गलाकाट दौड किस लिए
श्रीमन नारायण:फिलहाल मधेसवादी नेताओं का नेम प्लेट लेकर बाजार मे घूम रहे कथित मधेसवादी नेताओं ने, मधेस के नाम पर अपना थोडÞा बहुत जो भी समय, श्रम या अर्थ व्यय किया है उसकी वसूली उन्होंने सूद ब्याज सहित कर ली है । अगर मधेस का मुद्दा निर्जीव न होकर बोलता हुआ प्राणी होता तो खुलकर कहता कि “खुदा के लिए हमे बख्स दीजिए” । गजेन्द्र नारायण सिंह के निधन के वाद मधेस का मुद्दा राजनीतिक विषय से कही अधिक व्यापारिक बन गया । गजेन्द्र नारायण सिंह के अधिकांश अनुयायी ने, न सिर्फउन्हें बल्कि उनके सिद्धान्तों को भी तिलान्जली दे दिया । नया मधेसवाद मे शर्ँार्टकर्ट तरीके से खुद को सच्चा मधेसवादी साबित करने की गलाकाट दौडÞ जारी है । इसके लिए काँग्रेस, एमाले या माओवादी के नेताओं के चौखट पर सुवह शाम हाजिरी बजानी पडÞे तो भी ये पीछे नहीं हटते । आधुनिक मधेसवादियों मे से अधिकांश का न कोई सिद्धान्त है ना कोई कार्यक्रम । सिर्फसंसद और सत्ता मे बने रहना चाहते हैं ।
एक मान्यता है कि आप जन आन्दोलन के बलबूते चुनाव जीतकर सिर्फएक बार ही संसद या सरकार में पहँुच सकते हैं । उसके बाद सत्ता के जरिए ही आप अपने मुकाम पर बने रह सकते हैं । मधेसी नेताओं ने सत्ता में रहकर भी मधेसियों के लिए कुछ भी नहीं किया इसलिए चुनाव मे भारी पराजय का मुँह इन्हेंे देखना पडÞा । चुनाव मे हारे हुए ये नेता अव सुशील कोइराला, प्रचण्ड, वाबुराम एवं एमाले नेताओं की चापलुसी एवं यशोगान मंे अपना समय बिता रहे हैं सिर्फइसलिए कि उन्हे मनोनीत कोटे से संविधानसभा में आने का अवसर प्राप्त हो सके । लोकतन्त्र, साम्यवाद, मधेशवाद में सव कहने वाली बाते हैं तभी तो माओवादी के नेता इन पर भरोसा नहीं करते ।
मधेस आन्दोलन के समय में या गौरकाण्ड के वाद प्रचण्ड और वावुराम ने मधेश के खिलाफ तो जहर ही उगलने का काम किया था । उन्होंने कहा था “मधेसियों के जायज माँगो को मान लिया जाए परन्तु इन सभी मधेसी दलों के ऊपर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जाय तो कम से कम इनके द्वारा खोले गए सशस्त्र समूहों को नेपाली सेना के जरिए तहस नहस करवा दिए जाएँ । अगर नेपाली सेना इतना नहीं कर सकती तो इसकी जिम्मेवारी जनमुक्ति सेनाको दिया जाए, हमारी सेना मधेसियों को ठिकाने लगा देगी । ”
जिस मधेसी नेता ने सबसे अधिक माओवादी का विरोध किया था वही नेता सबसे पहले प्रचण्ड के नेतृत्व वाली सरकार मे सहभागी हुए । मधेसी नेताओं को सवसे अधिक सुकून उसी समय प्राप्त होता था जव वे माओवादी नेता -प्रचण्ड/बाबुराम) के नेतृत्ववादी सरकार में मन्त्री हुआ करते थे । माओवादी के गुरुमन्त्र को पाकर ही अपने सात दर्जन सांसदों की संख्या को घटा कर चार दर्जन पर सीमित कर दिया । संविधान सभा को भंग क्यों करवाया – इसका औचित्य समझ से परे है – मधेसी नेताओं के लिए पहली संविधानसभा कहीं बेहतर थी । मधेसियों के बारे में माओवादी पार्टर्ीीी क्या सोच है – इसका सही जवाब वही दे सकते हैं जो माओवादी में रह चुके हैं या उस पार्टर्ीीे बने हुए हैं । मधेस प्रदेश नेपाल सद्भावना पार्टर्ीीा मुख्य एजेण्डा रहा ह,ै परन्तु आज कमाने खाने का मजा ले रहे हंै । काँग्रेस, एमाले -एवं) अन्य दल तो स्पष्टतः इसके विरोधी हंै । माओवादी के साथ मधेसवादी दलों की नजदीकियाँ समझ से परे है ।
