चुनाव आ गया, सोचिए वोट किसे देंगे ? -लिलानाथ गौतम

लिलानाथ गौतम/– हिमालिनी अप्रील 2022 अंक से
लगभग एक महीने के भीतर (वैशाख ३० गते) देश में स्थानीय चुनाव होने जा रहा है । घोषित चुनाव को लक्षित कर विभिन्न राजनीतिक पार्टी के नेता–कार्यकर्ता गांव–गांव पहुँच चुके हैं, जो अपने–अपने पक्ष में वकालत करते हुए आम जनता से वोट मांग रहे हैं । पार्टी जो भी हो, चुनाव को लक्षित कर आम जनता के घर–आंगन में पहुँचनेवाले नेता–कार्यकर्ताओं की बात में एक समानता होती है । वह है, उन लोगों का आश्वासन ।
चुनाव के समय में हर पार्टी के नेता मतदाताओं की आकांक्षा और भावना को देख कर ऐसे आश्वासन देते हैं, जिससे वे लोग वोट प्राप्त कर सके । सामान्यतः सभी पार्टी के उम्मीदवार कहते हैं कि अगर वे लोग चुनाव जीत जाते हैं तो आप लोगों के घर–आंगन के स्वरूप में परिवर्तन आ जाएगा, बाल–बच्चों को शिक्षा और रोजगारी की सुनिश्चितता होगी । अगर मतदाताओं का निश्चित समूह अपने पक्ष में आने की संभावना रहती है तो उनके चरित्र और आवश्यकता अनुसार दारु–पानी की व्यवस्था भी हो जाती है । कहीं तो नोटों की बारिश भी की जाती है । संक्षेप में कहे तो हमारे यहां चुनावी अभ्यास ऐसा है, जहां उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए शाम, दाम, दण्ड सभी प्रकार की नीति अवलम्बन करते हैं ।
यहां एक और सच्चाई भी है, चुनावी माहौल में वोट मांगते हुए दिखाई देनेवाले प्रायः हर चेहरा पुराना ही होता है । सामान्तयः पाँच साल पहले जो पात्र वोट मांगते हुए और आश्वासन देते हुए गांव–घर में आए थे, फिर वही पात्र, वही पुराने आश्वासन लेकर गांव आ जाते हैं । पाँच साल पहले जो आश्वासन दिया गया था, उसमें से आज कितना पूरा हुआ है ? हमारे ही वोट से चुनाव में जीत कर गांवापालिका, प्रदेशसभा और संघीय संसद् में पहुँचनेवाले नेताओं ने इस पाँच साल की अवधि में क्या–क्या किया है ? क्या हम लोग इस प्रश्न का उत्तर जानते हैं ? सामान्यतः नहीं । फिर भी हम कहते हैं– जिसको भी वोट दें, कुछ भी होनेवाला नहीं है !
