Tue. Jun 16th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

धीरेन्द्र शास्त्री और कालनेमी श्याम : अजय कुमार झा

 

अजय कुमार झा, जलेश्वर । हिन्दू धर्म और संस्कृति विरुद्ध वर्षों से षडयंत्र और जेहाद करते आ रहे विधर्मियों तथा मूढ़ों को वर्तमान के समय का न्यूनतम बोध तो रखना ही चाइए। वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण युगों के छुपे अनेकों रहस्यों के पर्दाफास होना एक ओर धर्मांधता को नंगा करता जा रहा है तो वही दूसरी ओर सनातन धर्मों के आध्यात्मिक रहस्यों का भी अल्पांश मे ही सही सार्वजनिक भी किया जा रहा है। सनातन संस्कृति के साहित्य रजकण से जन्में विज्ञान के बलपर कुछ मूढ़ लोग अब सनातन के विशाल साम्राज्य को ही चुनौती देने का दुःस्साहस कार बैठे हैं। उन्हें पिता और पुत्र तक मे अंतर नहीं दिखाई पड़ता है और चले हैं अंधविश्वास मिटाने। सायद “अंधे अंधा ठेलिया दोनों कूप पडन्त” इसी को कहते हैं। मैं स्याम मानव समूह के मूढ़ों को कमसेकम इस लेख को पढ़कर चेतना को जागृत कर इस जीवनको सफल बनाने का अवसर दे रहा हूँ।

पहले नीचे को दोनों को घटनाओं को पढिए; जिससे आज्ञा चक्र और तीसरे नेत्र के अल्पांश ही सही समझ हो सकेगा। जबटक आप आध्यात्मिक शक्तियों को नहीं समझेंगे तब तक आपको सनातन के गूढ रहस्यों पर विवाद करने का अधिकार ही नहीं हैं। और ध्यान रहे! इस आध्यात्मिक रहस्यों को शब्द और तर्कों से नहीं समझा जा सकता है। इसके लिए आपको अनुभव मे उतारने के लिए हिम्मत जुटाना होगा। जो आप जैसे क्षुद्र बुद्धि से संभव नहीं। फिरभी यह एतिहासिक घटनाओं से कुछ लाभ मिल सकता है।

