निर्विकल्प देउवा ! : अजय कुमार झा
न कोई बाद है न कोई आधार। सिर्फ सत्ता और भत्ता के लिए लोग मरने मारने को आतुर हैं।
अजय कुमार झा, जलेश्वर । नेपाली कांग्रेस के भीतर और नेपाली राजनीति में अभी आदरणीय नेता शेरवहादुर देउवा का विकल्प नहीं है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक जगत में अपनी मजबूत पकड़ रखनेवाले देउवा को अपनी ही पार्टी के भीतर से कोइराला, थापा और पौडेल जैसे अति महत्वाकांक्षी, परंतु कमजोर जनाधारवाले नेताओं के द्वारा चुनौतियों का झनझनाहट अवश्य सुनाई देता है; लेकिन वह झुनझुने से अधिक हैसियत का नही है।
इधर प्रचंड और नेपाल की अपनी ही रोना चल रहा है। ए दोनों के. पी. ओली जी से भयग्रस्त हैं। संयुक्त समाजवादी के अध्यक्ष माधव कुमार नेपाल संविधान की रक्षा, स्थिरता और समृद्धि के लिए मौजूदा गठबंधन के बीच दीर्घकालीन एकता की जरूरत पर जोर दे रहे हैं। जबकि इन्हें भलीभांति जानकारी है कि चुनाव में कांग्रेस का भोट गठबंधन के नाम पर उनके पार्टियों में ट्रांसफर नहीं हुआ। फिरभी जनादेश गठबंधन को ही मिला है। इसी आत्मरति और आत्म सुरक्षा के भाव को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाने के ताक में इमोशनल ब्लैकमेल करने की फिराक में दिख रहे हैं। प्रचंड के समर्थन में अभिव्यक्ति देना अपनी उखड़ी हुई जड़ों को मल जल से पोषित करने के दिवा स्वप्न देख रहे हैं। इतना ही नहीं; खुदको प्रधानमंत्री का सपना भी देखने की कोशिश कर रहे हैं। कहीं कांग्रेस के भीतर फूट डालने की कोशिश तो इनके द्वारा नहीं किया जा रहा है ? यह आज का प्रश्न है।
कांग्रेस को विशेष सतर्कता और गंभीरता के साथ आगे बढ़ना चाहिए। प्रचंड और नेपाल से विशेष सतर्कता की आवश्यकता है; जबकि अपने साथियों के साथ गंभीरता पूर्वक परंतु सम्मानजनक शैली में संवाद करने की आवश्यकता है। अन्यथा सत्ता के मोह और आकर्षण के कारण हाथ और लात दोनो सखाप हो सकता है। वर्तमान में सरकार प्रमुख की जिम्मेवारी पाने की हैसियत कांग्रेस के अलावा गठबंधन के किसी पार्टी और नेता में नही हैं।
अतः नेपाल प्रचंड को इस बात का सीधा संदेश दे दिया जाना चाहिए। नीति के अनुसार, जिसके नेतृत्व में कांग्रेस, प्रचंड, ठाकुर और नेपाल के पार्टी और राजनीतिक भविष्य इस चुनाव में सुरक्षित हुआ है; आगे का पंचवर्षीय नेतृत्व भी उनके ही हाथों में होना चाहिए। नेपाली जनता के मनस पटल पर देउवा के प्रति किसी प्रकार का कोई नकारात्मक भाव नहीं है। बल्कि आम कांग्रेसियों में देउवा के प्रति सूक्ष्म सम्मान का प्रगाढ़ भाव ही अंतर्निहित दिखाई देता है। इस हेतु से भी गठबंधन के सभी लाभार्थियों के लिए देउवा के नेतृत्व में अपनी अस्तित्व और भविष्य सुनिश्चित करने के लिए अग्रसर होना चाहिए।
