
उसके बाद नगर में उसने पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।
और तब से इस दिन का यह व्रत प्रचलित व्रत हो गया।
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*हरि ॐ गुरुदेव.. ज्योतिषाचार्य आचार्य राधाकान्त शास्त्री*

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