1880 में दक्षिण के एक बहुत गरीब ब्राह्मण परिवार में एक विश्वविख्यात व्यक्ति पैदा हुआ। उसका नाम था रामानुजम था।लेकिन उस छोटे से गांव में भी बिना किसी विशेष शिक्षा के रामानुजम की प्रतिभा गणित के साथ अनूठी थी। जो लोग गणित जानते है, उनका कहना है कि मनुष्य जाति के इतिहास में रामानुजम से बड़ा और विशिष्ट गणितज्ञ नहीं हुआ। बहुत बड़े—बड़े गणितज्ञ हुए हैं, पर वे सब सुशिक्षित थे, उन्हें बड़े गणितज्ञो का साथ—सत्संग मिला था। लेकिन रामानुजम की न कोई तैयारी थी, न कोई साथ मिला, न कोई शिक्षा मिली, मैट्रिक भी रामानुजम पास नहीं हुआ। किसी ने उसको सुझाव दिया कि कैम्‍ब्रिज युनिवर्सिटी के उस समय विश्व के बड़े से बड़े गणितज्ञों में एक प्रोफेसर हार्डी थे, उनको लिखो। उसने पत्र तो नहीं लिखा, ज्यामिति की डेढ़ सौ थ्योरम बनाकर भेज दीं। हार्डी तो चकित रह गया। इतनी कम उम्र के व्यक्ति से, इस तरह के ज्यामिति के सिद्धांतों का कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता था। उसने तत्काल रामानुजम को यूरोप बुलाया। जब रामानुजम कैम्ब्रिज पहुंचा तो हार्डी जो कि बड़े से बड़ा गणितज्ञ था उस समय के विश्व का, अपने को बिलकुल बच्चा समझने लगा रामानुजम के सामने। रामानुजम की क्षमता ऐसी थी, जिसका मस्तिष्क से संबंध नहीं मालूम पड़ता। अगर आपको कोई गणित करने को कहा जाए तो समय लगेगा। बुद्धि ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकती जिसमें समय न लगे। बुद्धि सोचेगी, हल करेगी, समय व्यतीत होगा, लेकिन रामानुजम को समय ही नहीं लगता था। यहां आप तख्ते पर सवाल लिखेंगे वहां रामानुजम उत्तर देना शुरू कर देगा। आप बोल भी न पाएंगे पूरा, और उत्तर आ जाएगा। बड़ी कठिनाई खड़ी हो गयी, क्योंकि जिस सवाल को हल करने में बड़े से बड़े गणितज्ञ को छह घण्टे लगेगें ही, फिर भी जरूरी नहीं है कि सही हो, उत्तर सही है या नहीं इसे जांचने में फिर छह घण्टे उसे गुजारने पड़ेंगे। रामानुजम को सवाल दिया गया और वह उत्तर दे देंगे, जैसे सवाल में और उत्तर में कोई समय का क्षण भी व्यतीत नहीं होता। इससे एक बात तो सिद्ध हो गयी कि रामानुजम बुद्धि के माध्यम से उत्तर नहीं दे रहा है। बुद्धि बहुत बड़ी नहीं है उसके पास, मैट्रिक में वह फेल हुआ था, कोई बुद्धिमत्ता का और लक्षण भी न था। सामान्य जीवन में किसी चीज में भी कोई ऐसी बुद्धिमत्ता नहीं मालूम पड़ती थी। लेकिन बस गणित के संबंध में वह एकदम अतिमानवीय था, मनुष्य से बहुत पार की घटना उसके जीवन में होती थी। रामानुजम को क्षय रोग हो गया, वह छत्तीस साल की उम्र में मर गया। जब वह बीमार होकर अस्पताल में पड़ा था तो हार्डी अपने दो तीन गणितज्ञ मित्रों के साथ उसे देखने गया था। उसके दरवाजे पर ही हार्डी ने कार रोकी और भीतर गया। कार का नम्बर रामानुजम को दिखायी पड़ा। उसने हार्डी से कहा, आश्रर्यजनक है, आपकी कार का जो नम्बर है, ऐसा कोई आंकड़ा ही नहीं है, मनुष्य की गणित की व्यवस्था में। यह आंकडा बड़ा खूबी का है। उसने चार विशेषताएं उस आंकड़े की बतायीं। रामानुजम तो मर गया। हार्डी को छह महीने लगे, तब भी वह तीन ही सिद्ध कर पाया, चौथी विशेषता तो असिद्ध ही रह गयी। हार्डी वसीयत छोड्कर मरा कि मेरे मरने के बाद उस चौथी की खोज जारी रखी जाए, क्योकि रामानुजम ने कहा है तो वह ठीक तो होगी ही। हार्डी के मर जाने के बाईस साल बाद वह चौथी घटना सही सिद्ध हो पायी कि उसने ठीक कहा था। उस आक्के में यह खूबी है!

यह भी पढें   लुम्बिनी प्रदेश सरकार द्वारा २०८३ – ८४ के लिए बजट

ध्यान रहे! रामानुजम को जब भी यह गणित की स्थिति घटती थी, तब उसकी दोनों आंखों के बीच में कुछ होना शुरू हो जाता था। उसकी दोनों आंखों की पुतलियां ऊपर चढ़ जाती थीं, योग जिस जगह रामानुजम की आंखें चढ़ जाती थीं, उसको तृतीय नेत्र कहता है। उसको तीसरी आंख कहता है। अगर वह तीसरी आंख आरम्भ हो जाए तो दूसरा ही जगत शुरू हो जाता है।