“मधेसवादी दल एवं इसके नेताओं का न तो कोई लक्ष्य है ओर ना ही इनकी कोई प्रतिवद्धताएँ हंै । ये तो अन्दर के आदेश को मानने वाले और जो मिलता है इसे खाने वाले हैं । अन्तरिम संविधान आने के वाद हम -माओवादी) मधेस में संगठन बनाने का प्रयास ही किए थे कि भारत ने मधेस आन्दोलन को सुलगा दिया और उपेन्द्र यादव की पीठ थपथपाया । मधेस में अब काँग्रेस भी नही, एमाले तो विल्कुल ही नहीं मधेसी नेताओं को ही नेतृत्व लेना चाहिए, यही प्रयास है भारत का । परन्तु क्या मधेस सिर्फमहन्थ ठाकुर की जागीर है – क्या मधेस को आप लोग अपनी सम्पत्ति समझते हैं – क्या वहाँ माओवादी, काग्रेस और एमाले नहीं है – मधेसियों में खुद संगठन करके पार्टर्ीीलाने का राजनीतिक संस्कार मैं नहीं देखता । एक मधेसी एक जगह स्थिर होकर रह ही नहीं सकता । मधेस में आधी आवादी है ऐसा कह के मधेसी नेता आधी की दावी करते है लेकिन उस पचास फीसदी मे ३५ फीसदी से अधिक तो पहाडÞी नेपाली रहते हैं ये वे लोग भूल जाते है ।”
-उपरोक्त टिप्पणी एकीकृत माओवादी सुप्रीमो प्रचण्ड ने समय-समय पर मधेस के सर्न्दर्भ मे अपनी धारणा रखते हुए कहा है ।)
संघीयता और मधेस प्रदेश के सवाल पर अव एमाओवादी की सोच मे भी भारी बदलाव आयी है विगत के दिनों में कमाउ -मालदार) मन्त्रालय हासिल करने के चक्कर मे मधेशी दलो ने काग्रेस एवं एमाले से काफी दूरी बना ली । फिलहाल इन दोनों दलों की सहमति के बिना संघीयता या मधेस प्रदेश सम्भव नहीं दिखता । माओवादी दलों से बनाई गई या बनाई जा रही नजदीकियाँ सही वक्त पर काम नहीं आयेंगी, जब माओ का देश चीन बुरे वक्त मे किसी का दोस्त नहीं हुआ तो नेपाल के माओवादी पार्टर्ीीैसे वुरे वक्त मे काम आएँगे – फिलहाल र्सवाधिक चर्चा में रहे और चुनाव में सफलता प्राप्त कर संविधान सभा में जगह बनाने में सफल मधेसी दलों को अपनी जिम्मेवारी का एहसास होना चहिए । महत्वपर्ूण्ा राजनीतिक समिति में तीन मधेसी दल तो है परन्तु सद्भावना नाम धारी दल इससे अलग कर दिए गए हैं । शायद बारÞबार पार्टर्ीीmोडÞने का नतीजा हो । अब तो मधेस मुद्दा को नए तरीके से आगे बढÞाने की आवश्यकता है नेतृत्व भी ऊर्जावान, सक्षम एवं विवादरहित होने चाहिए । भ्रष्ट और बार-बार सांसद मन्त्री रह चुके तथा बडÞे दलों की गणेश-परिक्रमा को ही राजनीति समझने वाले नेता अब मधेसी मुद्दा का नेतृत्व सही ढंग से शायद ही कर पाएँगे । सत्ता के जरिए काँग्रेस, एमाले एवं माओवादी से प्रतिस्पर्धा कभी भी नहीं किया जा सकता है । मधेसवादी दलों के प्रति अब लोगों में पुरानी आस्था नहीं रही । उन्हें शायद पहले यह स्पष्ट करना होगा कि वे वामपन्थ के करीव हैं या लोकतन्त्र के – एक दूसरे को समाप्त कर खुद काविज होने की दकियानुसी सोच के कारण ही मधेस में काँग्रेस एवं एमाले ने पुनः अपनी पुरानी जमीन वापस पा ली है । धीरे-धीरे कतिपय मधेसी नेता बडÞे दल के पद का शोभा बढÞाने लगे तो आर्श्चर्य नहीं मधेसी दल के नेताओं के पास त्याग, र्समर्पण, निष्ठा आदि का कोर्ेइ इतिहास नहीं है फिलहाल हर कोई गलाकाट दौडÞ मंे शामिल है कोई जातीय आधार पर तो कोई पैसा के दम पर राजनीति करना चाहते हंै । ये दोनों तरीका घातक है क्यांेकि इनका भविष्य लम्बा नहीं होता है । सशस्त्र समूह के नेताओं मे एक आध को छोडÞ कर बाकी ने अपनी पहचान खुद गंवा दी है । दरअसल यह गलाकाट प्रतिस्पर्धा अवसरवादिता का परिचायक है ये लोग संकर्ीण्ा, अवसरवादी एवं औसत सोच के लोग हैं । नेतृत्व के लिए विशाल हृदय चाहिए और ऐसा नेतृत्व वर्षों बाद मिलता है ।

