सीता नवमी विशेष : सीता अयोनिजा है, इसलिए वह विशेष है : डॉ. श्वेता दीप्ति
डॉ. श्वेता दीप्ति, काठमांडू । सीता धरती से जन्मी एवं ऋषियों मुनियों के साथ पली बढ़ी है । पवित्र भूमि की हल रेखा से सीता के मिलने पर किसानों ने कहा कि वह जनक के बीज का फल नहीं है तो वह उनकी पुत्री कैसे हो सकती है ? इस प्रश्न पर राजा जनक कहते हैं कि, ‘पितृत्व बीज से नहीं हृदय के भीतर से अंकुरित होता है’ और उन्होंने घोषणा की कि, यह धरती की पुत्री भूमिजा है, मैं इसे सीता कहूँगा, वह सीता जिसने मुझे पिता के रूप में चुना है । सीता प्रकृति के पालिका बनने तथा मानव सभ्यता के उदय होने का मूर्त रूप बन कर हमारे समक्ष स्थापित होती है । वेदों में सीता को उर्वरता की भगवती के रूप में मान्यता दी गई है । महाभारत के राम उपाख्यान में सीता जनक की जैविक पुत्री है । कश्मीरी रामावतार चरित्र में सीता रावण की पुत्री है । आनन्द रामायण में विष्णु, पाक्ष नामक राजा को एक फल देते हैं, जिसमें कन्या है, जो लक्ष्मी का अवतार है, वही पार्वती है और वही सीता है । सीता अयोनिजा है, इसलिए वह विशेष है । तात्पर्य यह कि सीता की उत्पत्ति की कई कथाएँ हैं । माता सीता की जन्मस्थली मिथिला की चर्चा रामचरित मानस के उत्तर कांड में कुछ इस तरह हुई है ।
इहाँ वसत मोहि सुनु खग ईशा।
बीते कलप सात अरु बीसा।।
अभी से सत्ताइस चौयुगी (सत्य, त्रेता, द्वापर और कलिनामक चतुर्युगी) से पहले त्रेता युग में राम चरित मानस के उत्तर काण्ड में काक भुसुण्डीजी के द्वारा गरूड़ जी को कहे गए इस चौपाइ के आधार पर २७ कल्पों पहले त्रेता युग में ही मिथिला की राजधानी जनकपुर में सतावन पीढी तक चली । ब्रह्मज्ञानी जनकों की वंशावली में बाइसवें जनक श्री सीरध्वज नामक राजा जनक के द्वारा अनेकों वर्ष तक महा अकाल पड़ने पर चलाये गये सुवर्णमय हल के सीर (सीता नामक अग्रभाग) से मिथिला की पावनतम् भूमि के अन्यतम भाग सीतामही (प्रसिद्ध सीतामढी) से आविर्भूत हुई जगज्जननी जनकनन्दिनी सीताजी ने मिथिला को लोकोत्तर गौरव के शिखर पर प्रतिष्ठित कर दिया । जो अयोनिजा परमेश्वरी भगवती के रूप से सर्वत्र पूजित होती हैं ।
माँ जानकी के जन्म को लेकर कई किवदंतियाँ प्रचलित हैं । जिनमें सबसे प्रचलित कथा त्रेतायुग की है, जब मिथिला के राजा जनक हुआ करते थे । दरअसल राजा जनक, निमि के पुत्र थे । किसी समय तत्कालीन आर्यावर्त में सूर्य नाम का एक सूर्यवंशीय क्षत्रिय का शासन था । इसी वंश में श्री रामचन्द्र जी कभी अवतार लिए थे । इसी सूर्य नामक राजा के पुत्र ‘मनु’ हुए । मनु महा मेधावी पुरूष थे । उन्होंने ‘मनुःमृति’ रूपी महान ग्रंथ का निर्माण किया । मनु के पुत्र ‘इक्ष्वाकु’ अयोध्या के राजा हुए । इक्ष्वाकु के प्रथम पुत्र ‘विकुक्षि’ थे तथा द्वितीय पुत्र ‘निमि’ थे ।
