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मधेस प्रदेश हीं क्यों ? : अजय कुमार झा

 

 स्वर्गीय रामराज बाबू सिंह को तात्कालीन राजा ने, ‘ तेरो मधेसको अवस्था छ’? उपेक्षित करके पूछा था

 

अजय कुमार झा, जलेश्वर । संघीय गणतन्त्र नेपाल के प्रदेश नम्बर दो का नामकरण के लिए सीधा और स्पष्ट नाम ‘ मधेश ‘ है। अर्थात् मधेश प्रदेश। 2063 साल से अबतक के आंदोलन में नेपाल के आकाश में नारा गूंज रहा है वह ‘ जय मधेश ‘ का नारा है। जय मधेश शब्द और उसके ऊर्जा से यहां का बच्चा बच्चा उर्जायित है। यह वाक्यांश यहां के जमीन और आकाश में गुंजायमान है। सूरज और चांद भी खुदको मधेसी सूरज और मधेसी चंदा कहलाना पसन्द करते हैं। मधेश शब्द किसी व्यक्ति के द्वारा योजना बद्ध तरीके से गढ़ा गया शब्द नहीं है। यह तो कालखण्ड में परिस्थिति बस स्वतःस्फूर्त रूप में नेपाल के आम जन मानस के अंतःकरण से प्रस्फुटित हुआ एक विशाल भूखण्ड के अस्तित्व का संबोधन है।

     नेपाली साहित्य में वि पि कोइराला के कथाओं में मधेश के नाम से अनेक स्थानों पर चर्चाएं मिल जाएंगी। ‘ मधेश तिर’ नाम के लोकप्रिय कथा ही मिल जाएगा। इस प्रकार से लाखों ऐसे दस्तावेज मिलेंगे जो मधेश के नाम से सुरक्षित है। सन् 1816 के सुगौली सन्धी के पहले जो मधेस शब्द सम्मानजनक भावों से लिया जाता था वही मधेश शब्द अब षडयंत्रपूर्ण ढंग से लिया जाने लगा है। इसमें राजा महेंद्र से लेकर आज तक के सभी नेता और शासक वर्ग का योजना बद्ध योगदान है।
     स्वर्गीय रामराज बाबू सिंह को तात्कालीन राजा ने, ‘ तेरो मधेसको अवस्था छ’? उपेक्षित करके पूछा था। उस वक्त भी मधेस शब्द का ही प्रयोग किया गया था। तो फिर इस बीच में जानकी, मिथिला, जनक आदि शब्द किसने और क्यों घुसाया? अवश्य ही कोई जातीय अथवा बिकाऊ षड़यंत्र होना चाहिए। खासकर मधेस बाहेक के नाम के साथ धर्म और जातीयता जुड़े होने के कारण अन्य जात और धर्म के मधेसियों के साथ दोहरा मापदंड अपनाने की मानसिकता हो सकती है। सैकड़ों वर्षों से खस षडयंत्र में फसे मधेसियों के लिए यह एक विशेष अवसर भी है। हम सभी जानते हैं कि वर्तमान का आठ जिला ही मधेश नही है। यह भी एक षडयंत्र ही था, लेकिन आठ जिला भी पहाड़ी शासक को खटकने लगा है। संघियता के विरुद्ध पहाड़ और काठमांडू से आवाजे बुलंद होने लगा है। फिर मधेश के 24 जिला जो भविष्य में एक मजबूत मधेश प्रदेश का अंग बनेगा उसके स्वागत के लिए भी तो इस प्रदेश का नाम मधेश ही रखा जाना चाहिए। मधेश शब्द का विरोध निश्चित रूप से कोई भी मधेसी सपूत और बलिदानी पुरुष नहीं करेगा। यह सारा का सारा षडयंत्र मधेश विरोधी ताकतें जो मधेश में अपनी जड़े जमाए हुए है; उनका ही काम है।