एक दूसरी घटना, 1945 में एक आदमी मरा अमरीका में—एडगर कायसी। चालीस साल पहले उन्नीस सौ पांच में वह बीमार पड़ा और बेहोश हो गया। तीन दिन कोमा में पड़ा रहा। चिकित्सकों ने आशा छोड़ दी, और कहा कि हमें इसे कोमा के बाहर, बेहोशी के बाहर लाने का कोई उपाय नहीं सूझता। तीसरे दिन शाम को चिकित्सकों ने कहा, अब हम विदा होते हैं, अब हमारे वश के बाहर है। चार—छह घण्टे में युवक मर जाएगा, और अगर बच गया तो सदा के लिए पागल हो जाएगा, जो कि मरने से भी बुरा सिद्ध होगा। क्योंकि जितनी देर हो रही है उस बीच इसके मस्तिष्क के जो सूक्ष्म तन्तु हैं, वह विसर्जित हो रहे हैं। पर अचानक चिकित्सक हैरान हुए। कायसी जो बेहोश पड़ा था बोला, जैसे कि कोई गहरी नींद से अचानक बोले। हैरानी और ज्यादा हो गयी, क्योंकि उसका कोमा जारी था। उसका शरीर अभी भी पूरी तरह कोमा में था। लेकिन वाणी आ गयी, और कायसी ने कहा कि शीघ्रता करो, मैं एक वृक्ष से गिर पड़ा था, मेरी रीढ़ में पीछे चोट लग गयी है और उसी चोट के कारण मैं बेहोश हूं। अगर छह घण्टे में मुझे ठीक नहीं किया गया तो बीमारी का जहर मेरे मस्तिष्क तक पहुंच जाएगा, फिर मेरा जिन्दा बचना असम्भव हो जाएगा। तुम इस नाम की जड़ी—बूटियां ले आओ और उनको इस तरह से तैयार करके मुझे पिला दो, मैं बारह घण्टे के भीतर ठीक हो जाऊंगा। इतना कहकर कायसी फिर बेहोश हो गया। जो नाम उसने लिए थे जड़ी—बूटियों के, आशा भी नहीं हो सकती थी कि कायसी को उनका पता हो, क्योंकि चिकित्सा से कभी कोई उसका संबंध नहीं था। चिकित्सकों ने कहा, और तो करने का कोई उपाय नहीं है, यह निपट पागलपन मालूम पड़ता है, क्योंकि ये जड़ी—बूटियां इस तरह का काम करेंगी, यह हमको भी पता नहीं है। लेकिन जब कोई उपाय न था, तो हर्ज भी कुछ नहीं था। वे जड़ी—बूटियां खोजी गयीं। जैसा बताया था कायसी ने, वैसा बनाकर उसे दिया गया। बारह घण्टे में वह होश में आ गया, और बिलकुल ठीक हो गया। होश में आकर वह न बता सका कि उसने ऐसी कोई बात कही थी। वह उन दवाइयों के नाम भी न पहचान सका, वे जड़ी बूटियाँ जो उसने कही थीं। उसने कहा, यह हो ही कैसे सकता है? मुझे तो कुछ पता नहीं है।

तब एक बहुत अनूठी घटना की शुरुआत हुई। कायसी उसमें कुशल हो गया, और उसने अमरीका में तीस हजार लोगों को अपने पूरे जीवन में ठीक किया। जो भी निदान उसने किया वह सदा ठीक निकला, और जिस मरीज ने उससे निदान लिया वह सदा ठीक हुआ, निरपवाद रूप से। लेकिन कायसी खुद भी नहीं समझा सकता था कि उसे होता क्या है? इतना ही कह सकता था कि जब भी मैं आंख बन्द करता हूं कोई निदान खोजने के लिए, मेरी दोनों आंखें ऊपर चढ़ जाती हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मेरी पुतलियों को ऊपर खींचे जा रहा है, फिर मेरी दोनों आंखें भ्रू—मध्य में ठहर जाती हैं। तब मैं इस लोक को भूल जाता हूं फिर मुझे पता नहीं क्या होता है। इसे मैं भूलता हूं यहां तक मुझे पता है। फिर क्या होता है, इसका मुझे कोई पता नहीं। लेकिन जब तक मैं इसको नहीं भूल जाता, तब तक वह निदान जो मैं लेता हूं वह नहीं आता है। निदान उसने ऐसे—ऐसे दिए कि एक—दो निदान सोच लेने जैसे हैं। रथचाइल्ड अमरीका का एक बहुत बड़ा करोड़पति, अरबपति परिवार है। उस परिवार की एक महिला बीमार थी जिस पर करने को कोई इलाज नहीं बचा था, सब इलाज हो गए थे। फिर कायसी के पास उसको लाया गया। कायसी ने एक दवा का नाम दिया , रथचाइल्ड तो अरबपति परिवार था। सारे अमरीका में खोजबीन की गयी उस दवा की, पर वह दवा कहीं मिली नहीं। कोई यह भी नहीं बता सका कि इस तरह की कोई दवा है भी। सारी दुनिया के अखबारों में विज्ञापन दिया गया कि कहीं से भी कोई इस नाम की दवा की सूचना भेजे। कोई बीस दिन बाद स्वीडन से एक आदमी ने जवाब दिया कि इस नाम की दवा है नहीं। बीस साल पहले मेरे पिता ने इस नाम की दवा पेटेंट करवाई थी, लेकिन फिर कभी बनायी नहीं। वह सिर्फ पेटेंट है, कभी बाजार में आयी नहीं। दवा भी हमारे पास नहीं है, पिता मर चुके हैं, और वह प्रयोग कभी सफल हुआ नहीं। सिर्फ फार्मूला हमारे पास है, वह हम पहुंचा देते हैं। वह फार्मूला पहुंचाया गया, वह दवा बनी और वह ठीक हो गयी। लेकिन वह दवा कहीं थी नहीं दुनिया के बाजार में, जिसका कायसी को पता हो गया। दूसरी एक घटना में उसने एक दवा का नाम लिया। उसकी बहुत खोजबीन की गयी, वह दवा नहीं मिल सकी। सालभर बाद अखबारों में उस दवा का विज्ञापन निकला। वह दवा उस वक्त बन रही थी किसी प्रयोगशाला में जब उसने कहा, तब तक उसका नाम भी तय नहीं हुआ था। जो नाम उसने सालभर पहले लिया था उस नाम की दवा सालभर! बाद बाहर आयी। और उसी दवा से वह मरीज ठीक हुआ। कई बार उसने दवाएं बतायीं जो खोजी न जा सकीं और मरीज मर गए। वह भी कहता था, मैं कुछ कर नहीं सकता, मेरे हाथ की बात नहीं है।

