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नेपाल की सहभाजित हुकूमत : प्रेमचंद्र सिंह

 

प्रेमचंद्र सिंह, लखनऊ । नेपाल में वर्ष-2008 से लेकर अबतक कई अस्थिर सरकारें अस्तित्व में आई जिनका शायद ही कभी कार्यकाल पूरा हुआ हो, इसका प्रमुख कारण है कि नेपाल की राजनीतिक पार्टियां नेता-केंद्रित हैं और नेपाल के राजनेतागण अधीर मनोवृतियों के लिए कुख्यात हैं। कम्युनिस्ट राजनीतिक पार्टियों की गठजोड़ (माओवादियों से लेकर मार्क्सवादी-लेनिनवादियों तक) नेपाल की सत्ता में पुनः लौट आई हैं और पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ जी तथा के.पी शर्मा ‘ओली’ जी की नेतृत्व वाली कम्यूनिस्ट पार्टियों की साझा सरकार नेपाल में अस्तित्व में आई है। प्रचंडजी की प्रधानमंत्रित्व में सरकार ढाई वर्ष और शेष ढाई वर्ष ओली जी के रहनुमाई में सरकार संचालन के लिए प्रतिबद्धता जाहिर की गई है। इस गठबंधन सरकार के गठन हेतु आवश्यक संख्याबल (138 सांसदों) की जादुई आंकड़ा के लिए उपर्युक्त दोनों कम्यूनिस्ट दलों (110 सांसदों) के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (20 सांसद), राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (14 सांसद), जनता समाजवादी पार्टी (12 सांसद), जनमत पार्टी (6 सांसद) तथा नागरिक उन्मुक्ति पार्टी (4 सांसद) सरीखे पांच छोटी क्षेत्रीय पार्टियां भी सम्मिलित हैं।