‘निमि’ बहुत ही कुशाग्र बुद्धि वाले दूरदर्शी पुरूष थे । उन्होंने मन ही मन सोचा कि जीवन क्षणभंगुर है । मृत्यु सनातन है । जो कीर्ति करेगा वह मरणोपरान्त भी समाज में जिंदा रहेगा । इस सिद्धान्त को मन में स्थिर कर उन्होंने दृढ़ संकल्प लिया कि कुछ ऐसी कीर्ति करूं कि मैं सार्वभौम बन जाऊं ।
मन में दृढ़ निश्चय कर ‘निमि’ ने अपने कुलगुरू ऋषि ‘वशिष्ठ’ से निवेदन किया कि – वह ईश्वर के सदृश्य सर्वत्र विराजमान रहे, ऐसा यज्ञ करा दें । वशिष्ठ ने ‘निमि’ से कहा कि मैं पूर्व में ही देवराज इन्द्र का यज्ञ कराना स्वीकार कर लिया हूं । इन्द्र के यज्ञ की समाप्ति के उपरांत मैं आपका यज्ञ करा दूंगा । ‘निमि’ मौन हो गए । वशिष्ठ ‘निमि’ के मौन को स्वीकृति मानकर इन्द्र के यज्ञानुष्ठान हेतु चल दिए । ‘निमि’ के मन में आया कि – जीवन क्षणभंगुर है, क्या पता कल क्या हो जाय ? निमि के अंदर तीव्र इच्छा ने उसे व्याकुल कर दिया । अतएव ‘निमि’ अयोध्या से निकलकर व्याकुल मन में पूर्व दिशा की ओर चल पड़े । चलते–चलते ‘निमि’ मिथिला क्षेत्र आ गए । मिथिला क्षेत्र में गौतम ऋषि का आश्रम था । तथा उन दिनों यह क्षेत्र मिथिला, नहीं बल्कि गौतम का ‘तपोवन’ कहलाता था । इस ‘तपोवन’ का नाम ‘मिथिला’ बाद में पड़ा । ‘निमि’ गौतम ऋषि के तेज व तपस्या से काफी प्रभावित व आकर्षित हुए । निमि ने गौतम ऋषि से इसी तपोवन में यज्ञ–अनुष्ठान कराने का आग्रह किया । ताकि उस यज्ञ के फल से वे (निमि) सर्वत्र व्यापक हो जाएँ । इस उत्कृष्ट इच्छा को देखकर गौतम ऋषि ने निमि को यज्ञ कराने का वचन दिया ।
कुछ ही दिनों बाद गौतम ऋषि यज्ञ प्रारम्भ करने के उद्देश्य से याज्ञवल्क्य, भृगु, वामदेव, अगस्त्य, भारद्वाज आदि ऋषियों को आमंत्रित कर ‘निमि’ का दीर्घकालीन यज्ञ के अनुष्ठान का संकल्प करा कर यज्ञ प्रारम्भ किया ।
परन्तु यज्ञ की पूर्णाहुति होने से पहले ही इन्द्र का यज्ञ समाप्त कर ऋषि वशिष्ठ अयोध्या लौटे । कुलगुरू वशिष्ठ को जब इस बात की जानकारी हुई कि ‘निमि’ ने उनके लिए प्रतीक्षा नहीं की, तथा दूसरे ऋषियों के सहयोग से यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ कर दिया है, तो इस अवज्ञा से क्रोधित हो, निमि के यज्ञस्थल पर क्रोधावश आ धमके । कुलगुरू पर अविश्वास के कारण ऋषि वशिष्ठ ने निमि को दण्डस्वरूप विदेह होने का श्राप दे दिया । इधर यज्ञ की समाप्ति नहीं हुई थी, और निमि प्राणहीन हो गए ।
इस घटना,से निमि के यज्ञ में शामिल सभी ऋषियों के समक्ष एक विचित्र समस्या आ खड़ी हुई । परन्तु यज्ञ के ऋत्विक ऋषि गौतम ने सभी ऋषियों से आग्रह किया कि हम लोग अपने–अपने तपबल से इस प्राणहीन ‘निमि’ के शरीर को मंथन करें । मंत्रोच्चारण एवं ऋषियों के तपबल के कारण मंथन से एक सुंदर राजकुमार बालक का आविर्भाव हुआ । मंथन से उत्पन्न होने के कारण उस राजकुमार का नाम ‘मिथि’ पड़ा । तथा ऋषियों ने इसी राजकुमार ‘मिथि’ से शेष यज्ञ का कार्य पूर्ण कराया ।
