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वरिष्ठता टूटी, परंपरा पर सवाल: चौथे नंबर के जज मनोज शर्मा बने नेपाल के अगले प्रधान न्यायाधीश !

 

काठमांडू, 7 मई 026। नेपाल की न्यायपालिका में पहली बार ऐसी घटना हुई है, जिसने संवैधानिक परंपरा, न्यायिक स्वतंत्रता और सत्ता की मंशा—तीनों पर एक साथ बहस छेड़ दी है। नेतृत्व वाली संवैधानिक परिषद् ने सर्वोच्च अदालत के प्रधान न्यायाधीश पद के लिए वरिष्ठता क्रम को तोड़ते हुए चौथे वरीयता क्रम के न्यायाधीश का नाम सिफारिस किया है।

इस निर्णय के साथ ही कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश का देश की पहली महिला प्रधान न्यायाधीश बनने का सपना टूट गया। नेपाल के न्यायिक इतिहास में इसे केवल एक नियुक्ति नहीं, बल्कि स्थापित न्यायिक परंपरा को चुनौती देने वाले कदम के रूप में देखा जा रहा है।

क्या हुआ संवैधानिक परिषद् की बैठक में?

बृहस्पतिवार को हुई संवैधानिक परिषद् की बैठक में सर्वोच्च अदालत के प्रधान न्यायाधीश पद के लिए न्याय परिषद् द्वारा भेजे गए छह नामों में से डॉ. मनोज कुमार शर्मा को चुना गया।

इस सूची में वरिष्ठता क्रम के आधार पर सबसे ऊपर सपना प्रधान मल्ल का नाम था। उनके बाद कुमार रेग्मी, हरिप्रसाद फुयाल और चौथे स्थान पर मनोज शर्मा थे। लेकिन परिषद् ने परंपरागत वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए शर्मा को आगे बढ़ाया।

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यदि संसदीय सुनुवाइ समिति से उनका अनुमोदन हो जाता है, तो वही नेपाल के अगले प्रधान न्यायाधीश होंगे।

क्यों खास है यह फैसला?

नेपाल में अब तक प्रधान न्यायाधीश नियुक्ति के दौरान “वरिष्ठतम न्यायाधीश” को प्राथमिकता देने की परंपरा रही है। संविधान में यह बाध्यता भले स्पष्ट रूप से न हो, लेकिन न्यायपालिका के भीतर इसे संस्थागत मर्यादा माना जाता रहा है।

नेपाल के संविधान की धारा 129 के अनुसार, सर्वोच्च अदालत में कम-से-कम तीन वर्ष न्यायाधीश रह चुका व्यक्ति प्रधान न्यायाधीश बनने के योग्य होता है। यानी संवैधानिक रूप से केवल वरिष्ठता ही एकमात्र आधार नहीं है।

लेकिन सर्वोच्च अदालत स्वयं कई फैसलों में यह स्पष्ट कर चुकी है कि प्रधान न्यायाधीश चयन में “वरिष्ठता और योग्यता” दोनों को आधार बनाया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की पुरानी व्याख्या क्या कहती है?

नेपाल के न्यायिक इतिहास का चर्चित मामला “अधिवक्ता अच्युतप्रसाद खरेल बनाम संवैधानिक परिषद्” इस बहस का सबसे बड़ा आधार माना जाता है।

उस फैसले में सर्वोच्च अदालत ने कहा था—

“प्रधान न्यायाधीश नियुक्ति में वरिष्ठता की उपेक्षा नहीं की जा सकती। यदि किसी वरिष्ठ न्यायाधीश को छोड़कर कनिष्ठ को चुना जाता है, तो उसके स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ कारण होने चाहिए।”

अदालत ने यह भी कहा था कि बिना ठोस कारण वरिष्ठता तोड़ना संविधान और विधि शासन की भावना के खिलाफ होगा।

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इसी तरह २०७५ के “सन्तोष भण्डारी बनाम संवैधानिक परिषद्” मामले में भी अदालत ने चेतावनी दी थी कि यदि वरिष्ठता की स्थापित संवैधानिक परंपरा तोड़ी जाती है, तो न्यायपालिका में “राजनीतिक वफादारी” की संस्कृति पैदा हो सकती है, जिससे न्यायिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी।

कौन हैं सपना प्रधान मल्ल?

नेपाल की सबसे चर्चित महिला न्यायविदों में गिनी जाती हैं।

उन्होंने लगभग तीन दशक तक कानून के क्षेत्र में काम किया है और साढ़े नौ वर्ष से अधिक समय सर्वोच्च अदालत की न्यायाधीश के रूप में बिताया।

साल 1989 में उन्होंने कॉर्पोरेट वकील के रूप में करियर शुरू किया था और उस दौर की सफल एवं अधिक कमाई करने वाली महिला वकीलों में उनकी गिनती होती थी। लेकिन महिलाओं के खिलाफ कानूनी भेदभाव देखने के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय की राह चुनी।

उन्होंने 1995 में “फोरम फॉर वुमन, लॉ एंड डेभलपमेन्ट” की स्थापना की और महिला अधिकार, लैंगिक न्याय तथा सामाजिक समानता के मुद्दों पर सक्रिय संघर्ष शुरू किया।

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वह से जनप्रशासन में स्नातकोत्तर कर चुकी हैं। इसके अलावा नेपाल लॉ क्याम्पस और से भी कानून की पढ़ाई की है।

उन्होंने संविधानसभा सदस्य, वरिष्ठ अधिवक्ता, संयुक्त राष्ट्र यातना विरोधी समिति की विशेषज्ञ सदस्य तथा महिला अधिकार से जुड़े कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी काम किया है।

सर्वोच्च अदालत में रहते हुए उन्होंने लैंगिक न्याय, घरेलू हिंसा और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े कई ऐतिहासिक फैसले दिए।

सत्ता बनाम न्यायपालिका?

इस निर्णय के बाद नेपाल में राजनीतिक और कानूनी हलकों में बड़ा प्रश्न उठ खड़ा हुआ है—क्या यह केवल “योग्यता आधारित चयन” है या फिर न्यायपालिका में सत्ता की पसंद को स्थापित करने की कोशिश?

आलोचकों का कहना है कि यदि वरिष्ठता की परंपरा बिना स्पष्ट कारण तोड़ी जाती है, तो इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। वहीं सरकार समर्थक पक्ष इसे “योग्यता और क्षमता” को प्राथमिकता देने वाला कदम बता रहा है।

लेकिन इतना तय है कि यह फैसला आने वाले दिनों में नेपाल की न्यायपालिका, राजनीति और संवैधानिक बहस का केंद्र बनने वाला है।

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