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परिवर्तन एक दिन में सम्भव नहीं

 

-प्रतिक्षा तिवारी, सभासद, एकीकृत नेकपा माओवादी
तेरह या चौदह वर्षकी रही होगी प्रतीक्षा तिवारी जब नेपाल में माओवादी ने जनयुद्ध का ऐलान किया । खोटाङ  में जन्मी प्रतीक्षा के घर में माओवादीओं का आना-जाना था । माओवादी नेता सब गरीबी, विभेद और समानता जैसी बाते करते थे और वह उन लोगों की बातो से प्रभावित होती चली गयी । और किशोरावस्था में ही इस पार्टर्ीीे जुडÞ गयी । अभी वह एकीकृत माओवादी की ओर से संविधान सभा में सभासद हैं । प्रतीक्षा तिवारी से सभासद प्रतीक्षा तिवारी मुखिया तक की यात्रा के बारे में हिमालिनी प्रतिनिधि कञ्चना झा ने उनसे बातचीत की । प्रस्तुत है, बातचीत के अंश-

Pratikchha Tiwari- Interview
प्रतिक्षा तिवारी, सभासद, एकीकृत नेकपा माओवादी

० छोटी उम्र में बहुत बडी जिम्मेदारी ले लिया है – कैसा लग रहा है –
– नहीं, उतनी भी छोटी तो नहीं हूँ । जहाँ तक रही जिम्मेदारी की बात तो मैं अपनी जिम्मेदारी के प्रति सजग हूँ । लम्बे समय से राजनीतिक लोगों के साथ रहते-रहते बहुत बात समझती हूँ । और फिलहाल तो एक ही बात है कि जितनी जल्दी हो सके जनता को संविधान चाहिए और उसके लिए प्रयासरत हूँ ।
० जिस समय आप माओवादी आन्दोलन का अंग बनी, आपकी उम्र भी काफी कम थी और सरकार ने माओवादियों को आतंकवादी घोषित किया था । ऐसे मंें डर नहीं लगा –
– डर की तो  कोई बात ही नहीं थी । माओवादी नेता लोग जब घर आते थे तो अच्छी बातचीत होती थी । वे लोग हमेशा समाज परिवर्तन की बात करते थे । समाज में व्याप्त कुरीति, दमन, धर्म, जात, लिंग के नाम पर विभेद और कुशासन अन्त करने की बात करते थे । और मुझे लगा कि यह तो अच्छी बात है क्योंकि हम लोग भी इन सामाजिक विकृतियों से परेशान थे । इस तरह मैं भी धीरे-धीरे जुडÞती चली गयी इस आन्दोलन से ।
० बहुत पवित्र विचार लेकर आप पार्टर्ीीें आयीं, लेकिन आज जब माओवादी नेता लोग खुद ही विकृत हो गये हंै, बडÞे-बडÞे घरों में रहने लगे हंै, लम्बी-लम्बी गाडिÞयों और ऐशो आराम की जिन्दगी बिताने लगे हैं तो कैसा अनुभव होता है –
– जहाँ तक अभी की बात है,तो मेरे दिमाग में एक ही बात है । जनता ने जो जिम्मेदारी दी है वो किसी तरह पूरा होना चाहिए । कौन कैसे रह रहा है यह सोचने का समय नहीं है । मुझे लगता है कि हमें अपने एजेन्डा से विमुख नहीं होना चाहिए । लेकिन सच कहूँ तो हमारे नेता जब बडÞी बडÞी गाडिÞयों में चढÞते हैं तो मुझे बेहद खुशी होती है ।
० लेकिन कभी-कभी तो लगता है कि एकीकृत माओवादी भी एजेन्डा से विमुख हो रही है । संविधान बनाने के लिए संविधान सभा में बहस चल रही है । और दल के नेता तो अनुपस्थित दिखते ही हैं, आपके दल के सदस्य भी नहीं दिखते हैं –
– मैं तो नियमित हूँ । कभी-कभार अत्यन्त आवश्यक काम रहता है तो बाहर निकलना पडÞता है । दूसरे सभासद के बारे में तो मैं कुछ कहना नहीं चाहती । लेकिन विभिन्न मुद्दों पर सभी सभासद अपना विचार रख रहे हैं । इसलिए मैं विश्वस्त हूँ कि संविधान तो बनेगा ही ।