मंथन के द्वारा ‘मिथि’ राजकुमार अविर्भूत हुए तथा बाद में राजा के रूप में ‘मिथि’ ने जिस नगरी को बसाया, शासित किया, वही ‘मिथिला’ कहलायी । इक्ष्वाकु वंशीय राजा ‘मिथि’ महान और प्रजावत्सल राजा थे जिन्होंने प्रजा को पुत्रवत समझकर, पालन किया । पुत्रवत् पालन करने के कारण प्रजा उन्हें ‘जनक’ (अर्थात पिता) कहने लगी । जब प्रजा उन्हें जनक संबोधित करने लगी, तभी से उनकी नगरी ‘‘जनकपुर’’ कहलाने लगी ।
बाद में कुछ वर्षों बाद ‘सिरध्वज’ जनक ने जब सोने की सीत से मिट्टी जोती तो उन्हें दिव्य संदूक में सीता मिलीं । इस तरह राजा जनक की पुत्री सीता कहलाईं ।
माता सीता का जन्म एक रहस्य है सीता के विषय में रामायण और अन्य ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है उसके अनुसार मिथिला के राजा जनक के राज में कई वर्षों से वर्षा नहीं हो रही थी इससे चिंतित होकर जनक ने जब ऋषियों से विचार किया तब ऋषियों ने सलाह दिया कि महाराज स्वयं हल चलाएं तो इन्द्र देव की कृपा हो सकती है । मान्यता है कि बिहार स्थित सीतामढ़ी का पुनौरा गांव वह स्थान है जहां राजा जनक ने हल चलाया था हल चलाते समय हल एक धातु से टकराकर अटक गया राजा जनक ने उस स्थान की खुदाई कराने का आदेश दिया । इस स्थान से एक कलश निकला जिसमें एक सुंदर सी कन्या थी राजा जनक निःसंतान थे इन्होंने कन्या को ईश्वर की कृपा मानकर पुत्री बना लिया हल का फल जिसे सीत कहते हैं उससे टकराने के कारण कलश से कन्या बाहर आयी थी इसलिए कन्या का नाम सीता रखा गया । इस घटना से ज्ञात होता है कि सीता राजा जनक की अपनी पुत्री नहीं थी धरती के अंदर छुपे कलश से प्राप्त होने के कारण सीता खुद को पृथ्वी की पुत्री मानती थी । इसलिए वास्तव में सीता के पिता कौन थे और कलश में सीता कैसे आयी यह एक जिज्ञासा का विषय है ।
इसका उल्लेख अलग–अलग भाषाओं में लिखे गये रामायण और कथाओं से प्राप्त होता है । अद्भुत रामायण में उल्लेख है कि ‘रावण कहता है कि जब मैं भूलवश अपनी पुत्री से प्रणय की इच्छा करूं तब वही मेरी मृत्यु का कारण बने रावण के इस कथन से ज्ञात होता है कि सीता रावण की पुत्री थी । अद्भुत रामायण में उल्लेख है कि,गृत्स्मद नामक ब्राह्मण लक्ष्मी को पुत्री रूप मे पाने की कामना से प्रतिदिन एक कलश मे कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता था । एक दिन जब ब्राह्मण कहीं बाहर गया था तब रावण इनकी कुटिया में आया और यहां मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर लिया यह कलश लाकर रावण ने मंदोदरी को सौंप दिया ।
