हार नहीं मानी है निहारिका राजपुत : अंशु कुमारी झा

अंशु कुमारी झा, हिमालिनी अंक मार्च । सत्युग में भी जब महाभारत की कुन्त बिन ब्याही मां बनी थी तो वह भी उस भार को सहन नहीं कर पाई थी और बच्चे का परित्याग कर दिया था । हमारे समाज में बिना ब्याह का मां बनना घोर अपराध माना जाता है, या तो उस मां–बच्चे को जिन्दगी भर समाज का ताना सहना पड़ता है या उसे जीवन का अन्त ही कर लेना पड़ता है । अर्थात समाज में बिना पिता के बच्चों के साथ बहुत अभद्र व्यवहार किया जाता है । यह स्थिति बहुत भयानक होती है । फिर भी निहारिका बहुत हिम्मत जुटाकर बिन ब्याही मां बनी । बच्चे को जन्म दिया ।
जी हां, निहारिका राजपुत वह लड़की है जिसको एक दरिंदे ने एक महीने तक अपने घर में कैद करके रखा और उसके साथ बलात्कार करता रहा । निहारिका रोती रही, चिल्लाती रही, परन्तु उस राक्षस को उस पर थोड़ी सी भी दया नहीं आई । जब उस राक्षस का उससे मन भर गया तो उसे वह घर से बाहर फेंक आया । निहारिका उस भयानक घटना से बहुत डर गई थी परन्तु उसे क्या पता, उस निर्दोष बच्ची के ऊपर उससे भी बड़ा पहाड़ टूटने वाला था । कुछ महीने के बाद निहारिका को पता चला कि वह गर्भवती हो गई है । अब हम समझ सकते हैं कि इतनी बड़ी बात जब उस बच्ची को पता चला जिसने गलती की ही नहीं थी तो उस पर क्या बीती होगी ?
निहारिका बहुत हिम्मत वाली लड़की है । वैसे धर्म तथा विज्ञान ने भी यह साबित किया है कि नारी बहुत हिम्मत वाली होती है । नारी में जन्म से अपने चारों तरफ के नकारात्मक परिवेश से लड़ने की पुरुषों की अपेक्षा अधिक क्षमता होती है । नारी तब तक संघर्ष करती रहती है जब तक वह पूर्णरूपेण टूट नहीं जाती । वह संघर्ष चाहे पारिवारिक स्तर पर हो, सामाजिक स्तर पर हो या राष्ट्रीय स्तर पर हो । नारी तब तक आत्मसमर्पण नहीं करती है जब तक उसका हृदय छलनी न हो जाय । नारी लड़ती है परिवार से, परिवार को जोड़कर रखने के लिए । नारी लड़ती है समाज से अपनी प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के लिए । इसी का एक जीता जागता उदाहरण है निहारिका राजपुत ।
निहारिका ने उस दरिंदे के परिवार से गुहार लगाई कि मैं आपके बेटे की बच्चे की मां बनने वाली हूं, मेरे साथ इन्साफ कीजिये परन्तु उस राक्षस का परिवार भी तो राक्षस ही होगा न । उनलोगों ने निहारिका पर दोषारोपण करते हुए पल्लु झाड़ लिया । निहारिका में भी नारी शक्ति जागी, मां की ममता ने उसे अपने बस में कर लिया और उसने बच्चे को जन्म देने के लिए खुद को तैयार कर लिया । निहारिका ने ठान लिया कि वह बच्चे को जन्म देगी और उस अपराधी के खिलाफ भी आवाज उठाएगी । उसके इस निर्णय को निहारिका के माता–पिता ने भी समर्थन किया और उसका साथ दिया । निहारिका ने अपराधी के खिलाफ जनकपुर जिला अदालत में मुकदमा दायर किया । उक्त मुकदमा का नतीजा आते–आते दो ढाई साल लग गए । इसी बीच निहारिका ने एक बेटे को जन्म दिया जो बच्चा फिलहाल उसके जीने का और समाज तथा प्रशासन से लड़ने का साहस बन गया है ।
निहारिका अदालत से सकारात्मक नतीजे की अपेक्षा कर रही थी परन्तु जहां का समाज और प्रशासन अन्धा, बहरा और संवेदनहीन हो उसे किसी निर्दोष की वेदना भरी पुकार कहां सुनाई देती है । अदालत ने उस अपराधी के पक्ष में नतीजा दिया । एकबार फिर से निहारिका कुछ पल के लिए टूटी, रोयी, चिल्लाई पर सुनने वाला कौन है । उसने प्रदेश सरकार को गुहार लगाई, मिडिया को अवाज दी, सबसे रो–रो कर न्याय के लिए झोली फैलाई । निहारिका का बहुतों ने हिम्मत बढ़ाया । उसके साथ खडेÞ हुए । उसने फिर से हिम्मत जुटाई और उच्च अदालत में मुकदमा करने की सोच बनाई । वह हारी नहीं है क्योंकि वह एक बिन–ब्याही मां है । निहारिका लड़ेगी और वह तब तक लड़ेगी जब तक उस अपराधी को सजा नहीं मिल जाती ।
समाज में इस प्रकार के अपराधी तथा अपराधिक गतिविधि को जगह देना भी एक बहुत बड़ा अपराध है । आज निहारिका के साथ इस प्रकार की घटना हुई कल किसी और की बेटी तो परसो किसी और बच्ची के साथ यह हो सकता है । हम सभी को इस विषय पर सजगता से ध्यान देने की आवश्यकता है । हमारी बेटी हमारे लिए बहुत मायने रखती है । बेटी हमारी शान है, मान है, और अभिमान है । परिवार, समाज और राष्ट्र की प्रगति में बेटी का भी योगदान महत्वपूर्ण है । तो आइए हम सभी निहारिका के हिम्मत को सराहते हुए उसका साथ दें और अपराधी को संरक्षण नहीं सजा दिलाएँ ।