     आजकल दक्षिण एशियाई देशों में भाषिक राष्ट्रीयता के लिए आंदोलन जोड़ों पर है। उसी का अवशेष कुछ मुट्ठीभर षडयंत्रकारियों के द्वारा मधेसी आंदोलन तथा मुद्दा को इतिहास से नष्ट करने के लिए लादने का प्रयास किया जा रहा है। जिस प्रकार पूरे मधेश और पहाड़ के साथ साथ समग्र नेपाल को जोड़नेवाला एकमात्र हिंदी भाषा के विरुद्ध तथाकथित बिकाऊ मैथिली भाषा अभियानियों के द्वारा खस सरकार के निर्देशन में भ्रम फैलाया गया है ठीक उसी प्रकार आज मधेस प्रदेश के नाम पर भी भ्रम पैदा किया जा रहा है। बीरगंज और जनकपुर बीच के सौहार्दपूर्ण वातावरण को वैमानश्यता में बदलकर आपसी द्वंद्व में फसाने का चक्रव्यूह रचा जा रहा है। मैथिली और भोजपुरी बीच का संभावित टकराव भी इस मधुरता में खटास पैदा कर रहा है। मैथिली भाषा को मधेश के प्रमुख भाषा तथा सरकारी कामकाज के भाषा का दर्जा दिलाने के चक्कर में प्रयोग किए क्षुद्रता और अहंकारयुक्त वाक्यांशो के कारण ही आज मैथिली भाषा को कमजोर करने के लिए बज्जिका, अवधि, भोजपुरी और मगही भाषको आगे बढ़ाया जा रहा है। इसके पीछे भी उसी शक्ति का हाथ है जो हिंदी को समाप्त करने के लिए मैथिली भाषी को उपयोग में लाया है। इस जनगणना में सारे के सारे मूढ

अभियानियों के हैकड़ी गुम होनेवाला है। जातीयता प्रमुख मुद्दा के रूप में स्थापित हों चुका है। भुराबाल के दृष्टि से मधेश को न देखने का हिदायत दिया जा चुका है। तो परिणाम स्पष्ट है; मधेस जातीय और धार्मिक चक्रव्यूह में फसकर मरुभूमि होने ही वाला है। फिर न मैथिली अभियानी बचेंगे न मगही – भोजपुरी! बस, एक रोता बिलखता इतिहास बचेगा और अपनी ही मूढ़ संतानों के रक्त से रंजित तड़पता हुआ मधेस भूमि।
     विदेशी और बाहरी के इशारों पर अपनो के साथ किया गया दुर्व्यवहार महाविनाश का कारण बनता है। इसके भीषण प्रतिक्रिया में बुद्ध, कृष्ण, राम और गांधी जैसों को भी झुलसना पड़ता है। ऊंच और नीच जाती के नाम पर किया गया भेदभाव और घृणा भी घोर असभ्यता का द्योतक है। हमें इसका भी मधेस और मधेसी के भीतर से निकाल फेंकना होगा। आज हम मानव इतिहास के जिस मोड़ पर खड़े हैं वहां छुआछूत प्रथा जैसे अमानवीय व्यवहार तथा संस्कृतियों के लिए कोई स्थान नहीं है। समूचे विश्व आज एक गांव में परिणत हो चुका है; ऐसी स्थिति में हम किसी से भी दूरी नहीं बना सकते। हमें हर हाल में एक उच्च मानवीय संवेदनाओं के आधार पर समझदारी कायम करना होगा। आपसी तालमेल को हार्दिकता रूपी चादर में संजो कर भावी पुस्ताको संस्कार में देना होगा। सबका साथ सबका विकास के मंत्र को हृदयंगम करना होगा। और इसके लिए हम आम नागरिकों को ही आगे आना होगा।
      वीर सपूत मधेसी शहीदों के सपना और भावनाओं को सम्मान करते हुए मधेस को एक सुंदर, सौम्य और समृद्ध राज्य के रूप में शृंगारना होगा। मधेस के सरलता और भौतिक सौम्यता के कारण अमरावती बनाने में कुछ वर्ष ही लगेंगे। यहां के कर्मठ युवाओं को विकास के पथ पर अग्रसर होने के लिए किसी के प्रेरणा की नहीं सिर्फ अवसर की आवश्यकता है। इनके फौलादी हाथों को किसी में रोकने का दम नही है। जो मरुभूमि से तेल निकाल सकते हों, रेत से स्वर्ण निकाल सकते हो, चट्टान को चीरकर सड़के निर्माण कर सकते हों; उनके लिए इस कोमल और सुंदर भूमिको संवारना तो चुटकी का खेल भर है। आवश्यकता है तो बस अवसर का। शहीद के सपनों को पूरा करना अपने जीवन को सफल बनाने के साथ साथ महान आत्माओं का सम्मान भी है। अन्यथा हम नालायक कहलाएंगे। अपने ही शहीदों, पूर्वजों और युवाओं के सामने तुच्छ तथा कुपात्र के भागी माने जाएंगे। अतः भाषाई विवाद, जातीय भेदभाव तथा राजनीतिक षड़यंत्र को त्यागकर समस्वरता और हार्दिकता के साथ आगे बढ़ते रहना ही हम मधेसियो का एक मात्र सामूहिक लक्ष्य होना चाहिए।
जय मधेस!

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