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न्याय द्रौपदी के चीर की तरह लंबा नहीं होना चाहिए : एन.वी. रमन (भारत के मुख्य न्यायाधीश))

 

न्याय का भारतीयकरण : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

*डॉ. वेदप्रताप वैदिक*।भारत के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमन की अध्यक्षता में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे कई फैसले किए हैं, जिनसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सम्मान में वृद्धि हुई है। उन्होंने तमिलनाडु के उच्च न्यायालय भवन की नींव रखते समय जो भाषण दिया, उसमें उन्होंने अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। वह है— भारत की न्याय-व्यवस्था के भारतीयकरण का। यह मुद्दा उठाने के पहले उन्होंने कहा कि हमारी अदालतों का आचरण ऐसा होना चाहिए, जिससे आम जनता के बीच उनकी प्रामाणिकता बढ़े। उनके फैसलों में कानूनों को अंधाधुंध तरीके से थोपा नहीं जाना चाहिए। न्याय सिर्फ किताबी नहीं होता। उसका मानवीय स्वरूप ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इसी तरह न्याय द्रौपदी के चीर की तरह लंबा भी नहीं होना चाहिए। अब भी देश की अदालतों में लगभग 5 करोड़ मुकदमे लटके हुए हैं। कई मुकदमे 30-30, 40-40 साल तक चलते रहते हैं। उन्हें लड़नेवाले लोग और वकील भी कई मामलों में दिवंगत हो चुकते हैं। यह इंसाफ नहीं, इंसाफ का मज़ाक है। न्यायमूर्ति रमन ने बताया कि देश में 1104 जजों के पद हैं लेकिन उनमें से 388 अभी भी खाली पड़े हैं। उन्होंने विधानपालिका और कार्यपालिका द्वारा किए गए अतिक्रमणों का भी जिक्र किया। न्यायाधीशों को इन मामलों में नागरिकों का हित सर्वोपरि रखना चाहिए और सरकार, संसद व विधानसभाओं से कोई मुरव्वत नहीं करनी चाहिए। उन्होंने हमारी न्याय-व्यवस्था के भारतीयकरण का बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा भी अपने भाषण में उठा दिया। भारतीयकरण का अर्थ क्या है? यही है कि हमारा कानून आजादी के 75 साल बाद भी मूलतः औपनिवेशिक ढर्रे पर चल रहा है। अंग्रेज के बनाए हुए कुछ कानून हमारी सरकारों ने रद्द जरुर किए हैं लेकिन अभी भी वही पुराना ढर्रा चला आ रहा है। देश के सभी लोगों के लिए एक-जैसा कानून कब बनेगा? पहली बात तो यह है कि हमारे उच्च न्यायालयों में बहस और फैसले प्रादेशिक भाषाओं में क्यों नहीं होते? उसके लिए हमारे कानून पहले प्रादेशिक भाषाओं में ही बनने चाहिए। न्यायमूर्ति रमन ने कहा है कि आज के यांत्रिक मेधा के युग में अनुवाद की प्रक्रिया इतनी सरल हो गई है कि यह सुविधा आसानी से प्रदान की जा सकती है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस संबंध में पिछले दिनों अच्छी पहल की थी। यदि हमारे कानून संसद में मूल रूप से हिंदी में बनने लगें तो सभी भारतीय भाषाओं में उनका अनुवाद काफी सरल हो जाएगा। यदि न्याय-व्यवस्था का हमें भारतीयकरण करना है तो सबसे पहले उसे अंग्रेजी के शिकंजे से मुक्त करना होगा। इस समय भारत की न्याय-व्यवस्था जादू-टोना बनी हुई है। इसीलिए वह ठगी, विलंब और अन्याय का शिकार भी होती है। क्या देश में कभी कोई ऐसी सरकार भी आएगी, जो सचमुच न्याय व्यवस्था का भारतीयकरण कर सकेगी।

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