७० वर्ष में डेढ़ प्रतिशत ही विदेशी को नागरिकता देना, कहां है राष्ट्रीयता पर खतरा ?: कंचना झा
कंचना झा, काठमांडू । कमला हैैरिश – एक भारतीय मूल की महिला विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र मानने वाले अमेरिका की उपराष्ट्रपति हैं । एक तो महिला दूसरी अंगीकृत नागरिक विश्व मानचित्र पर राज करनेवाला अमेरिका, जिसका लोग माने न माने दबदबा चलता है वहाँ के उपराष्ट्रपति के पद को भी संभाल सकती है अंगीकृत नागरिक यानी कमला हैरिश । ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जैसे श्रीनिवास अमेरिका के मुख्य न्यायाधिश, ऋषि सुनक बेलायत के पूर्वमंत्री एवं आनेवाले निर्वाचन में प्रधानमंत्री के प्रमुख दाबेदार, सुनीता विलियम्स अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा की वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं । इतना ही नहीं आप खेल की ही बात करें तो क्रिकेट में भी वेस्ट इन्डिज,दक्षिण अफ्रिका या और भी बहुत से देश के टीम में भारतीय मूल के खेलाड़ी हैं पर वें अपने देश के लिए खेलते हैं न कि भारत के लिए ।
लेकिन ये तो नेपाल है जहाँ हर दिन नागरिकता को लेकर नईं बातें उठती रहती है । हम इंतजार करवाना चाहते हैं उस महिला को नागरिकता देने के लिए जो अपना सबकुछ छोड़कर आपके साथ आपके देश में वैवाहिक संबंध बनाकर आ जाती है । पूरा विश्व महिला सशक्तिकरण की बात करता है । चाँद सूरज की बात करता है मगर हम अटके हैं आज भी नागरिकता को लेकर । हाँ ये नेपाल है जहाँ नागरिकता प्रमाण पत्र संबंधी कानून बने ७० वर्ष हो गए हैं । इन ७० वर्ष में ४ लाख २४ हजार ४ सौ २२ महिलाओं ने वैवाहिक अंगीकृत नागरिकता ली है ।
सबसे पहले तो ये जानना होगा कि नागरिकता प्रमाण पत्र संबंधी कानून बना क्यों ? तो कहा गया है कि किसी भी देश के हरेक नागरिक को स्वतंत्र होना आवश्यक हैं वह किसी अधिकार से वंचित न रह जाए इसके लिए ये प्रावधान बनाया गया है । लेकिन इन कुछ वर्षो में हमने बहुत अफवाह बहुत हल्ला सुना नागरिकता विधेयक को लेकर । जिस तरह से हम इसे व्याख्या कर रहें हैं शायद उस तरह की व्याख्या की आवश्यकता भी नहीं है । नेपाल की कुल जनसंख्या की अगर हम बात करते हैं तो जनसंख्या है लगभग तीन करोड़ । जिसमें से ४ लाख २४ हजार ४ सौ २२ महिलाओं ने वैवाहिक अंगीकृत नागरिकता ली है । अगर हम प्रतिशत में जाए तो डेढ़ प्रतिशत भी नहीं हुआ ? समझने की आवश्यकता ये है कि कहाँ राष्ट्रीयता पर खतरा है । ये खतरा है या साजिश ? नहीं कहा जा सकता है । हम किसे रोकना चाह रहें हैं देश के विकास को ? देश के भविष्य को ? या फिर केवल और केवल अपनी कुर्सी को । अपने आने वाले पुश्ता के लिए एक ऐसे देश को छोड़ रहें हैं जहाँ से हमारे बच्चों का पलायन हो चुका है । जहाँ हमारे देश में नौजवान नहीं है वो हैं तो खाड़ी देश में, अमेरिका, भारत के दिल्ली पंजाब में । सोचने की बात ये है कि हम क्या रख रहें हैं अपनी आनेवाली नश्लों के लिए । हम आज भी उलझे हैं नागरिकता में । हम डरते हैं कि किसी अंगीकृत नागरिक के हाथ में सत्ता चली जाएगी तो देश की अखण्डता और राष्ट्रीयता पर असर पड़ेगा । ७० वर्ष में डेढ़ प्रतिशत को आपने नागरिकता दिया है और इस डेढ़ प्रतिशत ने क्या एैसा काम किया है जिससे लगे कि देश का अस्तित्व खत्म हो गया हो । ताज्जुब की बात ये है कि जो कोई सत्ता में है उनकी यही राय है जो नहीं है उनकी भी यही राय की मधेश में बहुत से भारतीयों को नागरिकता दी गई है जबकि डाटा दिखा रहा है कि कितने लोगों को कहाँ कहाँ नागरिकता दी गई है ।