रावण ने कहा कि यह तेज विष है, इसे छुपाकर रख दो मंदोदरी रावण की उपेक्षा से दुःखी थी एक दिन जब रावण बाहर गया था तब मौका देखकर मंदोदरी ने कलश में रखा रक्त पी लिया इसके पीने से मंदोदरी गर्भवती हो गयी । लोक लाज के डर से मंदोदरी अपनी पुत्री को कलश में रखकर उस स्थान पर छुपा गयी जहां से जनक ने उसे प्राप्त किया । इस कथा से ज्ञात होता है कि सीता रावण की पुत्री थी जो रावण की मृत्यु की वजह बनी ।
माँ जानकी के जन्म को लेकर चाहे कितनी ही किवदंतियाँ या कथाएँ हों किन्तु हम उन्हें जनक पुत्री ही मानते हैं और उन्हें भगवती और लक्ष्मी का स्वरूप मान कर उनकी पूजा करते हैं । हमारे लिए वही सीता मान्य है, जो राजा जनक की पुत्री है, नारी का आदर्श है, अपरिमित है, अपरिभाषित है, असीम है, अनन्त है ।
माँ सीता के दृढ और अडिग चरित्र की गाथा हमें रामचरित मानस से ही प्राप्त होती है । वैसे तो रामायण के अध्ययन से यह पता चलता है कि रामायण की रामकथा में चित्रित प्रायः सभी नारी पात्र एक विशिष्टता लिए हुए हैं । उनमें हिन्दू मूल्यों के प्रति असीम आस्था है, वो त्याग की प्रतिमूर्तियाँ हैं, आदर्श पतिव्रता हैं, और विवेकवान् समर्पणशीला हैं साथ ही कर्तव्यपरायण व युग धर्म की रक्षिका भी हैं । रामायण के कथानक में समय आने पर ये सभी अपनी श्रेष्ठता श्री सिद्ध करती हैं । अगर यह कहा जाए कि रामायण की सम्पूर्ण कथानक को आदर्श मंडित करने में नारी पात्रों की विशेष भूमिका रही है, तो यह गलत नहीं होगा । रामकथा में वर्णित मुख्य नारी पात्र हैं— सीता, कौशल्या, कैकेयी, उर्मिला, मन्दोदरी, माण्डवी, श्रुतिकीर्ति, सुमित्रा, मंथरा, शूर्पणखा, शबरी आदि । ये नारी पात्र इतने भव्य रूप में चित्रित हुए हैं कि उनके समक्ष पुरूष पात्र उन्हीं के पथ का अनुसरण करते नजर आते हैं या यह कहा जाए कि काफी हद तक उनसे कम ही नजर आते हैं ।
बात अगर रामायण की मुख्य पात्र सीता की करुँ तो,रामकाव्य परम्परा के अंतर्गत सीता भारतीय नारी भावना का चरमोत्कृष्ट निदर्शन है, जहाँ नाना पुराण निगमागमों में व्यक्त नारी आदर्श सप्राण एवं जीवन्त हो उठे हैं । नारी पात्रों में सीता ही सर्वाधिक, विनयशीला, लज्जाशीला, संयमशीला, सहिष्णु और पतिव्रत की दीप्ति से दैदीप्यमान नारी हैं । समूचा रामकाव्य उसके तप, त्याग एवं बलिदान के मंगल कुंकुम से जगमगा उठा है । आदर्श पत्नी का चरित्र हमें जगदम्बा जानकी के चरित्र में तब तक दृष्टि गोचर होता है, जब श्रीराम द्वारा वन में साथ न चलने की प्रेरणा करने पर अपना अंतिम निर्णय इन शब्दों में कह देती है—
प्राणनाथ तुम्ह बिनु जग माहीं । मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं ।
जिय बिन देह नदी बिनु बारी । तैसिअ नाथ पुरूष बिनु नारी ।।
