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छठ पूजा विशेष : आचार्य राधाकान्त शास्त्री* *जानें कौन हैं षष्ठी मैया और कैसे हुई इस देवी की उत्पत्ति ?

 


*आचार्य राधाकान्त शास्त्री* छठ व्रत कथा के अनुसार छठ देवी ईश्वर की पुत्री देवसेना बताई गई हैं। देवसेना अपने परिचय में कहती हैं कि वह प्रकृति की मूल प्रवृति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं यही कारण है कि मुझे षष्ठी कहा जाता है। और मैं प्रकृति शक्ति भगवान भास्कर के साथ मिल कर सम्पूर्ण प्रकृति को धारण किये हैं, और समस्त सजीवों का रक्षण, पालन, पोषण और सबकी सभी संवर्धन कार्य हम दोनो से सम्पादित होता है।

सबके सभी क्षेत्रों का संवर्धन कार्य, सभी जीवों चाहे वो चल हो या स्थिर सबके वंश वृद्धि का कार्यभार हम दोनों के माध्यम से संपादित होता हैं। साथ ही जो भी संतान प्राप्ति की कामना करते हैं वो मेरी सूर्य के साथ विधिवत पूजा करें। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को करने का विधान बताया गया है।

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पौराणिक ग्रंथों में इस रामायण काल में भगवान श्री राम के द्वारा किया गया। और इनके अयोध्या आने के पश्चात माता सीता के साथ मिलकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना किया था।
महाभारत काल में कुंती द्वारा विवाह से पूर्व सूर्योपासना से पुत्र की प्राप्ति से भी इसे जोड़ा जाता है।

सूर्यदेव के अनुष्ठान से उत्पन्न कर्ण जिन्हें अविवाहित कुंती ने जन्म देने के बाद नदी में प्रवाहित कर दिया था, सूर्यदेव के कृपा के कारण वह जीवित रहा। और बाद में सूर्य देव का अनन्य भक्त बने। वे घंटों जल में रहकर सूर्य की पूजा करते थे। मान्यता है कि कर्ण पर सूर्य की असीम कृपा हमेशा बनी रही। इसी कारण लोग सूर्यदेव की कृपा पाने के लिये भी कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना करते हैं।
छठ पूजा का पर्व चार दिनों तक चलता है।
छठ पूजा का पहला दिन नहाय खाय:-

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छठ पूजा का दूसरा दिन खरना:-

षष्ठी पूजा का तीसरा दिन:-
इस दिन छठ पूजा के लिए घाटों की तैयारी करना, सजना और प्रसाद बनाया जाता है। इसमें ठेकुआ या टिकरी विशेष होता है। इस पूजन में तात्कालिक उस ऋतु में उत्पन्न होने वाले समस्त वनस्पति के साथ साथ लड्डू पेड़ा, पान सुपारी नारियल आदि अर्घ्य पात्र में सजाएं जाते हैं। प्रसाद व फल लेकर धातु या बांस की टोकरी में सजाये जाते हैं। टोकरी की पूजा कर सभी व्रती सूर्य को अर्घ्य देने के लिये तालाब, नदी या घाट आदि पर बैठ कर पूजन करते हैं। इस वर्ष स्नान पूजन कर डूबते सूर्य की सायंकालीन अर्घ्य सायं 4:25 से 5:15 तक दिया जाएगा। फिर रात्रि में कौशिकी (कोशी) देवी की आराधना कर कर
रात्रि शेष यानि सप्तमी को सुबह 6:28 से सूर्योदय के समय प्रातः अर्घ्य उपासना की प्रक्रिया को दोहराया जाएगा। और इस प्रकार विधिवत पूजा कर प्रसाद बांटा जाएगा। इस तरह छठ पूजा संपन्न की जाती है।
प्रकृति माता षष्ठी देवी और भगवान भास्कर अपने सभी व्रतियों के सुख सौभाग्य, सन्तति सन्तान, आयु आरोग्यता, नौकरी आजीविका, सुख साम्राज्य सम्पन्नता बनाये रखें।
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*हरि ॐ गुरुदेव..!*
*ज्योतिषाचार्य आचार्य राधाकान्त शास्त्री*
*आवश्यक संपर्क एवं व्हाट्सएप नं.- 7004427683*
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