गृह मन्त्रालय के अनुसार भारत से विवाह करके आई महिलाओं में वैवाहित अंगीकृत नागरिकता लेने वाले की संख्या ३ लाख ९६ हजार ५५७ है । नेपाली मूल के १३ हजार ५०७, फिलिपिन्स के १६१, आइसल्यान्ड के १५३, चीन के १३७, इन्डोनेसिया के ५६, भुटान के ४६, बंगलादेश के २२, नेदरल्यान्ड के १९ तथा म्यानमार के १६ महिलाओं ने नेपाली पुरुषों के साथ विवाह कर अंगीकृत नागरिकता ले चुकी हैं । प्रदेश १ के अन्तर्गत जिला प्रशासन कार्यालय द्वारा ४२ हजार ७६१, मधेश प्रदेश के जिला द्वारा २ लाख २९ हजार ९७३, वागमती द्वारा २ हजार ८७, गण्डकी में ३ हजार ३८४, लुम्बिनी में १ लाख ४३ हजार १०४, कर्णाली
में ८७ तथा सुदूरपश्चिम प्रदेश के जिला द्वारा ३ हजार २६ लोगों ने वैवाहिक अंगीकृत नागरिकता लिया है ।
नेपाल में नागरिकता सम्बन्धी नीतिगत व्यवस्था २००९ वैशाख २६ गते को किया गया था । इसी के आधार पर तत्कालीन सरकार ने ‘नागरिकता ऐन २००९’ जारी किया था । उक्त ऐन के दफा ३ में ‘नेपाल राज्य के कानून तथा रीति अनुसार नेपाली नागरिक के साथ किसी भी तरह का वैवाहिक सम्बन्ध होने पर पत्नी को नेपाली नागरिक माना जाएगा ये कहा गया है । २०३३ से २०३८ साल तक वैवाहिक अंगीकृत नागरिकता पाने के लिए निश्चित वर्ष तक इंतजार करने का प्रावधान था । अन्य समय में भी इसके अतिरिक्त नेपाली पुरुषों के साथ विवाह करने वाली विदेशी महिलाओं के लिए अपने देश की नागरिकता को त्याग कर या त्याग्ने की प्रक्रिया शुरु करने का प्रमाण पेश कर नेपाल के अंगीकृत नागरिकता ले सकने की व्यवस्था थी ।
अभी की बात करें तो हर दिन नागरिकता विधेयक पर कुछ न कुछ बहस हो रही है । राष्ट्रपति पद पर बैठी विद्या देवी भण्डारी ने भी इस विधेयक को स्वीकृति नहीं देकर वापस भेज दिया है । दोनों सदनो द्वारा पारित कर प्रमाणीकरण के लिए विधेयक को राष्ट्रपति के समक्ष भेजा गया जहाँ राष्ट्रपति और सत्ता गठबंधन के बीच मतभेद दिख रहा है जिसका एक महत्वपूर्ण कारण वैवाहिक अंगीकृत नागरिकता विषय को लेकर है ।
गृहमन्त्री बालकृष्ण खाँण ने राष्ट्रपति द्वारा व्यक्त सन्देश को सम्बोधन करके नेपाल के संविधान में संशोधन करने की अवश्यकता हाल फिलहाल में संभव नहीं है ।
क्या सच में हमारे यहाँ के नेताओं की नजर वहाँ तक नहीं जाती है जो विदेशों में हो रहा है । विश्व के देश कैसे प्रगति करें विश्व मानचित्र में उनकी समावेशिता कैसे हो इसके बारे में बहस हो रही है मगर हम आज भी वहीं खड़े हैं जहाँ से चले थे । हम इन उदाहरणों की ओर ध्यान क्यों नहीं देते हैं जहाँ बेलायत की महारानी एलिजाबेथ के पति फिलिप ग्रिस के थे । शादी के बाद बेलायत में बस गए और वहीं के होकर रह गए । अब वो उसी के बारे में सोचते हैं ।
अब नेपाल की ही बात करें तो खासकर शाह वंशीय राजा और राणा परिवार के अधिकांश रिश्ते भारत के राज परिवार में है ।
वर्तमान परिपे्रक्ष्य की अगर बात करें तो बहुत सारी नेपाली लड़कियों और लड़को का विवाह भारत में होता आया है । उसी तरह भारत के बहुत से लड़कियों और लड़कों का विवाह नेपाल में होता आया है । लेकिन विवाह के बाद वह उसी देश की हो जाती हैं जहाँ उनका विवाह हुआ है ।
इन ७० वर्षो में न तो कोई रानी भारत की हुई , बहुदल आने के बाद भी कोई प्रधानमंत्री या लोकतंत्र के बाद भी न तो कोई राष्ट्रपति बना । फिर न जाने क्या डर है इन नेताओं को या तो अपनी प्रतिभा पर शंका है कि कोई दूसरे देश से आई वैवाहिक अंगीकृत महिला सबपें भारी पड़े । उससे राष्ट्रीयता को आंच आ जाए ।
अभी तक इन ७० वर्षो में न तो कोई प्रधानमंत्री, प्रधान न्यायाधिश, प्रधान सेनापति, पुलिस के प्रमुख अंगीकृत नागरिकता वाले हुए हैं ।
ऐसी बात नहीं है की ये राजनीतिज्ञ इस सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं, ये झूठा राष्ट्रवाद का नाम देकर इस देश की जनता को भ्रमित करना चाहते हैं और जनता मूर्ख बन रही है ।


