सौ बार धन्य वह एक लाल की माई : रश्मि रानी
“हरि अनंत हरि कथा अनंता,
कहहिं सुनहिं बहुबिधि संता।।
रामचन्द्र के चरित्र सुहाए।
कलप कोटि लगी जाहिं न गाये।।”
इस मिट्टी के तो
कण -कण में महाकाल बसे हैं, जन जन में श्री राम हैं,
प्राणो में है माता जानकी ,मन में बसे हनुमान हैं।
कहा था कोमल ने,” जीजी लिख ली!”
मैंने कहा,” क्या? मुझे तो कुछ याद ही नहीं ,किस बाबत ? ”
” राम पर, रामायण के किसी प्रसंग पर,तथ्य पर अपने नजरिये पर ,अपने शब्दों में लिखनी है। ”
“अच्छा! मैं तो भूल ही गयी ,मेरे दिमाग से ही निकल गया, और सच कहूँ तो मन के किसी कोने में भी लिखने का विचार नहीं आया ।पर जानती हूँ ,”होइहें सोई जो राम रची राखा।” अगर प्रभु की इच्छा हुई तो लिख सकूंगी, नहीं तो कोई विचार अभी तक तो न बने।”
“जीजी ! आप लिख लोगी मुझे पूरा विश्वास है। “और हमारी बात खत्म हो गयी।
मन में था, शायद नहीं ही लिखूँगी ,और उसके आधे घण्टे बाद मन में स्मृतियां सजल होने लगीं।राम को कब मैंने पहली बार जाना !कब सुना !कब समझा! कलम चलने लगी। आँखों के सामने जैसे दृश्य चलायमान हो उठे।
उम्र ,उस समय कितनी रही होगी ठीक -ठाक याद नहीं , पर शायद छह -सात के बीच ही रही होउंगी। ठीक -ठाक पढ़ना सीख लिया था। कुछ भी फर्राटे से पढ़ सकती थी। पापा मेरे प्राध्यापक थे , गाँव के ही स्कूल में। स्कूल के दरवाजे चोर उखाड़ के लेकर गए थे ,सो बहुत सारी किताबें, तरह -तरह की मेरे घर पहुंच गई थी। एक तरह से छोटा सा पुस्तकालय ही बन गया था मेरा घर ,जिसमें बच्चों की कविता, कहानियां, परियों की कथाएँ, राक्षस की कहानियां,लोक कथाएं ,सौ कहानियां ,नाटक इत्यादि थे।कोर्स की किताबें तो थी ही जिनसे मेरा मतलब नहीं था ज्यादा । एक दिन किताबें ढूंढते- ढूंढते एक किताब हाथ आयी शीर्षक था “राम -कथा”, आवरण पृष्ठ पर राम जी की धनुष बाण लिए मनमोहक सी तस्वीर थी ,और अग्नि में कोई स्त्री जल रही थी।थोड़ी मोटी सी किताब लगी। इतनी मोटी पुस्तक अभी तक न पढ़ी थी। मन में दुविधा भी थी इतनी मोटी पुस्तक कैसे पढ़ूंगी।खैर हिम्मत कर ली कि पढूँगी तो बस पढूँगी। निकाल कर ले आयी।
कहानी कहाँ से शुरू हुई कहाँ से नहीं ,याद नहीं, पर पहला कौतूहल मन में हुआ राजा की तीन रानियां थीं। एक राजा की तीन रानी ,और तीनों के कोई पुत्र न हुआ तो किसी ऋषि ने उन्हें दो फल दिए और कहा, ” जाओ राजा,अपनी रानियों को खिला देना ।उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति अवश्य होगी।” दुविधा बड़ी थी फल दो, और रानियां तीन। तब बड़ी रानी और छोटी रानी ने अपने हिस्से के फल आधा-आधा बीच वाली रानी को दिए। कुछ समय बाद उन्हें सुंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।जिस रानी को दो भाग मिले थे। उन्हें दो पुत्र प्राप्त हुए। पहले राजकुमार का नाम राम, दूजे का भरत और जिन्हें दो फल मिले थे उनके लक्ष्मण और शत्रुघ्न हुए। ये कहानी मन पे असर कर रही थी। कौतूहल भी जगा रही थी। बाल मन फल खाने से डरने लगा । और कटे फल तो और भी न। कहीं जो मुझे बच्चा हो गया तो..! मैं तो अभी खुद बच्ची हूँ। ये डर मन में काफी समय तक बना रहा।
