आत्म दाह या शहादत ? : कैलाश महतो
कैलाश महतो, पराशी ।जनवरी २४ को देश की राजधानी त्रासदीपूर्ण बना । इलाम के एक उद्योगी युवा ने संसद के सामने, वह भी तब जब संसदीय कार्यक्रम समाप्त करके देश के प्रधानमंत्री अपने सुरक्षा दस्ता और गाड़ियों के काफिले सहित संसद से उस रास्ते बाहर निकल रहा होता है ।
प्रेम आचार्य ने अपने शरीर में आग लगाने से पहले योजनाबद्ध हुआ होगा । संसद की समाप्ति और प्रधानमन्त्री के निकास के रास्ते और समय का उन्होंने जायजा लिया होगा । संसदीय कार्यक्रम समाप्ति और प्रधानमन्त्री की निकास सडक की सारी जानकारी संसद के किसी करीबी जानकार के गाइड लाइन पर घटना होने का अनुमान लगाया जा सकता है ।
प्रेम जी ने आत्म दाह तो की । अगर वे चाहते तो, मानव बम बन सकते थे । “अफजल खान” के रुप में दाखिल हो सकते थे । वे श्रीपेरंबदूर की “धनु” हो सकते थे । वे “जॉन वाइक्स बूथ” और “बबुश्का लेडी” के भूमिका में भी आ सकते थे । आखिर जो युवा, जो इतना बडा जोखिम उठा सकता था, तो वह कुछ भी कर सकता था । दर्जनों को मारकर भी वो अपने को मार सकता था । उसके बावजूद उन्होंने अन्य किसी को कुछ न बिगाडकर अपने आपको आत्मदाह करने के कारणों को अनुसंधान करने बाले भले ही अपना कुछ दलिल पेश करें, मगर प्रेम आचार्य जी ने साहसिक आत्मदाह किया है । स्व. आचार्य का वह आत्मदाह नहीं, शहादत है । उन्हें राज्य के बेतिथी विरुद्ध का “राष्ट्रीय शहीद” घोषणा करना चाहिए ।
अनुसंधान बाले जितने भी अनुसंधाननीय दलिलें पेश कर दें, मगर प्रेम आचार्य के आत्मदाह पर होने बाले अनुसंधानों पर भी अनुसंधान की जानी चाहिए । जीवन त्याग के लिए महीनों से स्व. आचार्य ने योजना बनायी थी । माथा पिची की होगी । जिने की राह ढूँढी होगी । परिवारों के साथ, व्यापारों के साथ और भरोसों के साथ जीना चाहा होगा । मगर जीने के सारे रास्ते बन्द हो चुके थे । जब सारे रास्ते बन्द हो जाते हैं, तो आदमी एक अन्तिम परम सत्य मित्र का तलाश करता है और पाता है कि स्व-मौत से बडा दुनिया में विश्वस्त कोई सम्बन्ध भी नहीं है ।
प्रेम आचार्य ने आत्मदाह से पूर्व तकरीबन ६ हजार से ज्यादे शब्दों का आत्म वृतान्तमक लेख लिखा था । उसमें उन्होंने अपने परिवार और बच्चों के बीच प्रेमपूर्ण जीवन की आकांक्षाएँ पेश की है, जो उनके नसीब से दूर हो गया । सबसे हिला देने बाली बात यह कि आर्थिक हालातों से मुरझाये उनके परिवार में पति और पत्नी के बीच अव्यक्त यह खेल चल रहा था कि कौन कब किससे पहले दुनिया छोड दें, और प्रेम जी ने पत्नी को जीवित रखने के लिए अपने को बलि चढा दिया । उनके अनोखा पारिवारिक लगाव और पत्नी प्रेम ने भी उस एक अंग्रेजी कहानी “The Scarlet Letter” की याद दिलाती है, जहाँ एक पति ने अपनी पत्नी की सुन्दर बाल को सजाने के लिए अपने सोने का घड़ी बेच देता है और पत्नी अपने पति के हाथ में रहे सोने के घडी में रहे छाले के भद्दे फिता को बदलने खातिर घडी की सोने चैन खरीदने के लिए अपनी सुन्दर बाल बेच देती है ।
नेपाल के धरती पर कुछ दिनों के अन्दर दो प्रेम देखा गया है । दोनों प्रेम अटूट है । एक प्रेम ने अपने प्रेम को सुरक्षित रखने के लिए अपनी कुर्बानी दे देता है, वहीं दूसरी तरफ सत्ता प्रेम ने नेताओं को अपने देश और जनता को रोड प्रेमी बनाया है । कहा जाता है कि प्रेम अन्धा होता है । कुछ अनुभव मेरे भी हैं । उसमें जात पात और उंचाई निचाई नहीं होता, धर्म और मज़हब किसी काम के नहीं होते । सत्ता प्रेम एक तरफ सारी हदें पार कर विपरीत वादियों (isms and ists) के बीच में उन्मादी प्यार बर्षाया है, और सत्ता प्यास ने सत्ता हवस को मिटाने के लिए सारे बन्धनों को तोडकर सत्तायी हमबिस्तरी हुआ गया है ।