नेपाली कांग्रेस में संसदीय दल के लिए उम्मीदवारों के चयन में संगठन के अन्य पहलुओं में दिख रहे भ्रम और खिचातनी को लेकर देउबा का उत्साहित होना स्वाभाविक हैं। संचार मंत्री ज्ञानेंद्र बहादुर कार्की, जो देउबा के विश्वासपात्र भी हैं, ने कहा कि पार्टी अध्यक्ष को संसदीय दल का नेता बनाना सभी का कर्तव्य है क्योंकि वह स्थानीय, राज्य और संघ स्तर पर पार्टी को नंबर एक स्थान पर लाने में सफल रहे हैं। उन्होंने कहा, “इससे पार्टी के भीतर एक नया संदेश संप्रेषित हुआ है, मतदाताओं में जोश उत्पन्न हुआ है और एक अच्छी परंपरा भी स्थापित हुई है।” कांग्रेसियों और बामबिरोधियों में वर्षोंवाद पुनर्जीवित हुए भरोसा और उत्साह को पोषित करने लिए भी देउवा के नेतृत्व में कांग्रेस को सरकार बनाने का हर संभव प्रयास करना चाहिए।
रामचंद्र पौडेल, प्रकाशमान सिंह, शशांक कोइराला, प्रदीप पौडेल और मधेसियों को मिलाकर ऐसा लगता है कि देउबा के पक्ष में लगभग 60 सांसद होंगे। पांच साल के भीतर मंत्री बनने का सपना लेकर आए सांसद उसी लालच में देउबा का साथ देने को तैयार हैं। हर कोई सत्ता और भत्ता का भूखा है, कोई राष्ट्रपति, कोई स्पीकर और कई मंत्री बनाने की कोशिश कर रहा है, कोई भी सत्ता से परे जाने के पक्ष में नहीं है जब तक कि वे इसे प्राप्त न कर ले। और सत्ता अभी देउबा के इर्द गिर्द घूमती हुई दिखाई देती है। अतः बुद्धिमान के लिए भविष्य के छप्पन भोग से वर्तमान का पंचभोग ही ज्यादा महत्व रखता है।
प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी देने हेतु संसदीय दल के नेता में चयन होना संवैधानिक बाध्यता है। नेपाली कांग्रेस के 89 सांसद में से किसी एक को 50 प्रतिशत मत कटाना होगा। तब जा के वह संसदीय दल के नेता में चयन हो पाएगा। और भविष्य में अपने नेतृत्व में सरकार बनाने का प्रयत्न करेगा। यही सत्ता लोभ के कारण कांग्रेस के भीतर रह रहकर समूह उपसमूहबाला पुराना संस्कार फुफकार मारने लगता है। अनेक कोशिशों के बाद शेखर कोइराला ने अपना समर्थन गगन थापा को देकर देउवा को खुला चुनौती दे दिया है। अब संघर्ष सीधा देउवा और थापा के बीच शुरू हो गया है। कल बुधवार इसका निर्णय भी हो जाएगा। लेकिन पार्टी के भीतर जो दरार था वह और अधिक स्पष्ट होते जा रहा है।
वर्तमान राजनीतिक परिवेश में पार्टि के भीतर आंतरिक कलह, अविश्वास और उहापोह होना अनिश्चित भविष्य का संकेत देता है। साथही कांग्रेस को फिर से कमजोर करने के लिए गठबंधन के भीतर से ही षडयंत्र की बू दिखाई देती है। हो सकता है कांग्रेस को एमाले की तरह अंदर से ही खंडित करने का षडयंत्र रचा जा रहा हो; और उसकी ताना बाना बुननेबाला भी अपनी ही विश्वास पात्र हो। राजनेताओं के चरित्र और व्यवहार को सूक्ष्म विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि नेपाल की राजनीति का कोई मौलिक सिद्धांत नहीं है। न कोई बाद है न कोई आधार। सिर्फ सत्ता और भत्ता के लिए लोग मरने मारने को आतुर हैं। किसी में भी देशभक्ति का लेशमात्र भी संस्कार नहीं दिखाई पड़ता है। देश को गिरवी रखकर भी अपनी बैंक बैलेंस बढ़ाने में बुद्धिमानी और बहादुरी समझने वाले नेपाली वीर बहादुरों से ज्यादा अपेक्षा नहीं किया जा सकता है।

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