विषाद्ग्रस्त होकर भी पत्नी अथवा पति को अपने जीवनसाथी का ध्यान रखना भारतीय सांस्कृतिक आदर्श है । सीता को अशोकवाटिका में रखकर रावण ने साम, दाम, दण्ड, भेद आदि उपायों से पथ विचलित करने का प्रयास किया, परन्तु सीता ने अपने पारिवारिक आदर्श का परिचय देते हुए केवल श्रीराम का ही ध्यान किया । उन्हें उनकी मर्यादा से कोई विचलित नहीं कर पाया । यह सीता का सबसे महत्त्वपूर्ण और उज्ज्वल पक्ष है ।
तृन धरि ओट कहति वैदेही, सुमिरि अवधपति परम सनेही ।
सुनु दस मुख खद्योत प्रकासा, कबहुँ कि नलिनी करइ विकासा ।।
सीता एक ओर भारतीय आदर्श पत्नी है, जिनमें पति परायणता, त्याग, सेवा, शील और सौजन्य है, तो दूसरी ओर वे युगजीवन की मर्यादा के अनुरूप श्रमसाध्य जीवनयापन में गौरव का अनुभव करने वाली नारी है ।
लोकापवाद के कारण सीता निर्वासित होती है, परन्तु वह अपना उदार हृदय व सहिष्णु चरित्र का परित्याग नहीं करती और न ही पति को दोष देती है, बल्कि इसे लोकोत्तर त्याग कहकर शिरोधार्य करती है व अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करती है । यहाँ यह सवाल आज के परिवेश में जरूर उठता है कि आखिर सीता की गलती क्या थी जिसकी उसे सजा मिली । क्या एक लोकापवाद के कारण राम का सीता का परित्याग करना उचित था वह भी उस समय जब वह गर्भवती थी ? निस्सन्देह चर्चा का विषय यही बन जाता है । किन्तु इसके बावजूद हम यह कह सकते हैं कि सीता की परिकल्पना ही इस आदर्श को दिखाने के लिए की गई थी जहाँ तर्क की गुँजाइश नहीं है । रामायण में एक साथ कई कथाओं का ताना–बाना साथ–साथ चलता है जहाँ हर पात्र किसी–ना–किसी सत्य की स्थापना के लिए गढ़ा गया है ।
विभिन्न ग्रंथों में उल्लेखित सीता
आद्याशक्ति श्री सीता जी का महात्म्य वेदशास्त्र, पौराणिक वाङ्गमय, इतिहास एवं उपनिषदों में उल्लेखित है । सीतोपनिषद में सीता देवी मूल प्रकृति तथा प्रथम स्वरूपिणी कही गयी हैं । सीता को शाश्वत शक्ति का आधार माना गया है सीता को प्रकृति का स्वरूप माना गया है । सीता साक्षात योग माया हंै । सीता शब्द का अर्थ अक्षर व्रह्म की शक्ति के रूप मे हुआ है । इच्छा, ज्ञान और क्रिया, इस शक्तित्रय के स्वरूप के ज्ञान से जो भाव विमल बुद्धि दर्पण मे प्रतिफलित होता है, वह ब्रह्म सत्ता सामान्य, वह अखण्ड सच्चिदानन्दमय ब्रह्मभाव ही सीता तत्व है ।
‘सा देवी त्रिविधा भवति शक्त्यात्मना’ – इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति, साक्षात्छक्तिरिति–सीतोपनिषद अर्थात सीता देवी सत्यआत्मा में इच्छाशक्ति, क्रिया शक्ति तथा साक्षात शक्ति के भेद से त्रिविधा हैं । इच्छा, क्रिया तथा ज्ञान इस शक्तित्रय का तत्वज्ञान ही सीता तत्व का प्रकाशक है । ज्ञान क्रिया और इच्छा ये सत्, रज और तम गुणत्रयात्मिका प्रकृति के हीं कार्य हैं ।