एक प्रसंग ‘श्रवण कुमार ‘ का भी आया ,और ये प्रसंग मेरे स्कूल के माटसाब सुना चुके थे ,तो इस प्रसंग से खुद को रिलेट कर पा रही थी। क्योकि हमारा स्कूल जहां था, वहां पास में ही बड़ा पोखर था। आस -पास में पेड़- पौधे ,झाड़ -जंगल भी उगे ही थे।बरगद ,पीपल ,महुआ आदि के खूब सारे पेड़ थे वहां पर। फूल इमैजिनेशन में वो सारे सीन मन में कैद थे। लगता था श्रवण कुमार के माता- पिता यहां बैठे होंगे।पोखर के इस तरफ श्रवण कुमार पानी भर रहा होगा,और दुष्ट राजा ने उस तरफ झाड़ियों के पीछे से बाण चला दिया। राजा को एहसास हुआ कि कुछ बहुत गलत हुआ है।उससे महापाप हुआ है।दौड़ कर पहुंचा राजा श्रवण कुमार के पास। श्रवण कुमार अपने अंधे माता- पिता को तीर्थाटन कराने लेकर निकला था बहंगी में बिठाकर।प्यास लगी थी माता पिता को ,तो पानी भरने मटका लेकर आया था। आह! जीवन का आखिरी क्षण है, वो कुछ न कर पाया ।उसे काफी अफ़सोस हो रहा था ।न तीर्थाटन ही करा पाया ,न अपने प्यासे माता- पिता को पानी ही पिला सका।प्राण तन से निकल रहा पर मन माता -पिता में ही अटका है। आप कृपा कर उन्हें पानी पिला दीजिएगा, राजन!मैं अभागा ! उनकी कोई इच्छा नहीं पूरी कर सका।आप उनका ख्याल रखियेगा ।
“धन्य हैं वो माँ -बाप ,जिसने तुझ जैसा बेटा जना ! जब तक सूरज -चाँद रहेगा तब तक तेरा इस धरा पे नाम रहेगा । ” राजा दशरथ ने ‘श्रवण कुमार ‘का सर अपने गोद में रख कर रोते हुए कहा। माँ -बाप की इकलौती औलाद श्रवण कुमार , उनकी आँखों का तारा ,भगवान को प्यारा हो चुका है ।उनके शोक के आगे सागर का जल भी कम पड़ गया।।राजा को श्राप दिया ,”जा जिस तरह मैं अपने पुत्र के वियोग में तड़प कर जान दे रहा हूँ।तू भी एकदिन तड़पेगा वियोग में। तू भी अपने प्राण त्याग देगा।”और उन दोनों के प्राण पखेरू उड़ गए।
माटसाब ये प्रसंग इतनी बार सुना चुके थे और अभी इस “राम -कथा” में खुद से पढ़कर अलग ही अनुभूति से भर चुकी थी।मन रोमांचित भी था। बाल मन भींग रहा था। राजा को तकलीफ़ बहुत थी, महापाप हुआ मुझसे।पर अचानक से ख़ुशी भी हुई।उन्हें तो पुत्र ही नहीं,उन्होंने श्राप दिया है,’पुत्र वियोग में मरूंगा ‘,तो मेरे पुत्र होंगे मतलब।
कहानी बढ़ती रही…मैं पढ़ती रही…।जितनी कहानी आगे बढ़ती रही मेरा मन उत्सुकता से, रोमांच से भरता रहा। ताड़का वध,अहिल्या उद्धार और राम के ब्याह का प्रसंग तो सबसे सुखद लग रहा था।
“जो धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा वही मेरी पुत्री सीता से ब्याह कर पायेगा। स्वयंवर में एक से एक राजा आये जो बहुत ही धीर -वीर थे।राजा जनक के उद्घोष से सारे राजा प्रसन्न थे और सब में होड़ मची थी सीता जैसी सुंदरी से ब्याह उनका ही होगा ,पर सीता तो राम को पसन्द कर चुकी थीं ,और राम ने सीता को। अब आगे क्या होगा? उत्सुकता चरम पर थी मेरी।
