मोदी भ्रमण, नेपाल से मोदी क्या ले गए ?
मोदी भ्रमण, नेपाल से मोदी क्या ले गए ?
श्वेता दीप्ति, काठमान्डौ । चर्चा और परिचर्चा के बीच मोदी नेपाल भ्रमण समाप्त कर वापस लौट चुके हैं । कहीं उनके भाषण की चर्चा हुई कहीं जनता के बीच पहुँचने को उनकी सहृदयता मानी गई । भारतीय प्रधानमंत्री की सुरक्षा हेतु कडी व्यवस्था की गई, नेपाली जनता को कष्ट हुआ और इन सब के पीछे भारतीय प्रधानमंत्री की दुर्भावनाओं को ढूंढा गया । अगर आपने अपनी मानसिकता ही किसी को गलत ठहराने की बना ली है तो कोई शक्ति आपके अन्दर विश्वास पैदा नहीं करा सकता । शब्दों और वाक्यों के साथ खेलना और तिल का ताड बनाना और बात है, किन्तु उसके सही अर्थ को लेना और बात है । मोदी ने अपने भाषण में अगर सोमनाथ, काशीनाथ, पशुपतिनाथ की चर्चा की तो इसमें यह कहाँ दिख गया कि वो हिन्दुत्व की बात कर रहे हैं । एक हिन्दू नेपाल आकर पशुपतिनाथ की चर्चा करता है तो क्या यह गलत है ? मोदी ने माँ किशोरी का नाम लिया, बुद्ध को बार बार याद किया और पशुपति दर्शन के लिए तो वो आए ही थे, अगर यहाँ कोई अन्य धर्मों से सम्बन्धित विख्यात स्थल होता तो मोदी अवश्य उसकी भी चर्चा करते । उन्होंने पर्यटन की चर्चा की, हिमालय के गर्भ में छिपे असंख्य जडीबूटियों के सही उपयोग की चर्चा की तो इसे रामदेव से जोड दिया गया । काशीनाथ और पशुपतिनाथ के पंडितों की चर्चा की तो इसमें भी गलत ही दिखा,उन्होंने कहा कि आज भारत नेपाल को बिजली दे रहा है आगामी दस वर्षों के बाद नेपाल भारत के अँधेरे को दूर कर सकता है तो यह माना जा रहा है कि वो नेपाल का सारा पानी ही मुफ्त में ले जाएँगे, उन्होंने हर मुद्दों को सुलझाने की बात की और कहा कि आप आगे आएँ भारत साथ देगा तो इसे भी शंकित निगाह से देखा जा रहा है । तब तो भारत के पास एक ही उपाय है वह हनुमान बने और अपना सीना चीर कर दिखाए कि वह सचमुच क्या चाहता है ?
सच तो यह है कि यह दो राष्ट्रों की बात है । जहाँ दोनों अपने अपने हित की बात सोचने के लिए स्वतंत्र है । जहाँ कोई पक्ष अपने आपको दूसरे के हवाले पूरी तरह नहीं कर सकता । कोई भी राष्ट्र जब दूसरे राष्ट्र के लिए कुछ करेगा तो वह अपना हित भी देखेगा यह जाहिर सी बात है । यह तो संसार का नियम है कि एक हाथ लो और एक हाथ दो । तो जिस हाथ से आप लेने की तैयारी में है. तो तय यह कीजिए कि आप कितना देंगे क्योंकि यह तो पूरी तरह आप पर निर्भर करता है । शक के दायरे में हर विषय को देख कर हित और विकास कभी सम्भव नहीं हो सकता ।