सीतापनिषद् में स्पष्ट उल्लेख है ब्रह्मा कहते हैं कि मूल प्रकृति रूप होने से सीता को प्रकृति कहते हैं, प्रणव (अ, उ, म) नाद बिन्दु, कला और कलातीत इस सप्ताङ्क से जनित होने के कारण सीता प्रथम स्वरूपिणी हैं, वही त्रिवर्णात्मा सक्षात माया है ।
सकार सत्य का नाम है, यही अमृत प्राप्ति और सोम है तकार रजत सौन्र्दय मण्डित विराजमान यसस्वी मणिविशेष है तो इकार रुपिणी अव्यक्तरुपिणी महामाया है ।
माता सीता का प्रथम रूप शब्द ब्रह्म प्रणम है, वही वेद पाठ के समय प्रसन्न होकर उत्पन्न हुआ था । द्वितीय रूप नारी रूप जो पृथ्वी से हल के अग्रभाग से उत्पन्न हुआ है, तृतीय रूप है इकार रुपिणी अव्यक्तस्वरूपा ।
श्री राम तापनीय उपनिषद् में कहा है – समस्त देहधारियों की उत्पत्ति, पालन तथा संहार करनेवाली आद्या शक्ति मूल प्रकृति संज्ञक श्री सीता जी ही है ।
ऋग्वेद में कहा है – हे असुरों का नाश करनेवाली श्री सीता हम सब आप के चरणों की वन्दना करते हैं। आप हमारा कल्याण करें ।
अथर्ववेद उत्तरार्ध की श्रुति है – महाराजा जनक जी के राज महल में जो श्री सीताजी प्रकट हुई है वह सर्व पर आनन्द मूर्ति है । मुनिगण और देवगण उन का गान करते हैं । कार्य कारण से परे और कार्य कारण शक्ति सम्पन्ना है । ब्रह्माणी लक्ष्मी और गौरी आदि अनन्त शक्तियों की उत्तपादिका है ।
श्री ब्रह्मा जी कहते हैं – नित्या, परम निर्मला, परम विशुद्धा गुण आगरी, श्री की परम श्री, आद्या शक्ति, महेश्वरी, श्री राम जी से अभिन्ना, श्री जनकात्मजा, मैथिली माता श्री सीता जी का मैं वन्दन करता हूँ ।
श्री शंकर जी कहते हैं – यह परम आश्चर्यों से परिपूर्ण जगत परात्परा देवी श्री सीता जी का केवल लीला मात्र ही है ।
श्री महारामायण में शिव का कथन है – श्री जानकी जी के अंशो द्वारा ही अनेकानेक जगत को उत्पन्न करनेवाली शक्तियाँ प्रार्दुभूत होती है । वह तो मूल प्रकृतिस्वरूपिणी महामाया आद्या शक्ति है महाशंभू संहिता में अगस्त्य ऋषि ने कहा है श्री सीता जी के कलांष से बहुत सी शक्तियाँ उत्पन्न होती ही रहती है ।
अद्भुत रामायण में कहा गया है – राम साक्षात परम ज्योति, परमधाम और परात्पर पुरुष हैं । सीता और राम की आकृति में ही भेद है, वास्तव में नही । राम ही सीता हैं और सीता ही राम है सन्त लोग इसी तत्व को बुद्धि के द्वारा भलिभाँति जानकर जन्म मरणरूपी संसार के पार पहुँच सके हैं ।
पुराण में उल्लेख है माँ ने सीता रूप से काली रूप धारण किया था । बाल्मीकि रामायण में हनुमान ने रावण की सभा में कहा था – हे रावण जिन्हें तुम सीता समझते हो जो आज तुम्हारे घर में अवस्थित है, उन्हें तुम कालरात्रि ही समझो । वह सर्वलंका विनाशिनी है । श्री चण्डी भी वही कालरात्रि है । श्री चण्डी के समान यही योगमाया, महामाया जगद्धात्री है ।
