दृष्टिबाधित सुनील कुमार ने रचा नया इतिहास, प्राप्त की पीएचडी (हिंदी) की उपाधि
नारनौल। भांडोर नीची में जन्मे तथा वर्तमान में हाउसिंग बोर्ड़, सैक्टर-1, नारनौल निवासी सुनील कुमार ने जन्मजात और शत-प्रतिशत दृष्टिबाधित होते हुए भी, अनेक बाधाओं के बावजूद, सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) से ‘डॉ रामनिवास ‘मानव’ की काव्य-यात्रा : एक विवेचन’ विषय पर पीएचडी (हिंदी) की उपाधि प्राप्त कर एक नया इतिहास रचा है। यह कार्य सरल नहीं था, लेकिन सुनील कुमार ने सिद्ध कर दिया है कि यदि दृढ़ इच्छा-शक्ति और पक्का इरादा हो, तो सभी बाधाओं के बावजूद लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। पिता फूलचंद शर्मा को अपना आदर्श मानने वाले सुनील कुमार को संघर्ष का जज्बा अपने पिता से ही प्राप्त हुआ था। उल्लेखनीय है कि इनके पिता भारतीय थल सेना में रहे तथा 1962, 1965 और 1971 के तीन युद्धोंमें भाग लिया। 1965 के युद्ध में बुरी तरह घायल होने के कारण वह मेडिकल बोर्ड की सिफारिश पर पेंशन आ गए थे, किंतु 1971 में भारत सरकार ने आपातकालीन स्थिति में उन्हें वापस बुलाया तथा उन्होंने निर्णायक लड़ाई लड़ी।
एमए (हिंदी), एमफिल् और बीएड् की उपाधियां प्राप्त सुनील के साथ चुनौतियां प्रारंभ से ही जुड़ गई थीं। बचपन में बच्चे इन्हें चिढ़ाते थे, तो बड़े लोग हतोत्साहित करते थे। 10वीं और 12वीं की परीक्षा में रीडर की लापरवाही के कारण इन्हें असफलता का मुंह देखना पड़ा। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से पंचवर्षीय एलएलबी की प्रवेश-परीक्षा की प्रथम मेरिट लिस्ट में नाम आने पर भी, फीस न भर पाने के कारण, यह प्रवेश नहीं ले सके। इसके बावजूद सुनील ने कभी हिम्मत नहीं हारी और दोगुनी शक्ति से आगे बढ़ते रहे। पीएचडी के दौरान भी बड़ी परेशानियां उठानी पड़ीं। पहले शोध-निर्देशक को यूजीसी द्वारा निर्धारित योग्यता पूरी ने होने के कारण बदलना पड़ा। दूसरे शोध-निर्देशक ने स्वीकृति देकर भी शोध-प्रबंध पर हस्ताक्षर करने से यह कहकर मना कर दिया कि तुम तो ब्लाइंड हो, तुम थीसिस कैसे लिख सकते हो। लाख अनुनय-विनय करने पर भी उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किए, तो सुनील कुमार को डॉ सरोज चौधरी के निर्देशन में अपना शोध-प्रबंध प्रस्तुत करना पड़ा। इस सबके चलते दो वर्ष का समय तो अधिक लगा ही, खर्चा भी बहुत बढ़ गया।
इस विशिष्ट उपलब्धि का संपूर्ण श्रेय अपने परिजनों और पत्नी संयोगिता के अतिरिक्त शोध-निर्देशक डॉ सरोज चौधरी, विख्यात कवि डॉ रामनिवास ‘मानव’ और विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ उमाशंकर यादव को देते हुए सुनील कुमार कहते हैं कि इनके सहयोग और मार्गदर्शन के बिना मेरे लिए मंजिल तक पहुंचना संभव नहीं था। अतः मैं इन सबका सदैव आभारी रहूंगा। उल्लेखनीय है कि ब्रेल लिपि, हिंदी भाषा, संगीत और गायन का अच्छा ज्ञान रखने वाले सुनील कुमार सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय रहते हैं।