यह भी पढें   याद किए गए बहुभाषाविद् प्रा.डॉ. कृष्णचन्द्र मिश्र

पंडित धीरेंद्र शास्त्री आजकल अपनी रामकथा और दिव्य दरबार को लेकर बहुत चर्चित हो रहे हैं। उनके दिव्य दरवार में पहले सैंकड़ों लोग अपनी समस्या लेकर आते हैं। उन हजारों लोगों में से पंडित धीरेंद्र शास्त्री जी किसी का भी नाम लेकर उन्हें बुलाते हैं और वह व्यक्ति जब तक उनके पास पहुंचता तब तक शास्त्रीजी एक पर्चे पर उस व्यक्ति के नाम पते सहित उसकी समस्या लिख लेते और उसी में उसका समाधान भी लिख लेते। लोग आश्‍चर्य करने लगे की यह व्यक्ति किस तरह दूर दूर से आए अनजान लोगों को उनके नाम से बुला लेते है और कहता है कि आओ तुम्हारी अर्जी लग गई। धीरेंद्र शास्त्री यही नहीं लोगों को यह भी बता देते हैं कि उनकी समस्या क्या है, कितनी है और कब से है। उनके पिता का नाम क्या है और बेटे का नाम क्या है। कई मीडिया चैनल वालों ने इस बात की पड़ताल की लेकिन वह यह रहस्य नहीं जान पाए कि आखिर यह व्यक्ति कैसे लोगों के मन की बात जान लेता है? इसी बीच स्याम मानव नाम का एक षडयंत्रकारी अपनी आकाओं के आदेश पर कालनेमी के भूमिका में इनपर टूट पड़ा है। और हिंदुओं के आध्यात्मिक सामर्थ्य तथा अन्वेषण को अंधविश्वास कहकर कानूनी कार्यवाही की मांग कार रहा है। जबकि भारत लगायत विश्व के सभी सनातनी हिन्दू इनके समर्थन मे इकठ्ठा खड़ा हुए दिखाई देता है।

यह भी पढें   नेपालगन्ज में लायन्स इन्टरनेशनल के आयोजन में १२५ लोगों ने किया रक्तदान

कट्टर सनातनी हिन्दू धर्म के प्रचारक शास्त्री जी रामकथा के दौरान ही वे कुछ ऐसे भी बोल जाते थे कि जिससे विवाद उत्पन्न हो जाता है। हाल ही में उन्होंने रामनवमी के जुलूस पर पत्‍थर फेंके जाने वाली घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए हिन्दुओं को कहा कि जाग जाओ और एक हो जाओ अगर तुम अभी नहीं जागे तो यह तुम्हें अपने गांव में भोगना पड़ेगा। इसलिए निवेदन है कि सब हिंदू एक हो जाओ और पत्थर मारने वालों के घर पर बुलडोजर चलवाओ।