० आप तो महिला सभासद हैं । एक महिला सभासद की हैसियत से नेपाल में महिला की स्थिति को कैसे देखती हैं –
– अगर पहले की तुलना में कहा जाय तो स्थिति बदल रही है लेकिन अभी भी बहुत सुधार की आवश्यक है । पितृसत्तात्मक सोच से समाज अभी भी बाहर नहीं निकल पाया है । विभेद  महिला को आगे नहीं बढÞने दे रहा है । और मुझे लगता है कि सुधार महिला को खुद में लाना है, किसी पर दोष थोपना ठीक नहीं । शिक्षा, स्वास्थ्य और पहचान तीनों के लिए महिला को स्वयं आगे आना होगा और आगे आने में दूसरे को मदद भी करनी होगी ।
० आपने तो अपना कार्य क्षेत्र मधेश को बनाया – मधेश में महिला की स्थिति में कैसे सुधार लाया जा सकता है –
– खोटाङ की होकर कर भी मंैने अपना कार्य क्षेत्र मधेश को बनाया इसका प्रमुख कारण भी विभेद ही है । जब मैं छोटी थी और देखती थी कि मधेश के भाई लोग साडÞी, कपडÞा सब बेचने आते थे तो उन्हें धोती कह कर बुलाया जाता था । अपने ही देश के भाइयों पर इस तरह का विभेद मुझे अच्छा नहीं लगता था । कहीं-न-कहीं इसी चीज ने मुझे मधेश की ओर आकषिर्त किया और संयोग भी देखिये त्रिचन्द्र मुखिया जी से एक कार्यक्रम में मुलाकात हर्ुइ । धीरे धीरे हम दोनों एक दूसरे के निकट हुए और त्रिचन्द्र जी ने पार्टर्ीीमक्ष मुझसे विवाह का प्रस्ताव रखा । पार्टर्ीीे स्वीकृति दी और एक कार्यक्रम की आयोजना कर हम दोनों को विवाह बन्धन में बाँध दिया ।
मधेश से सम्बन्ध जोडÞने के बाद मुझे मधेश को और ज्यादा नजदीक से देखने का मौका मिला तभी लगा कि समस्या वहाँ और विकराल है । अशिक्षा तो है ही लेकिन सामाजिक संस्कार के नाम पर महिला पर बहुत सारे निषेध हैं और महिला की स्थिति और भी कारुणिक है । पहाडÞ की महिला थोडेÞ हद तक स्वतन्त्र है लेकिन मधेश में बहुत सारी बन्दिशें हैं ।
० तो उनमें सुधार कैसे लाया जा सकता है –
– यह परिवर्तन एक दिन में सम्भव नहीं । समाज की सोच  को बदलने में समय लगता है । हाँ, लेकिन सबसे पहला कदम तो शिक्षा ही है । दहेज घूंघट जैसे सामाजिक संस्कार और अन्धविश्वास ने भी मधेश को जकडÞ रखा है । इसके अन्त के लिए मधेश के शिक्षित और विभिन्न आन्दोलन से जुडÞी महिलाओं को लेकर मंै नया प्याकेज लेकर मधेश में जाना चाहतीं हूँ । घर-घर पहुँच कर उनमें चेतना जगाने की, प्रशिक्षण देने की योजना है ।
० धनुषा तो अपका कार्यक्षेत्र रहा है, इस क्षेत्र के विकास के लिए आपकी कोई योजना –
प्रतीक्षा- मधेश से हजारों की संख्या में युवा विदेश पलायन हो रहे हैैं । मेरी पहली कोशिश ही यही है कि इसको कैसे कम किया जाय । मधेश को युवाओं को घर पर ही रोजगार मिले, इसके लिए मैं प्रयासरत हूँ दूसरी बात मधेश और सम्पर्ूण्ा मिथिला का हृदय कहलाने वाला शहर जनकपुर के विकास के लिए प्रयासरत हूँ । सबसे बडÞी बात तो यह है कि मधेश अन्न का भण्डार है । लेकिन अब यह सिर्फकहावत बनकर रह गयी है । वहाँ के कृषि क्षेत्र में विकास के लिए अपनी पार्टर्ीीौर सरकार को विशेष कार्यक्रम लाने के लिए हर वक्त दबाव देती रहँूगी ।

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