वर्ष- 2018 में दुनिया का छठा कम्युनिस्ट शासित देश बनने के बाद नेपाल में चीन ने अपनी सुविचारित भू-रणनीतिक जड़ें जमाना शुरू कर दी। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों का सिर्फ 19 महीने के अंतराल के बाद दिसम्बर, 2022 में पुनः सत्ता में लौट आना महज एक संयोग है या भू-रणनीतिक बिसात पर नेपाल की स्थिति निर्धारण ? नेपाल में खासकर संघीय लोकतंत्र की स्थापना के बाद राजनेताओं को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के समक्ष राष्ट्रहित का कोई महत्व ही नही रहा है, फलस्वरूप नेपाली लोकतंत्र से नेपाली लोगों ने जो अच्छे दिन आने की आशा और अपेक्षायें संजोए रखी थी वो सबके सब अब गंभीर निराशा में परिवर्तित हो रही है। इसका असर नेपाल की राजनीतिक पार्टियों को हालिया चुनाव में प्राप्त वोटों के गिरते प्रतिशत के ग्राफ से भलीभांति समझा जा सकता है। शेरबहादुर देउवा जी की नेपाली कांग्रेस को छोड़कर सभी बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां पिछले चुनाव की तुलना में अपनी सीटें गवाई है। पिछले चुनाव से इस चुनाव में भले ही नेपाली कांग्रेस को 26 सीटों का इजाफा (63 सीटों से बढ़कर 89 सीटें) हुआ है लेकिन उनकी पार्टी को इस चुनाव में पिछले चुनाव से करीब 7% कम वोट (अर्थात 33% के बजाय 26% ही वोट) मिला है, इसी प्रकार के.पी.शर्मा ओली जी की पार्टी नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (यूएमएल) को पिछले चुनाव से इस चुनाव में करीब 6.30% कम वोट मिले हैं और पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ जी की नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (माओइस्ट सेंटर) को पिछले चुनाव की अपेक्षा 3% कम वोट मिला है। सबसे अधिक सांसदों बाली नेपाली कांग्रेस पार्टी सरकार में न होकर विपक्ष में है, इसके राजनीतिक और रणनीतिक मायनों को समझना समीचीन होगा।
नेपाल की नेपाली कांग्रेस, एनसीपी (यूएमएल) तथा एन सीपी (माओइस्ट सेंटर) सरीखे प्रमुख तीनों राष्ट्रीय पार्टियों और उपेंद्र यादव जी की क्षेत्रीय पार्टी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का वोट प्रतिशत में भारी गिरावट इन पार्टियों की नेपाल के आमलोगों के बीच पत्नोन्मुख साख और अवनतिशील विश्वश्यनियता को इंकित करता है। इनकी गिरती लोकप्रियता का सीधा फायदा नेपाल की रवि लामिछाने की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी, राजेंद्र लिंगडन की राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी और सी.के.राउत की जनमत  पार्टी सरीखे नई राजनीतिक दलों को मिला है। नेपाल की निराश आवाम को इन नई राजनीतिक दलों में आशा की किरण दिखना लाजमी है। लगता है कि नेपाली राजनीति में प्रचंड-केंद्रित माओवादी कम्यूनिस्ट पार्टी की साख सबसे अधिक पत्नोन्मुखी है और प्रचंडजी राजतंत्र के अवसान के बाद राजतंत्र से त्रस्त नेपाली लोगों की विकासोन्मुखी सुनहरे सपनों को मुंगेरी लाल के हसीन सपनों में तब्दील कर दिया है। अब तो प्रचंडजी का हाल यह है कि उन्हे न तो नेपाली आवाम खासकर पिछड़े और शोषित लोगों का साथ मिल रहा है और न ही उनमें हिंसक संघर्ष करने की कूवत ही शेष रह गई है। नेपाल के जिन मध्य हिमालयी लोगों ने अठारहवी शताब्दी में नेपाल की गोरखा राजशाही की स्थापना के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया था, उन्हीं के वंशजों ने राजतंत्र से मोहभंग होने पर वर्ष-2006-2008  में नेपाली राजतंत्र को नेस्तनाबूद कर प्रचंडजी की कम्यूनिस्ट सत्ता को स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन नेपाल की पिछड़ी, शोषित और गरीब आवाम खासकर दलित और जनजातियां गोरखा राजशाही की भांति कम्युनिस्टों की नीतियों से छला और ठगा महसूस कर रहा है। प्रचंड जी की साम्यवादी नीतियां न तो नेपाल के आमलोगों के मन में अपना स्थान बना पाई है और न ही प्रचंडजी की राजनीतिक सुझबुझ नेपाली संसदीय राजनीति की विसात पर अब तक फ्लोर-प्रबंधन का करिश्मा ही पेश कर पाया है। नई और उभरते राजनीतिक दलों का मिजाज तो नेपाल की विकास और नेपाल की उपेक्षित लोगों के उन्नयन के लिए कुछ कर गुजरने की जुनून के बजाय सत्ता-सुख के लिए अवसरवादी ही दिख रहा है, जो नेपाल के लिए शुभ संकेत नही है।
वर्णित स्थिति में प्रचंड जी के प्रधानमंत्रित्व वाली वर्तमान गठबंधन सरकार कितनी स्थाई और स्थिर रहेगी, यह  प्रचंडजी की कुशल दलगत राजनीतिक प्रबन्धन, कूटनीतिक सूझबुझ और सरकार की विकासोन्मुखी प्रार्थमिकताओ पर निर्भर करेगा। अभी तक वर्तमान गठबंधन सरकार में सम्मिलित घटक दलों के बीच सरकार के संचालन और नीतिनिर्धारण हेतु न्यूनतम सामान्य कार्यक्रम (मिनिमम कॉमन प्रोग्राम) की रूपरेखा पर सहमति नहीं हो पाई है। ऐसे में दूसरे पार्टियों की बैशाखियों पर खड़ी प्रचंडजी की सरकार कब और  किस करवट ले लेगी, राजनीतिक विश्लेषकों के लिए पहेली से कम नहीं है। लोगों की मान्यता है कि नेपाली राजतंत्र के विरुद्ध माओवादी खूनी आंदोलन में चीन की भूमिका को कमतर नहीं आंका जा सकता है। चीन ने नेपाली साम्यवादी आंदोलन को सफल बनाने के लिए कार्यकर्ताओं की प्रशिक्षण से लेकर हथियार की आपूर्ति तक का जिम्मा ले रखा था। साम्यवादी आंदोलन की सफलता और नेपाल में साम्यवादी सरकारों के गठन के उपरान्त उन सरकारों की सक्रिय सहायता से चीन ने नेपाल में अपनी व्यापारिक और रणनीतिक हितों के प्रसार के लिए धीरे-धीरे निवेश करना शुरू किया। अब चीनी निवेश का आकार नेपाल में इतना बड़ा होता जा रहा है कि अपनी व्यापारिक, सामरिक और रणनीतिक निवेश और हितों की रक्षा और फैलाव के लिए चीन को नेपाल में अपने मुआफिक और हितकर सरकार चाहिए। इसके लिए नेपाली सता गलियारों में चीन की सक्रियता किसी से छुपी नहीं है।
भारत और नेपाल ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सहजीवी सदियों से है और आज भी भारत अपनी ओर से ऐसा ही महसूस करता है। नेपाल की राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता तथा नेपाली लोगों के जीवन में शांति, सुख और समृद्धि भारत के हित में भी है और भारत की मनोकामना के अनुरूप भी है। भारत-नेपाल संबंधों की स्वस्थ्य और अटूट विरासत के मद्देनजर ही वर्ष-2006 में नेपाल की राजशाही और माओवादी नेता प्रचंड जी के बीच ‘शांति समझौता’ कराने और प्रचंडजी और उनकी माओवादी कम्यूनिस्ट पार्टी को नेपाली राजनीति की मुख्य धारा में लाने में भारत की सक्रिय भूमिका को आज भी नेपाल के बुद्धिजीवी समाज और आमलोग कृतज्ञता और प्रेम से याद करते हैं। इसके बावजूद श्रीलंका की तर्ज पर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टियों के पुनः सत्ता में लौटने के बाद नेपाली कम्यूनिस्ट सरकार भारत और चीन के साथ नेपाल के संबंधों को “संतुलित” करने का वादा कर रही हैं। श्रीलंका की भी भारत के साथ ऐतिहासिक रूप से घनिष्ठ संबंध होने के बावजूद नेपाल की तरह श्रीलंका भी समीपस्थ पड़ोसी भारत और दूरस्थ साहूकार चीन के बीच समान दूरी बनाने की बेसुरा राग अलापने से परहेज नहीं करता है। बाबजूद इन सबके भारत के लोग नेपाली आवाम में अपना ही प्रतिबिंब देखता है और नेपाल की सामाजिक तथा सांस्कृतिक परंपराओं में अपनी ही परछाही पाता है।

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प्रेमचंद्र सिंह

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