एकनाथ चरित्र में हनुमान का वाक्य है – सीता के ही के तेजोनल से रावण सहित समस्त राक्षस– सैन्य जलकर भष्म हुए । सीता ने इन्हें न मारा होता तो ये आप से न मारे जाते इन्हें मारा सीता जी ने और विजय दी आपको जिस के कारण आप की शुरवीरता है व जानकी जी की ही इच्छाशक्ति है ।
शुर्पनखा के अपमान और दूषण के मारे जाने के पश्चात रावण महसूस करने लगा कि अब समय आ गया है । बिना शक्ति की सहायता से कोई भी काम नहीं हो सकता । श्री राम के साथ तो महालक्ष्मी हैं उन्हें तो अब संहार कारिणी शक्ति की आवश्यकता है तब वे उन से कहते हैं–
सुनहु, प्रिया व्रत रुचिर सुसीला ।
मैं कछु, करब ललित नर लिला ।।
तुम्हँ पावक महु करहू निवासा ।
जौ लगि करौ निसाचर नासा ।।
जबहि राम सब कहो बखानि ।
प्रभु पद धरि हिय अनल समानि ।।
निज प्रतिविम राखि तह सीता ।
महालक्ष्मी तो अग्नि में समा गई, अब शेष रह गयी संहार कारणिनी शक्ति सो काली रूप में विराजमान रही । माता जानकी विवाह के वाद ससुराल अपने साथ काली माता की एक मूर्ति लेकर आई थी जिसे अयोध्या में छोटी देवकाली के नाम से जानी जाती हैं । यह मूर्ति आज भी आयोध्या में स्थित है । बताया जाता है माता पार्वती का रूप काली यहाँ सर्वमंगला महागौरी के रूप में विराजमान हैं । राजा दशरथ ने माता काली की इस प्रतिमा को सप्त सागर के ईषान कोण में स्थापित किया था । जहाँ माता सीता हर रोज अन्य रानियों के साथ पूजा करने जाती थी । वही भगवान राम की कुलदेवी भी बड़ी काली देवी है ।
श्री गोस्वामी तुलसी दास ने लिखा है –
जासु अंस उपजहि गुनखानि ।
अगणित उमा, रमा ब्रह्माणी ।।
भृकुटि विलास जासु जग होई ।
राम वाम दिसि सीता सोई ।।
इस तरह सीता तत्व के गुढ़तम आयाम को शास्त्रों एवं पौराणिक वाङ्मय में प्रकाशित करने का प्रयास किया गया है । इस के अतिरिक्त अनेकानेक ऋषि, मुनि, कवि, साधु सन्त विद्वत जन ने सीता तत्व के बारे में स्वाध्याय एवं अनुभूति से प्राप्त ज्ञान राशि को भिन्न भिन्न भाषा एवं रूप में लिपिवद्ध करने का कार्य किया है ।
मूल रूप में यह समझना चाहिए पृथ्वी शक्ति अर्थात आधार शक्ति । आधार शक्ति जो है वह विष्णु की ही शक्ति है । जिस शक्ति ने जगत को धारण कर रखा है । इसलिए सीता पृथ्वीस्त होकर अवतीर्ण हुई थी । सीता अबला नहीं है, सीता जो स्वयं के स्वाभिमान का रक्षण जानती है । उसे स्वयं की रक्षा के लिए किसी की आवश्यकता नहीं है । सीता का स्वाभिमान उस मर्यादा का पालन करता है, जहाँ से किसी अन्य का स्वाभिमान आहत न हो, खंडित न हो । यह ‘स्व’ का अवलम्बन है । बाल्मीकि रामायण में सीता के प्रसादिक स्वाभिमान को स्त्री पराक्रम, स्वभाव एवं कार्य के रूप में समस्त कथा में हम देख सकते हैं । आज सीता का चरित्र विमर्श का विषय बना हुआ है । जहाँ राम