एक से एक ऐश्वर्यवान ,वीर ,बलशाली राजा आये ,पर किसी से धनुष टस से मस न हुआ । सबकी उत्सुकता चरम पर ।सब आँखें फाड़े सारा दृश्य देख रहे थे। राजा जनक को गुस्सा आ गया । दुख ,क्षोभ ,गुस्से के सम्मिश्रित भाव से बोले,”ये धरती वीरों से खाली हो गयी है क्या? कोई वीर न बचा?जिस धनुष को मेरी पुत्री ने बचपन में ही उठा लिया था।उस धनुष को कोई वीर हिला तक न पा रहा।हे विधाता! ये कैसी प्रतिज्ञा कर ली थी मैनें ?राजा फफक पड़े। तभी लक्ष्मण जी गुस्सा हो कर उठ गए।हे राजन ! ऐसा न कहिये। जब रघुकुल नंदन यहां पर हों तो ऐसा कहना ही अपमान है। ये हमारा तिरस्कार है। अभी मेरे भैया राम को इजाज़त दीजिये।
राम ने गुरु की आज्ञा लेकर झटके से धनुष उठा लिया।प्रत्यंचा जैसे ही चढ़ानी चाही, धनुष जोर की आवाज के साथ टूट गयी। सीता ने वरमाला राम के गले में डाल दी थी।
और इधर लालटेन भभक चुका था।अब पढ़ना पॉसिबल नहीं था। इतनी सुंदर कहानी कभी न पढ़ी थी। मन अलग ही आनंद से भर रहा था। किसी को भी कहानी बताना नहीं चाह रही थी।लगा पहले पूरी पढ़ लूँ,फिर कहानी बताऊंगी। अगले दिन फिर वही स्कूल ,वही दिनचर्या ,पर मन में बस राम कथा। कोई पढ़ने- खेलने में मन न लग रहा था।बस उस पोखर से आज और जुड़ाव महसूस कर रही थी।जैसे श्रवण कुमार वाले सारे कर्मकांड यही हुए हों।
गर्मियों के दिन थे ,दोपहर में ही छुट्टी हुई।पापा के संग ही आना -जाना था। मैं जो सारी बातें कहती रहती थी।पूछती रहती थी ,अभी जाने क्यों ,कुछ पूछ न रही थी उनसे ,बस मन में कल्पना के घोड़े दौड़ रहे थे। लगा जल्दी से पढ़ लूँ, फिर ये अद्भुत कहानी सुनाऊँगी। घर पहुंच कर खाना और सोना ही था। खेलने की इजाजत नहीं थी दोपहर में।
भाई मेरे दोनो ननिहाल गए हुए थे उन दिनों ,तो बस मैं ही थी घर में ,और उस पल में राम। मेरे मम्मी- पापा सो गए, ये जानकर की मैं सो गई।उन्हें डर रहता था कहीं भाग न जाउँ घर से, क्योकि तितलियों के पीछे पागल सी थी मैं। दिन- दोपहर कुछ न देखती थी ,बस उन्हें पकड़ना ,उन्हें उड़ाना।तरह तरह की रंग- बिरंगी तितलियाँ पकड़ना।सब के नाम भी रख छोड़े थे।किसी के बघवा,किसी के हजारा, किसी के नीलू,किसी के पीलू। जाने क्या पागलपन था मेरा! क्या दीवानगी थी मेरी!पर शायद यही बचपन है ।जो बाद में सारी उम्र याद आता है।
खैर !जब यकीन हो गया मम्मी -पापा सो गए तो मैं छत पर कि कोठरी में पहुंच गई ।राम -कथा बाकी थी, अभी तो आधी भी न हुई थी।
फिर से विवाह प्रसंग तक पहुंचने में पन्ने पलटते रही,
और मिला तो लगा जैसे जुग जीत लिया हो।
अरे !ये क्या…! धनुष की टंकार सुनकर कोई ऋषि गुस्से से लाल पीले हो गए।
“किसने तोड़ा? किसने तोड़ा शिव का ये धनुष?” सारी सभा चुप! परशुराम हैं ये ।बहुत गुस्से वाले हैं। सारे क्षत्रियों का संहार कर दिया था।अच्छा ये “क्ष वाले क्षत्रिय ” का, मन ने कहा।सबने प्रणाम किया । राजा जनक ने आसन ग्रहण करने का निवेदन किया। उनके गुस्से को शांत करने की कोशिश की ,पर उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था। लक्ष्मण जी से बहस हुई।पर राम जी ने उन्हें शांत किया। जाने कौन सी लीला राम जी ने दिखाई की एकदम से शांत हो गए। दोनो वर- वधु को आशीर्वाद दिया,आशीर्वचन बोले ,और प्रसन्न मन से चले गए। पूरा जनकपुर खुशी से झूम उठा।