हां, एक बात तो सच है कि आज तक हम लोगों ने जिसको भी वोट देकर चुनाव में जिताया है, अपवाद के अलावा उनमें से किसी ने भी आम जनता को केन्द्रबिन्दू में रख कर काम नहीं किया है । जो भी चुनाव जीत जाते हैं, उन लोगों का मुख्य उद्देश्य राज्य–कोष का दोहन करना होता है । आज बैंकिङ चैनल में रुपयों का अभाव जो हो रहा है, इसमें प्रमुख कारण यही है । बैंकिङ चैनल में पैसा अभाव होने के अनेक कारण है, लेकिन विज्ञों का मानना है कि उसमें से चुनाव को लक्षित कर कालाधन इकठ्ठा करनेवालों के कारण भी बैंकिङ चैनल में पैसा का अभाव हो रहा है ।
खैर ! राजनीतिक क्रान्ति के बाद आम जनता जब अपनी दैनिकी में कुछ सकारात्मक परिवर्तन की अनुभूति नहीं करती है, तब नेताओ के प्रति आक्रोशित होना स्वाभाविक बन जाता है, आज मूलधार में क्रियाशील पार्टी और नेताओं के प्रति दिखाई देनेवाली वितृष्णा और आक्रोश के पीछे मूल कारण यही है । यह सिर्फ आरोप नहीं, बहुत हद तक सच्चाई भी है । आम जनता में राजनीति और नेताओं को लेकर जो असन्तुष्टि और पीड़ा है, उसको सम्बोधन किए बिना जनता की भावना और दृष्टिकोण में परिवर्तन आनेवाला नहीं है ।
सामान्यतः हर पाँच–पाँच साल में नए जनप्रतिनिधि चयन के लिए चुनाव किया जाता है । दुनिया की नजर में यही दिखाई देता है कि यहां लोकतान्त्रिक अभ्यास हो रहा है । हम लोग भी प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष रूप से इस अभ्यास में सहभागी हो जाते हैं । तब भी राजनीति और शासन–सत्ता के प्रति आक्रोश और शिकायत कम नहीं है । आखिर क्यों ? जनप्रतिनिधियों के लिए यह एक प्रश्न है । लेकिन मतदाता के लिए भी एक चोटिला प्रश्न है– राजनीति और नेताओं के प्रति मन–मस्तिष्क में आक्रोश और वितृष्णा रख कर आप लोग फिर वही पुराने पार्टी और पुराने ही नेताओं को क्यों वोट दे रहे हैं ? क्या हम लोग खुद को यह प्रश्न पूछने की क्षमता रखते हैं ? जिसको वोट देकर चुनाव में विजयी बनाते हैं, उसके प्रति हम लोग क्यों सन्तुष्ट नहीं हो पा रहे हैं ? अगर हम लोग खुद को यह प्रश्न पूछने की क्षमता रखते हैं तो चुनाव में सही नेता को ही वोट प्राप्त होने की संभावना रहती है । नहीं तो आगामी दिनों में भी वही पुराने ही पार्टी और नेता चुनाव में विजयी होनेवाले हैं, जिसको हम लोग ‘भ्रष्टाचारी’ और ‘काम चोर’ कहते हैं, यह निश्चित है । अगर पुराने ही नेतागण चुनाव जीत जाते हैं तो वे लोग वही काम करते हैं, जो पहले करते आए हैं, जिसके प्रति हम लोगों ने कभी भी सकरात्मक अनुभूति नहीं की है ।
देश में चुनावी माहौल है, वोट किस को देना है ? इस विषय को लेकर अगर कहीं बहस की जाती है तो एक और प्रश्न भी करें– जिस नेता को वोट देने जा रहे हैं, क्या उसके जीतने से हम लोगों को पाँच साल तक पछताना तो नहीं पड़ेगा ? अब इस प्रश्न के ऊपर भी बहस होना जरुरी है । उसके बाद ही हम लोग असली मतदाता बन सकते हैं । नेताओं का भाषण, बाजारी हल्ला और किसी के आग्रह से मतदान करने से असली मतदाता नहीं हो सकते । जब तक हम लोग असली मतदाता नहीं बनते, सत्ता सञ्चालन के लिए चयन होनेवाले नेतागण भी भ्रष्ट और काम चोर ही होते हैं । अगर अपनी नजर में मतदान के लिए कोई भी व्यक्ति उपर्युक्त नहीं दिखाई देता है तो क्यों हम लोग मतदान को ही बहिष्कार ना करें ? इस प्रश्न के ऊपर भी बहस होना जरुरी है ।