के द्वारा उनके परित्याग को विषय बनाकर राम को कटघरे में खड़ा किया जाता है । परन्तु इन सबसे परे अगर हम सीता को उस नारी के रूप में देखें जो एकाकी होते हुए भी विषम परिस्थितियों में स्त्रियोचित्त मनोबल एवं गरिमा का परिचय देती है, तो निःसन्देह आज की आधुनिक नारी सीता सी होने को अभिशाप नहीं समझेगी बल्कि उनके एकाकी जीवन के संघर्ष से जीने की कला और साहस को अपनाने का हुनर सीखेगी । सीता एक वीर बाला, जो अपना निर्णय स्वयं लेती है । राम–वन–गमन के समय जब वह कहती है कि उसे भी वन जाने की अनुमति दी जाए तो उन्हें रोकने की पूरी कोशिश होती है तभी वह कहती है कि—
‘साहं त्वया गमिष्यामि वनम न संशयः ।
नाहं शक्या महाभाग निवर्तयितु मुह्यता ।।’
सीता पहली ही पंक्ति में अपना निर्णय दृढ़ता के साथ सुना देती है कि वह राम के साथ अवश्य जाएगी और इसमें किसी संशय के लिए स्थान नहीं है । यानि सीता यहाँ दृढ़ता की परिचायक है, जिसके निर्णय को कोई टाल नहीं सकता है । सीता का प्रतिवाद उसके क्षत्रियोचित ताप एवं दीप्ति का परिचायक है । सीता का यह दृढनिश्चयी रूप तुलसी रचित मानस में कुल परम्परा की मर्यादा से आपुरित शीलवती कुलवधु के रूप में चित्रित है किन्तु यहाँ भी वन–गमन प्रसंग में वह अपने एक ही कथन से सभी को निरुत्तर कर देती है—
‘मैं सुकुमारी नाथ बन जोगु ।
तुम्हहि उचित तप मो कहूँ भोगू।।’
तुलसी के राम के प्रति ईश्वरीय दृष्टिकोण एवं मर्यादा के आग्रह के बीच भी सीता का तार्किक प्रखर व्यक्तित्व छिपा हुआ नहीं है । सीता वह पतिव्रता नारी है, जो अपने स्वाभिमान की रक्षा करना तो जानती ही है, पति के स्वाभिमान को भी आहत नहीं होने देती । सीता सभी परिस्थितियों में अत्यंत दृढ़ता एवं स्वाभिमान के साथ सामने आती है । वह अपनी पीड़ा को अपनी कमजोरी नहीं बनने देती, अगर ऐसा होता तो वह अपनी संतान को चारित्रिक उज्ज्वलता, दृढ़ता एवं श्रेष्ठ मूल्य नहीं दे पाती । वह राम को पहचानती है और वह यह भी जानती है कि राम का जीवन जन –जन के लिए है । सीता का पृथ्वी में समा जाना न तो उनके द्वारा मृत्यु का वरण है और ना ही राम के प्रति किसी भी प्रकार का रोष इसका कारण है, हाँ ! समाज में व्याप्त रुग्ण मानसिकता का प्रतिफल अवश्य है । अपने ऊपर समाज द्वारा लगाए गए लाँछन की प्रतिक्रिया है । यहाँ भी वह राम के रामत्व की रक्षा करती है, उन्हें किसी असमंजस में नहीं रखना चाहती और स्वयं को मुक्त कर हर प्रश्न पर विराम लगा देती है । सीता का यह उज्ज्वल स्वरूप हर युग में पूजित है और रहेगा । आज भी अगर नारी अपने अन्दर सीता के इस दृढ़ स्वरूप को स्थान दे दे तो वह कभी अबला नहीं मानी जाएगी क्योंकि प्रखरता, दृढ़ता और स्वाभिमान उसका गहना होंगे जो उसके आत्मिक सौन्दर्य को परिभाषित करेंगे ।