अयोध्या खबर की गई ।राम के कारनामे बताए गए।राजा दशरथ ,दोनो भाई और माताएं ,फूली न समा रही थीं। सारी प्रजा नाच- ग़ा रही थी। मैं भी उतनी ही खुश हो रही थी ,जैसे कोई खज़ाना पा लिया हो। इतनी खुशी पहले शायद ही कभी हुई हो ।इतना रोमांच से कब भरी थी! याद नहीं। लगता था रोम -रोम पुलक रहा था। जैसे अभी तक महसूस करती हूँ उस पुलकन को ।पढते – पढ़ते कब आँख लग गयी पता न चला ।मैं वहीं सो गई। इधर
मम्मी – पापा हैरान परेशान। मैं तो उनके बीच थी ही नहीं। सम्भावित जगहों पर ढूंढा गया,पर न मुझे मिलना था न मिली।शाम होने को आई, आज माँ -बाप की चिंता समझ सकती हूँ कि किस तरह की हुई होगी। कहाँ -कहाँ नहीं ढूंढा था पापा ने ।बहुत लोगों के घर तो मैं जाती नहीं थी ,पर खेत- खलिहान बहुत घूमती थी।
सांझ घिर रही थी, मम्मी संझा -बाती क्या ही करती ! मन आशंकाओं से भरा था, पर जाने क्या विचार आया कि सोचा, दीया- बाती कर लेती हूँ।तब तक शायद ढूंढ कर ले आएंगे पापा।मन मे विचार आते ही मम्मी ने दीया- बाती भगवान जी के सामने जला कर कर, हर घर में दीया दिखाने लगी।जब छत पर गयी कोठरी में तो मैं कमरे में चैन से सो रही थी,और राम जी पास में मुस्कुरा रहे थे।मम्मी को तो जो अनापेक्षित ख़ुशी मिली उसका वर्णन ही नहीं किया जा सकता।मुझे झिंझोड़ कर उठायी।शाम हो गयी।
“उठ रानी!”
मुझे तो लगा सुबह ही हो गई।अब स्कूल जाना है। ये देखो ,”गोदी में चिल्का नगर में ढिंढोरा” इसी को कहते हैं। और हँसने लगी।मुझे लेकर नीचे उतर आई।
पापा मेरे ,मुंह लटकाए उसी समय घर आये, और जब मुझे देखा तो लगा, ‘जैसे जान में जान’ आयी ,पर गुस्से से आँखें लाल दिख रही थीं।वस्तुस्थिति को जान कर पापा ने दुलराया ही। बताया कि कहाँ- कहाँ तक मुझे ढूंढ आये थे।मुझसे कहा ,अच्छा !’राम-कथा’ पढ़ रही थी , पूरी कहानी जरूर बताना। मैंने कहा,” हाँ ,बताऊंगी जरूर ।पर अभी तो आधी ही पढ़ी है।” अब रात हो गयी।आज खेलने भी न गयी थी। खा- पी कर जल्दी से पापा के दिये टास्क पूरे किए। स्कूल में ज्यादा न मिलते थे ,और फिर मैं छत पर लालटेन की रोशनी में राम-कथा पढ़ने लगी।
राम जी का सीता जी से ब्याह हो गया ,साथ ही तीनों भाइयों का भी सीता जी की तीनों बहनों के साथ।अद्भुत ही दृश्य उपस्थित हो गया। क्या नर !क्या किन्नर !क्या गन्धर्व!सब खुशी से झूम रहे थे ,नाच रहे थे। ढोल -नगाड़े की आवाज से पूरी पृथ्वी जैसे गुंजायमान हो उठी थी। देवता- गण भी आकाश से पुष्प वर्षा करने लगे।
मैनें आकाश को देखा।चाँद मुस्कुरा रहा था, तारे टिमटिमा रहे थे।सोच रही थी ,आसमान में सुराख होगा क्या ?कैसे फूल झड़ेंगे? मेरे कल्पना के घोड़े भी साथ ही दौड़ने लगे। मैं भी ब्याह छत पर ही करूँगी।देवता लोगों को पुष्प वर्षा करने में आसानी होगी। पर वे खड़े किधर ,कैसे होंगे? मन में देवता और पुष्प वर्षा का ख्याल पूरे रामकथा पर जैसे भारी पड़ गया। वो स्मृतियां आज भी इतनी सजल हैं जैसे कल की ही बात रही हो।
पप्पा – मम्मी भोजन करने के उपरांत छत पर आये।मेरा भोजन छत पर ही आ गया।भोजन उपरांत पापा का तो डेली रूटीन फुटहरा, पहाड़ा, वर्ड मीनिंग चलने लगा।जिसमें मुझे बहुत मज़ा आता था।।सब खत्म होने पर दोनों के बीच लेट गयी।
” ए पप्पा! मेर ब्याह इसी छत पर ही कीजियेगा न! ”
“काहे ? ”
“बस आप बोलिये न! छत पर कीजियेगा न!”
