आज भी रह जाती हैं वंचित कुन्ती, अपने भावी कर्ण से : शिप्रा
अस्तित्व का चक्रव्यूह
आज भी
विवशता की चादर में
लपेटकर तजती हैं
कुन्ती, कर्ण को
उच्छवास भरकर
अपने दामन से
छुड़ाती दाग
कुलटा का, किन्तु
कलुषित होता वात्सल्य
संशय अथवा प्रमाण
के गर्भ से उत्पन्न
शिशु जीवनपर्यन्त
अस्तित्व के
चक्रव्यूह में
कस्तूरी मृग सदृश
व्याकुल मन में
निरंतर बजते
प्रश्नों के कोलाहल
को सुनता, तड़पता
दिशाहीन भटकता
और अंततः
नैतिकता और मर्यादा
की अदृश्य
दीवार के पीछे
व्यंग्य – वाणों से
पराभूत होकर
धर्म – अधर्म की
परिधि से परे
अनायास ही
उसके कदम
बढ़ जाते किसी
दुर्योधन की ओर
और समाज की
नपुंसक सोच के
समक्ष, सृष्टि के
समस्त देवताओं
को साक्षी मान
बहा आती है कुन्ती
अपनी ममता को
क्रूर काल के
दरिया में
आज भी
रह जाती हैं
वंचित कुन्ती
अपने भावी कर्ण से !
शिप्रा