सत्ता के जोश में मुग्ध नेताओं को इतना भी होश नहीं कि उसके इर्दगिर्द लोग खडे हैं । जनता क्रुद्ध है । ब्याकुल है । बाहर बाले मस्ती और चुटकी ले रहे हैं । बाहर भूखे अस्त व्यस्त युवा अपने पानी और जवानी के दूकान खोले बैठे हैं । इतनातक होश नहीं कि अन्तिम वह दूकान भी न चलने के बाद वह आत्मदाह और आत्म हत्या कर रहे हैं ।
बड़े आश्चर्यजनक और दुर्घटनायी जनवरी २४ का वह दिन, जिस दिन प्रेम आचार्य देश के संसद के सामने आत्मदाह करता है, सप्तरी छिन्नमस्ता का रामदेव मरिक आत्म हत्या करता है और उसी रोज खाडी मुल्कों से एक पूर्व माओवादी लडाकू और थप कामदारों की बक्से में लाशें आती हैं, वहीं देश में लोकतान्त्रिक गणतन्त्र लाने बाले पार्टियाँ, नेता और प्रशासकों का हर दिन, हर मिनेट और हर बहस में देश और जनता की सेवा करने, देश की विकास करने, देश को आर्थिक रुप में समृद्ध बनाने और मुल्क से गरीबी खत्म करने का भाषण घटने का नाम नहीं है ।
जनवरी २४ (माघ-१०) के दिन घटे दो संसार छोड घटनाओं के बीच भी खासा विभेद और दोहन खुल्लम खुल्ला है । वह यह कि इस राज्य ने एक वर्ग को इतना हिम्मत और चेतना दिया है कि वह देश के राजधानी और संसद भवन के सामने आकर आत्मदाह कर अपने शासकों को चुनौती देता है, वहीं दूसरा यह कि दूसरे वर्ग के आत्महत्याकर्ता चुपके से किसी पेड से लटक जाता है – जिसका न तो खास ही कोई सामाजिक स्टण्ट होता है, न राजनीतिक मुद्दा बनता है, न मीडिया प्रचार होता है । एक समाज के मृतक को राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीयकरण किया जाता है, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय श्रद्धांजली, प्रतिकृया और सहयोगों की बौछार लगती हैं, वहीं दूसरे वर्ग और समुदाय के कुर्बानियों का कोई गिनतीतक नहीं होती ।
एक ही देश में एक ही राज्य के बन्दुकों से मारे गये लोग राज्य के लिए महान् शहीद होते हैं और उसके लिए राष्ट्रीय पर्व मनाया जाता है, जबकि दूसरे समुदाय के शहीदों का कोई स्थान नहीं । एक वर्ग के शहीदों का तस्वीर राज्य के हर कार्यालय और निकायों में मिलते हैं और दूसरे समुदाय के शहीदों का कोई हैसियत नहीं ।
देश के राजनीतिक और शासकीय प्रवृत्ति समेत ने विभेद बनाकर यह कहना चाहता है कि तुम कुछ भी हो जाओ, हमारे सामने गुलाम के आलावे कुछ नहीं । गणतान्त्रिक नेपाल के प्रथम निश्कलंक राष्ट्रपति डा. रामबरण यादव और वर्तमान राष्ट्रपति विद्या देवी भण्डारी के पदीय और माननीय सम्मान के व्यवहार और सम्मान के दायरे ज्वलन्त उदाहरण है । देश के प्रथम दोषरहीत राष्ट्रपति के एक भी तस्वीर किसी सरकारी या गैर सरकारी कार्यालयों, संस्थानों व निकायों में नहीं मिलते, जबकि कलंक और विवादों से विभूषित राष्ट्रपति भण्डारी की तस्वीरों का समस्त सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं में बिना किसी मसक्कत के दर्शन कर सकते हैं ।
राज्य के ये और ऐसे विभेद, निकृष्ट व्यवहार, निर्वाचन प्रणाली की भ्रष्टता, संसद की असफलता, सरकार की अकर्मण्यता और प्रशासन की भ्रष्टता अन्त्य के साथ ही समस्त जनधन की सुरक्षा के लिए प्रथम शर्त सरकार को यह स्वीकार करना बेहतर होगा कि मानवीय, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूपों में भी देश को नयापन देने हेतु मौजूदा संसद और सरकार को अविलम्ब भंग/विघटन कर साझा समानुपातिक लोकतन्त्र बाला अन्तरिम संसद और सरकार की निर्माण हो ।