” नहीं ,सबका आँगन में होता । ” पप्पा ने कहा।
“नहीं, आँगन छोटा है। बहुत सारे देवता रहेंगे।किधर फूल रखेंगे ?किधर खुद रहेंगे?बस मेरा ब्याह छत पर होना चाहिए। ”
अब मम्मी -पापा , जोर-जोर से हँसने लगे।
“कहाँ पढ़ी हो? देवता आएंगे तुम्हारे ब्याह मे ! पापा ने मुस्कुराते हुए कहा।
“सब में आते न! मेरे में भी आएंगे।सीता -राम जी के ब्याह में आये ,तो मेरे में भी आएंगे ।आप बुला लीजिएगा बस!” मैंने तूनकते हुए कहा।
“अच्छा सुनिए, पप्पा! कालिदास जैसा मुझे नहीं चाहिए। जिस डाल पर बैठे उसी डाल को काटे। राम जी जैसा चाहिए। आप स्वयंवर मेरा भी कीजियेगा ,उसमें धनुष भी रख दीजिएगा।जो राम होंगे ,वो तोड़ेंगे।”
पप्पा जो शाम को इतने परेशान थे बस हँस रहे थे।
“और जो न कोई तोड़ा तो”?पापा ने कहा
“हें ,ऐसा कैसे होगा? आप बहुत सारे लोग बुलाना।कोई न कोई तोड़ ही देगा ।पप्पा तो जैसे मुझे चिढ़ाने पर आ गए थे।कोई काला -कलूटा बैगन लुटा धनुष तोड़ दिया तो ! मैं रुआंसी सी हो गयी, सोच में पड़ गयी। आश्वस्त होना चाहती थी कि ऐसा कुछ नहीं होगा ।मम्मी से कहा “मम्मी! ऐसा कुछ नहीं होगा न! राम जैसा सुंदर वर तो मिलने चाहिए मुझे।मिलेंगे न!
वैसे राम जैसे वर मिले ,ये हर माँ चाहती ।पर सीता जैसा जीवन मिले, ये कोई माँ न चाहती होगी।
मम्मी ने कहा, “मिलेगा कोई राजकुमार ही न, मेरी रानी के लिए।”
“हाँ ,और क्या ! ” मैं खुश हो गयी। पप्पा से कुट्टी कर ली ।मुझे आप से बात नहीं करनी ” कह कर मम्मी के गले से लिपट गयी।
“ठीक है ,और कुछ भी हो तो बता देना, क्या करना है ,क्या नहीं! सब लिस्ट लिख लेना । “पप्पा ने मनाने की कोशिश की ।पर मैं मानिनी ! गुस्सा नाक पर था।मेरे लिए काला- कलूटा बैगन लुटा लाएंगे।कभी बात न करूँगी।
बाल मन में कल्पना के असंख्य घोड़े दौड़ रहे थे। और मैं धीरे -धीरे नींद की आगोश में।
अगले दिन फिर दुपहरी को मैं छत पर कोठरी में भाग
गई ,और राम कथा में डूबने लगी। राम का राज्याभिषेक होने वाला है ।अरे! ये क्या! कैसी चाल चली कुटिल कैकई ने ?दो वरदान मांग लिए ,अपने भरत के लिए अयोध्या का राज्य, और राम के लिए वनवास ।बहुत गुस्सा आ रहा था कैकई पर,उसकी दासी मंथरा पर ।सामने मिलती तो झोंटा पकड़ – पकड़ के मारती। । राजा दशरथ ने राम के वियोग में प्राण त्याग दिए।मैं रोने लगी सुबक- सुबक कर ।फिर कब सो गई पता न चला।पर अब मेरी हिम्मत न हो रही थी कि मैं आगे पढूँ। किताब देखती ,पर छूती न थी।दो ,तीन दिन, गुजर गए। फिर एक दिन हिम्मत करी और पढ़ने लगी। भरत ननिहाल से लौट आये।सारी बात पता चली तो माँ को खूब खरी खोटी सुनाई।मंथरा दासी को तो शत्रुघ्न ने बालों से पकड़ कर घसीटा। पढ़ कर ही मज़ा आ गया।
मन बहुत देर बाद बहुत खुश हुआ।
