कहां गए वो रंग गुलाल… : मनीषा मारू
कहां गए वो रंग गुलाल…

प्रेम– कंचन जो बर्षा करता,
कल–कल हरपल अपनो के द्वार।
जब भी झड़ता किसीके दर्द का मोती,
सबकी चंदन काया बिखर के रोती।
चलती जहां भी खुशियों की पुरवाई,
हर दिल में झट से बज ही जाती थी शहनाई।
एक ही अगनें मे इक्ट्ठी धूम थी मचती।
लबों पे मधुर–मीठी मुस्कानें सबके सजती।
खिल जाता था घर का हर कोना,
सब बच्चों का लगता जहां एक ही बिछौना।
सतरंगी रंगो में सब मिल एक हो जाते,
नैन मिलते ही प्रीत–बागीचे खिल जाते।
खामोश हिय करता हैं अधीर सवाल।
उड़ता क्यों ना अब वो अन्तर्मन स्नेह गुलाल!
बिखरा मन भी करता पुकार,
कहां लुप्त हुवे वो प्रेम–उत्साह दरबार।
मन के सारे उलझें धागों को सुलझाकर,
सबके जीवन में बसंत कालीन बिछ जाए खुलकर।
हृदय से करे हम सदा राग, द्वेश, इर्ष्या का हवन,
निश्चित ही होगा फिर सबके गमगीन गमों का दहन।
मनीषा मारू
नेपाल

नेपाल

