वज्जिका भाषा में रचित “सौन्दर्य में सुगंध” का लोकार्पण
मलंगवा । मिति २०७९ – चैत्र – २४ गते सर्लाही जिला के मलंगवा में श्री रामचन्द्र महतो, ‘कुशवाहा’ जी के ‘सौन्दर्य में सुगंध’ नामक वज्जिका भाषा में रचित गद्य रचना का बड़ी धूमधाम के साथ लोकार्पण किया गया। वज्जिका भाषा में रचित इस रचना के लोकार्पण समारोह में सर्लाही- रौतहत और महोत्तरी के वरिष्ठ साहित्यकार, कवि तथा साहित्य प्रेमीयों के उत्साह जनक उपस्थिति देखी गई। श्री नागेन्द्रप्रसाद यादव (सर्लाही न.पा. अध्यक्ष ने कार्यक्रम के अध्यक्षीय मर्यादा को शोभायमान किया तो दूसरी ओर
श्री कौशल किशोर सिंह (जि. स. स० अध्यक्ष सर्लाही ने प्रमुख अतिथि के आसान को महिमा मंडित कर रहे थे। इसी प्रकार
श्री जीतेन्द्र महतो जी नि० स० स० उप प्रमुख , विशिष्ट अतिथि
श्री गेहनाथ गौतम जी मलंगवा न.पा. प्रमुख प्रशासकीय अधिकृत: विशिष्ट अतिथि
श्री भरत महतो जी, प्रकाशक तथा गोरैता न.पा. के प्रशासक, विशिष्ट अतिथि; वज्जीका सम्राट :श्री कृष्ण दयाल यादव जी विशिष्ट अतिथि: श्री होमनाथ सुवेदी जी, विशिष्ट अतिथि: श्री शिवचन्द्र चौधरी जी (महासचीव नागरिक समाज सर्लाही) सहित विभिन्न विद्यालय के प्रधानाध्यापक, शिक्षिका, शिक्षक, कवि साहित्यकार, साहित्य प्रेमी, पत्रकार, नागरिक समाज तथा विभिन्न संघ संस्था से आए अतिथियों ने कार्यक्रम के शोभा को चारचांद लग दिया। शुभकामना मंतव्य के क्रम में प्रथम वक्ता के रूप में श्री शिवचंद्र चौधरी जी ने बज्जिका सहित सभी स्थानीय भाषाओं को संरक्षित और संवर्धित करते हुए सब को जोड़ने वाली एकमात्र हिंदी भाषा के प्रति विशेष अनुराग रखने के लिए प्रेरित किया। महोत्तरी के साहित्यकार अजय कुमार झा ने बज्जिका भाषा संवर्धित करने के लिए इसका एक सर्वमान्य व्याकरण, शब्दकोश और मासिक पत्रिका प्रकाशित किए जाने के लिए विशेष जोड़ दिया। बज्जिका अभियानियों के द्वारा उपरोक्त सभी आवश्यक पहलुओं पर कार्य पूर्ण होने की जानकारी डा कमलेश्वर सिन्हा ने अपनी शुभकामना मंतव्य के क्रम में कहा। उन्होंने अपनी विशेष प्रयास से बज्जिका भाषा के विकास और प्रचार प्रसार के लिए किए गए अंतरराष्ट्रीय बज्जिका सम्मेलन के महत्व और उपलब्धियों का विश्लेषणात्मक वर्णन करते हुए कहा की, हमारे भीतर अपनी मातृ भाषा के संबंध में जो अन्यौल और अज्ञानता थी उसको चीरने और प्रकाश में लाने के लिए 45 वर्ष संघर्ष करना पड़ा है। संघीयता के कारण आज हम अपनी मातृ भाषा के प्रति जागरूक हुए हैं। अब हमें इस जागरूकता को सृजनात्मकता और वैधानिकता में परिणत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। कार्यक्रम में आनन्द रस बरसाने हेतु बज्जिका कवि श्री चंद्र शेखर रस्तोगी और संगीता सहनी ने काव्य पाठ किया। इसी तरह समस्त आधिकारिक व्यक्तित्व ने एक स्वर में बज्जिका भाषा के विकास और विस्तार के लिए हर संभव सहयोग करने की प्रतिज्ञा जताया। लगभग चार घंटा तक निर्बाध रूप में संचालित इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय गान, शहीद के सम्मान में मौन, सम्पूर्ण अतिथियों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम के दौरान सभी वक्ताओं ने मैथिली, हिंदी और भोजपुरी भाषा के प्रति एकबार भी अनुचित वाक्य का प्रयोग नहीं किया गया। बल्कि सभी वक्ताओं ने नेपाल के अन्य भाषा लगायत मैथिली के प्रति भी उतना ही सम्मान जनक भाव प्रदर्शित किया। जो मेरे लिए विशेष महत्व रखता था। क्योंकि मैथिली अभियानी बिना कारण के मैथिली / नेपाली वाहेक़ अन्य सभी भाषाओं के प्रति कटुता पूर्ण वाक्य और सौतेला व्यवहार करते आ रहे हैं। यहां हम मधेश वासियों को गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। हमें भाषा, धर्म, संस्कृति और सामाजिक सद्भाव को सुमधुर बनाए रखने के लिए अपनी हृदय को खुला रखने की जरूरत है। संकुचित मानसिकता से सामूहिक कल्याण तो संभव नहीं है लेकिन सामूहिक स्खलन की संभावना अत्यधिक बढ़ जाती है। अतः नेपाली भाषा की तरह किसी के ऊपर जबरदस्ती किसी भाषा को थोपना एक प्रकार से लोकतंत्र का उपहास माना जाएगा। जिन्हें अपनी मातृ भाषा की परख नहीं है उन्हें हम कुछ वर्षो तक ही धोखे में रख सकते हैं; एक दिन उसे अपनी भाषा और संस्कृति की पहचान अवश्य हो जाएगी। उस दिन वह समाज हमसे घृणा करने लगेगा। आज विभिन्न संदर्भ और आयामों में कड़ा प्रतिकार का झलक मिलना शुरू हो गया है। फिर भी यदि आंख नहीं खुलती है या आंखों पर मुद्रा राक्षस का पट्टी बंधा हुआ है तो इसका परिणाम बहुत ही घृणास्पद होगा। वैसे अभी से ही संकेत मिलना शुरू हो गया है। वैचारिक समता और व्यवहारिक समझदारी ही हमारा आंतरिक संतुलन को बनाए रखने में सहायक सिद्ध होगा। ध्यान रहे! भाषा अभियानी का उद्देश्य दूसरे की भाषा को अपमानित करना नहीं होता है; बल्कि अपनी भाषा को साहित्यिक रूप से उत्कृष्ट बनाना होता है। तुलसी दास की तरह विश्व साहित्य को मात देने वाली काव्य की रचना कर अपनी क्षमता को प्रदर्शन करने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान के भंडार संस्कृत साहित्य को अध्ययन करने के लिए यूरोप, अमेरिका सहित अन्य देशों के विद्वानों ने जिस प्रकार संस्कृत भाषा को सीखने के लिए तत्परता दिखाई वही गहिराई हमें अपनी कृतियों के माध्यम से प्रस्तुत कर विश्वव्यापी बनाने का प्रयास करना चाहिए। पुनश्च आज के केंद्र बिंदु श्री राम चंद्र कुशवाहा जी को सभा ने तालियों की गड़गड़ाहट से सम्मान और उत्साह वर्धन किया।