भरत ने घोषणा की वो भैया राम को लौटा लाएंगे।ये राज्य उनका है।उनका ही रहेगा। मन खुशी से भर गया। भरत चल दिये ,अपने पूरे लाव लश्कर के साथ।अपनी माताओं के साथ,अपनी प्रजा के साथ।पूरे भाव से भरी जनता -जनार्दन राम के जयकारे लगा रही थी।
उधर लक्ष्मण जी ने जंगल में घोड़ों की टाप सुनी तो मन में शंशय हुआ।ऊंचे पेड़ की डाली पर बैठकर देखा।अयोध्या का ध्वज लहरा रहा है। बहुत सारी सेना साथ चल रही।जिसमें हाथी, घोड़े, ऊंट भी थे।पैदल सेना भी थी। भरत अगुआई कर रहे।ये दुष्ट !हमें जंगल में मारने आया है।इसे तो मैं छोडूंगा नहीं। जल्दी से पेड़ से नीचे उतरकर धनुष बाण लेने कुटिया में गए। राम ने देखा ,लक्ष्मण गुस्से से फड़क रहा।
“क्या बात है लक्ष्मण? क्या हुआ? क्यों परेशान दिख रहे रहे हो?”
“भैया! मुझे न रोको ! मैं आज वध कर दुँगा भरत का।वो आ रहा हमें मारने।”
“अरे धीरज रख पगले !तू भरत को नहीं जानता,मेरे पैर में कांटे चुभे होंगे । ये सोच कर ही वो आधा मर गया होगा ।ईश्वर करे उसके पैरों के नीचे सिर्फ फूल ही फूल बिछे मिले। ”
अभी बातें हो रही थी कि भरत आ गए। चरणों में अपना शीश रख दिया। राम ने उठाया, गले से लगाया। दो भाइयों के बीच का अनन्य प्रेम जैसे छलक उठा।लक्ष्मण जैसे अवाक रह गए।जड़ हो गए।
जाने क्यों, आज भी मिलन वाले दृश्य विह्वल कर जाते।मन पुलक उठता। आँखें अनायास ही भींग उठती।
सारी अयोध्या जैसे चित्रकूट में समा गई थी। । माताओं की वेश- भूषा ! आह! सफेद साड़ी में लिपटा देख कर राम बच्चों की तरह बिलख उठे। पिता उनके वियोग में देह त्याग चुके थे ।मन भींग रहा था । माताओं से मिलने का क्षण तो और भी विह्वल करनेवाला था।उसमें से कैकई से मिलने का तो और भी ज्यादा।वो शर्म से ,हया से जैसे जमीन में गड़ी जा रही थीं।कितनी हिम्मत कर वो राम के सामने आई थीं।और राम इतने प्रेम से मिले ,जैसे कुछ हुआ नहीं।उनके तो जैसे भाग्य खुल गए ,उनके कारण ही तो जो जंगल में बड़े- बड़े ऋषि मुनियों के सानिध्य मिला।आशीर्वाद मिला।
हरेक नगरवासी से राम प्रेम से मिले।उनके उलाहने सुने। सबको राम -भरत का प्रेम देखकर लग रहा था राम लौट जाएंगे। सबके मन में आस बंध गयी थी।
पर पिता की प्रतिज्ञा पूरी करनी थी। राम ने दो टूक कहा, “रघुकुल रीत सदा चली आयी ,प्राण जाए पर वचन न जाई।”
“भैया! खड़ाऊँ दे दीजिए अपनी। आपकी जगह पर आपकी चरण -पादुका ही विराजित रहेंगे ।।वचन दो आप, चौदह वर्ष उपरांत एक दिन की भी देरी की ,तो मैं प्राण त्याग दुँगा।”पूरी प्रजा जैसे हतप्रभ हो गयी ।किंकिर्तव्यमूढ़ हो गयी। फिर अचानक ही जैसे
सारी सभा प्रभु के साथ एक साथ चिल्लाई_____
“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई,जिसने जना भरत सम भाई! ”
भरत मिलाप का पोर्शन दो -तीन बार पढ़ा। मन भावुक हो रहा था। मन राममय सा हो गया था।
मैंने अब किताब बन्द कर दी। आगे का कल पढूँगी।
अगले दिन स्कूल से लौटी ।खा- पीकर छत पर की कोठरी में भागी। मम्मी जानती थी, अब ये जब तक खत्म न करेगी ये कहीं बाहर न भागेगी। वो निश्चिन्त थी मेरे तरफ से।
ये क्या! बिछावन पर मेरी किताब न थी। हे भगवान !मेरे राम किधर गए?इधर -उधर ढूंढा ,कहीं न मिला।मन परेशान हो गया।मैं रुआंसी सी हो गयी।नीचे भागी ।
“मम्मी मेरी किताब न मिल रही । मम्मी को झिंझोड़ कर उठाया।पप्पा थे नहीं।
“देखो वहीँ कहीं होंगी ,कहाँ जाएगा?अभी सो जा,बाद में ढूंढ दूँगी। मेरा मन, रोने को होने लगा। लगा, जैसे क्या कुछ खो दी हूँ। तीन चार दिन ढूंढती रही,इधर -उधर ,पागलों की तरह।आसमान निगल लिया या धरती पता नहीं।पर वो राम कथा न मिली। बस मन में वो कथा बस गयी। तब नहीं पता था वो भगवान हैं। जन -जन में हैं ,कण -कण में हैं। उनके किस्से चहुँ ओर बिखरे पड़े हैं।एक दिन मम्मी को एक किताब पढ़ते देखी। बहुत ही अद्भुत सी तस्वीर थी।नजरें जैसे वहीँ पर जम गई। नीचे राम- दरबार लिखा था।
“अरे ! ये तो राम जी हैं। लक्षमण जी,भरत, शत्रुघ्न ,सीता जी भी!और ये नीचे कौन बैठा है ?राम जी के चरणों में।”ये हनुमान जी हैं।मम्मी ने बताया। ये कथा ,तुम जानती हो मम्मी! मैं आश्चर्य से भर उठी।
“हाँ ।सुननी है तुम्हें! अच्छा रात में सुनाऊँगी रोज। अभी जा खेल।”
फिर धीरे- धीरे करके ,हर रात या जब भी फुरसत होती, मम्मी से वो कथा सुनने लगी। सारे प्रसंग सुना डाले। एक तरह से रामायण सारी सुना डाली।पढ़ने से भी ज्यादा मजा आ रहा था।
कालांतर में जब गाँव से कस्बे में आये तो रामायण की वीडियो दिखाई जाती थी।हर शनिवार, रविवार तीन घण्टे।पप्पा दिखाने ले जाते रहे।दृश्य रूप में देखना तो मेरी कल्पना से भी ज्यादा सुंदर था। हर तरफ राम ।जैसे राममय हो गयी थी धरा।बच्चे, तीर- धनुष में घूमते रहते। रामानंद सागर ने अकल्पनीय कृति रच डाली थी। उस समय दूरदर्शन पर रामायण में राम -रावण युद्ध चल रहा था।कुंभकर्ण को जगाने की अनथक कोशिशें जारी थी।जब से मैं देखना शुरू की। हर सन्डे को 9 बजे जैसे सन्नाटा पसर जाता था।ठीक वैसे ही जैसे लॉकडौन के समय सड़कों पे सन्नाटा पसरा था। राममय तब भी हो गयी थी प्रकृति। पर सप्ताह भर इंतजार करना मुश्किल लगता था। पप्पा रामायण ले आये। बहुत मोटी किताब थी। रोज वो उसमें से चौपाई सुनाते ।अर्थ बताते, और फिर रामायण रख दी जाती।पर मुझे चैन कहाँ। स्कूल से घर आते ही पढ़ना शुरू किया फिर से।खुद से पढ़ने का आनंद ही अलग होता। और इसमें तो ‘राम कथा’ से भी वृहद रूप में वर्णन था।बहुत कुछ दृश्य माध्यम से देख चुकी थी, तो पढ़ने का आनंद भी चौगुना हो गया था। अब तो वीडियो हॉल में देखने का आनंद और भी बढ़ गया था।
दृश्य रूप में यूँ भी मानस पटल पर अंकित हो गए थे राम! पूरी रामायण ! रामायण का हर चरित्र ।जहाँ प्रेम की पराकाष्ठा थी ,तो अतुलनीय त्याग भी। जहाँ दोस्ती की मिसाल थी ,तो भक्ति का प्रवाह भी सहज रूप से बह रहा था ।जहाँ कोई ऊंच -नीच नहीं ,भेद -भाव नहीं था सब बराबर थे। एक गिलहरी तक का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया ।
राम जी , पल भर में इतना बड़ा साम्राज्य मुस्कुराते हुए त्याग दिए।माँ की ममता की बात की जाती अक्सर, और प्रेम में पुत्र के ,पिता ने प्राण त्याग दिए हों ,ऐसा कहीं उदाहरण न मिला ।जिस भाई को अयोध्या जैसा विशाल साम्राज्य मिला उसे चाहिए ही नहीं कुछ।उसे तो बस भाई का प्रेम चाहिए।।लक्ष्मण छाया बन कर घूमते रहे आजीवन राम के। कहते हैं की छाया काली होती हर एक की ,पर एक राम ही थे ,जिनकी छाया उजली थी लक्ष्मण के रूप में। माँ सीता महलों में पली ,बढ़ी। महान राजा की पुत्रवधू बनी। मर्यादा पुरुषोत्तम की पत्नी बनीं फिर भी जंगल -जंगल भटकीं।
जिसके तिनके के तेज से रावण तक डरता था।जो सच में एक बार नजर उठाकर देख लेती तो रावण भस्म हो सकता था।पर उन्हें तो राम का उज्ज्वल, अपराजेय चरित्र गढ़ना था।जिसने मर्यादा पुरुषोत्तम राम की वामांगी बनकर ही खुद को परम सौभग्यशाली समझा था। जिसके प्रेम में असम्भव को सम्भव कर दिखाया।इतना प्रेम ,पत्नी से भी किसने किया ? कोई उदाहरण नज़र नहीं आता ।सागर पर पति ने प्रेम का वो पुल बांधा कि सदियाँ गुजर गई ,पर उस बंधन का अवशेष आज भी नज़र आ रहा।ये प्रेम का पुल उनके मुँह पर जोरदार थप्पड़ भी है, राम जिनके लिए काल्पनिक चरित्र भर हैं।।जब बहुविवाह का प्रचलन समाज में आम हो ,और वहां उस व्यवस्था में एकनिष्ठ रहने का प्रण ले लिया राम ने।समाज में कितना बड़ा उदाहरण सेट कर दिया।
हनुमान जैसा भक्त, उनके जैसा डिप्लोमैट शायद ही कोई हो। पप्पा ,अक्सर कहते थे ,”दिमाग ऐसा लगाओ कि दुश्मन को पता न चले ,नुकसान किसका हो रहा। ”
यूँ बयां करते थे ,”तोहरे रंग, तोहरे अबीर ,तोहरे पुआ, तोहरे घर हम खेलब होरी।”
जैसे हनुमान जी ने किया…उनका तेल, उनके कपड़े, जली भी उनकी लंका। इससे बड़ी डिप्लोमेसी भला क्या होगी!
राम का चरित्र सिर्फ रामायण में ही नहीं ,लोकगीतों में, लोककथाओं में, यत्र ,तत्र ,सर्वत्र भरी पड़ी है। हरेक किरदार के अपने किस्से ,अपनी कथाएं,जो सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी यात्रा तय कर रही अनवरत।
सच बस इतना ही है कि____
” सिया राम मय सब जग जानी,
करहु प्रणाम जोरी जुग पानी ॥”????????????

पटना ,बिहार