किसी भी पार्टी और उम्मीदवार को आप क्यों वोट देते हैं ? इस प्रश्न के जवाब में अगर आप कहते हैं– ‘दादाजी और पिताजी ने इसी पार्टी और उम्मीदवार को वोट दिया है, इसीलिए मैं भी दे रहा हूँ । ’ अगर आप का जवाब यही होता है तो आप गलत हैं । इसी तरह अपने जनों की सिफारिश होने पर आप वोट देते हैं तो भी आप गलत ही हैं । ऐसा होता है तो निश्चित है कि आप उसी वर्ग में पड़ते है, जो वोट देकर पाँच साल तक राजनीति और नेताओं को गाली देते हैं । किसी भी पार्टी द्वारा सिफारिश होना ही उम्मीदवार की योग्यता समझते हैं और आंख मूंद कर भ्रष्ट और कमजोर चरित्र के नेताओं को वोट देते हैं तो पछताने के सिवा हम लोगों के पास अन्य विकल्प नहीं रहता । आम जनता के बीच परिचित और सदाचारी नेताओं को पहचान कर वोट देना ही असल नागरिक का कर्तव्य है । हो सकता है कि पैसा के बल पर चुनाव जीतने की उम्मीद लेकर आए उम्मीदवार सदाचारी उम्मीदवार के तुलना में शक्तिशाली हों, संभावना है कि वही चुनाव भी जीत जाएगा । यह सब जानते हुए भी अगर आप पराजित होनेवाले उम्मीदवार को वोट दे देते हैं तो एक हद तक आप को आत्मसन्तुष्टि मिलने की संभावना है । आप ठान लेते हैं कि मैंने किसी भ्रष्ट को वोट नहीं दिया, अगर यही कार्य आप अपने पारिवारिक सदस्य और मित्रजन को करने के लिए प्रेरित करते हैं तो भ्रष्ट और काम–चोर उम्मीदवार पराजित होने की संभावना रहती है, एक असल नागरिक का कर्तव्य भी यही है ।
अगर उम्मीदवार के रूप में हमारे सामने आनेवाले उम्मीदवारों में से एक भी व्यक्ति सही नहीं लगता है तो हम लोग मतदान के लिए बाध्य नहीं है, इस सच्चाई को भी जानना जरुरी है । किसी के आग्रह और दबाब में कोई भी व्यक्ति मतदान के लिए बाध्य नहीं हो सकता । हां, हमारे यहां कानूनी रूप में ‘राइट टू रिजेक्ट’ (मतपत्र से ही उम्मीदवारों को बष्हिकार करने का प्रावधान) की सुविधा नहीं है । विश्व के कई देशों में ऐसी सुविधा है । नेपाल में भी ऐसी सुविधा के लिए आवाज उठ रही है । अपेक्षा है कि कुछ साल में ऐसी व्यवस्था की जाएगी ।
कानूनी रूप में उम्मीदवारों को बहिष्कार करने की सुविधा ना होने पर भी जनप्रतिनिधि के लिए योग्य उम्मीदवार नहीं हैं तो तत्काल के लिए हम लोग मतदानस्थल में जाने से इन्कार कर सकते हैं । यह उम्मीदवार बहिष्कार का एक तरीका भी है । अगर खुद को असल मतदाता मानते हैं, देश में सही राजनीतिक नेतृत्व चयन हो सके, ऐसी उम्मीद रखते हैं तो हमारी मानसिकता में भी परिवर्तन जरुरी है । ‘चुनाव में खड़े उम्मीदवारों में से किसी एक को तो वोट डालना ही है, चलो डाल देते हैं’ कहकर अगर मतदानस्थल में पहुँच जाते हैं तो यह सही राजनीतिक चेतना नहीं है । वोट देकर पाँच साल तक पछताना है ? या सही उम्मीदवार का चयन करना है ? अथवा चुनाव का ही बहिष्कार करना है ? क्या आप पारिवारिक सदस्य और मित्रजन से इस विषय को लेकर बहस करते हैं ? करते हैं तो संभावना है कि आगामी चुनाव में देश में सही राजनीतिक नेतृत्व आनेवाला है । अगर नहीं करते हैं तो निश्चित है कि पुराने ही नेतागण चुनाव जीतनेवाले हैं और हम लोग पाँच साल पछताने वाले हैं ।
– हिमालिनी अप्रील अंक से