पंडित धीरेंद्र शास्त्री एक बहुत ही गरीब परिवार में 4 जुलाई 1996 में छतरपुर जिले के छोटे से गांव ग्राम गड़ा में जन्में थे। दान दक्षिणा ही परिवार का भरण पोषण होता था।। पंडित धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री ने बड़ी मुश्‍किल हालातों में 8वीं तक पढ़ाई अपने गांव में की। इसके बाद की पढ़ाई के लिए वे 5 किलोमीटर पैदल चलकर गंज में जाते थे। वहां से उन्होंने 12वीं तक की पढ़ाई की और फिर बाद में बीए प्राइवेट किया। लेकिन बाद में हनुमानजी और उनके स्वर्गीय दादाजी की ऐसी कृपा हुई की उन्हें दिव्य अनुभूति का अहसास होने लगा और वे भी लोगों के दु:खों को दूर करने के लिए दादाजी की तरह ‘दिव्य दरबार’ लगाने लगे। पंडित धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री अपने दादाजी को ही अपना गुरु मानते थे। उन्होंने ही उन्हें रामायण, और भागवत गीता का अध्ययन करना सिखाया था। हालांकि 9 वर्ष की उम्र में ही वे हनुमानजी बालाजी सरकार की भक्ति, सेवा, साधना और पूजा करने लगे थे। कहते हैं कि इसी साधना का उन पर ऐसा असर हुआ की, बालाजी की कृपा से उन्हें सिद्धियां प्राप्त हुई।

एडगर kaaisi

ओशो कहते हैं की “पिछले दो सौ साल में हमारी जो भी पौराणिक जानकारी थी उससे हमारे सारे संबंध टूट गए। और अंग्रेज के एक नयी जानकारी से जोड़े गए जिसका पुरानी जानकारी से कोई संबंध नहीं था। अब हमसे अंग्रेज ज्यादा पुराने हैं। अब हमारे पास जो जानकारी है वह पाश्चात्य जगत का कचरा है, उच्छिष्ट है। ज्ञान के सूत्र जब खो गया है और उनका ऊपरी ढांचा को हम धोने को विवश हैं। तो कई बार ऐसी घटना घटती है कि बड़ी कीमत की चीजें, जो नासमझ हैं, वह बचाए रखते हैं। और जो समझदार हैं, पहले छोड्कर खड़े हो जाते है। जिंदगी में बड़े दांव—पेंच हैं। अगर ठीक से हमें भारत के यह दो सौ साल का जो अंतराल पड़ गया है वह पूरा करना हो, तो भारत में आज जो—जो काम बुद्धिहीन कर रहे हैं उसको वापस सोचने की जरूरत है—एक—एक बिंदु को। क्योंकि वह अकारण नहीं कर रहे हैं। उनके साथ बीस हजार साल की लंबी घटना है। वह नहीं बता सकते हैं कि क्यों कर रहे हैं? इसलिए उन पर नाराज होने की कोई जरूरत नहीं है। किसी दिन हमको उन्हें धन्यवाद भी देना पड़ सकता है कि कम से कम तुमने प्रतीक तो बचाया था, जिसकी पुन: खोज की जा सकती है। तो आज भारत में जो बिलकुल ग्रामीण और नासमझ, जिसकी कुछ समझ नहीं है, कोई ज्ञान नहीं है, जिसको हम छू कह सकते हैं, वह जो—जो कर रहा हो उसको फिर से उठाकर दो सौ साल के पहले के सूत्रों से जोड्ने की, और बीस हजार साल की समझ के साथ पुनरुज्जीवित करने की जरूरत है। और तब आप चकित हो जाएंगे। तब आप बिलकुल हैरान हो जाएंगे कि हम किस बड़े आत्मघात में लगे हुए हैं! तो स्याम मानव जी लगायत के आँखों पर बंधे पट्टियों को खोलने के लिए अब सनातनी हिंदुओं को पूर्ण समझदारी के साथ आगे आन ही होगा।

नोट: जिस पीठाधीश्वर और शंकराचार्यों को ध्यान की गहीराई और आध्यात्मिक तत्वों का अनुभव से बोध नहीं है वो भी चुप रहें। क्योंकि अनुभवहीन ज्ञान जो रटा रटाया हो, वो दो कौड़ी का होता है।

 

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *